राजस्थान की संस्कृति और रीति-रिवाज अपनी प्राचीनता और जीवंतता के लिए प्रसिद्ध हैं, जो वेदों और स्थानीय परंपराओं का मेल हैं। यहाँ मुख्य रीति-रिवाजों का विवरण दिया गया है:
1. जन्म से संबंधित रीति-रिवाज
जातकर्म: बच्चे के जन्म पर तांबे की थाली बजाकर या बंदूक चलाकर खुशियाँ मनाई जाती हैं। नवजात को शहद और घी का मिश्रण चटाया जाता है।
नामकरण: जन्म के 11 दिन बाद बच्चे का नाम रखा जाता है, जिसे ‘नामकरण’ संस्कार कहते हैं।
जलवा पूजन (पनघट पूजन): प्रसव के कुछ दिनों बाद माता बच्चे के साथ गाँव के कुएं की पूजा करने जाती है, जिसे ‘जलवा’ कहा जाता है।
मुंडन: बच्चे के पहले बाल कटवाए जाते हैं, जिसे ‘मुंडन’ संस्कार कहते हैं।
2. विवाह के रीति-रिवाज
तिलक/सगाई: यह विवाह का पहला चरण है जहाँ दूल्हे के माथे पर तिलक लगाया जाता है।
पल्ला रस्म: दूल्हे का परिवार दुल्हन के लिए गहने और कपड़े लाता है।
तोरण: दूल्हा दुल्हन के घर के प्रवेश द्वार पर लगे ‘तोरण’ को अपनी तलवार या छड़ी से छूता है।
सप्तपदी (फेरे): अग्नि के चारों ओर सात फेरे लिए जाते हैं। राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में केवल चार फेरे लेने का भी रिवाज है।
3. मृत्यु के रीति-रिवाज
बखेर: किसी वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु पर अर्थी के साथ रास्ते में सिक्के उछाले जाते हैं, जिसे ‘बखेर’ कहते हैं।
तीया: मृत्यु के तीसरे दिन राख और अस्थियां एकत्रित की जाती हैं।
मौसर: मृत्यु के 12वें दिन आयोजित होने वाले ‘मृत्यु भोज’ को ‘मौसर’ कहा जाता है।
4. अन्य सांस्कृतिक परंपराएं
अतिथि देवो भव: मेहमानों का भगवान की तरह स्वागत करना राजस्थानी संस्कृति का मूल मंत्र है।
पहनावा: पुरुष साफा (पगड़ी) और धोती-कुर्ता पहनते हैं, जबकि महिलाएं घाघरा-चोली और ओढ़नी पहनती हैं।
त्योहार: गणगौर (16 दिनों तक चलने वाला त्योहार) और तीज यहाँ के प्रमुख उत्सव हैं।
मेले: पुष्कर का ऊंट मेला और बीकानेर का ऊंट उत्सव (9-11 जनवरी, 2026) विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।