अध्याय सत्ताईसवाँ
CrPC Section 354 in Hindi: निर्णय की भाषा और अंतर्वस्तु
New Law Update (2024)
धारा 393 बी.एन.एस.एस.
TRIAL COURT
Punishment
मृत्यु या आजीवन कारावास
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब तक कि इस संहिता द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित न किया गया हो, धारा 353 में निर्दिष्ट प्रत्येक निर्णय न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा; उसमें अवधारण के लिए प्रश्न या प्रश्न, उन पर विनिश्चय और विनिश्चय के कारण होंगे; उसमें उस अपराध (यदि कोई हो) का उल्लेख होगा जिसका, और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की उस धारा का या अन्य विधि का जिसके अधीन अभियुक्त दोषसिद्ध किया गया है, और वह दंड, जो उसे दिया गया है, उल्लेख होगा; यदि वह दोषमुक्ति का निर्णय है तो उसमें उस अपराध का कथन होगा जिससे अभियुक्त दोषमुक्त किया गया है और निर्देश होगा कि उसे स्वतंत्र कर दिया जाए।
(2) जब दोषसिद्धि भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अधीन हो और यह संदिग्ध हो कि उस संहिता की दो धाराओं में से किस धारा के अधीन या उसी धारा के दो भागों में से किन दो भागों के अधीन अपराध आता है, तब न्यायालय उसको सुस्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करेगा और वैकल्पिक निर्णय देगा।
(3) जब दोषसिद्धि ऐसे अपराध के लिए है जो मृत्यु से या, वैकल्पिक रूप से, आजीवन कारावास से या वर्षों की अवधि के लिए कारावास से दंडनीय है तब निर्णय में अधिनिर्णीत दंडादेश के कारण कथित होंगे और मृत्यु के दंडादेश की दशा में ऐसे दंडादेश के लिए विशेष कारण होंगे।
(4) जब दोषसिद्धि ऐसे अपराध के लिए है जो एक वर्ष या अधिक की अवधि के लिए कारावास से दंडनीय है किंतु न्यायालय तीन मास से कम की अवधि के लिए कारावास का दंडादेश अधिरोपित करता है तब वह ऐसे दंडादेश को अधिनिर्णीत करने के अपने कारण अभिलिखित करेगा, जब तक कि दंडादेश न्यायालय के उठने तक का कारावास न हो या जब तक कि मामले का इस संहिता के उपबंधों के अधीन संक्षिप्ततः विचारण न किया गया हो।
(5) जब किसी व्यक्ति को मृत्यु का दंडादेश दिया जाता है तब दंडादेश में यह निर्दिष्ट होगा कि उसे गर्दन से तब तक लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
(6) धारा 117 या धारा 138 की उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक आदेश और धारा 125, धारा 145 या धारा 147 के अधीन किया गया प्रत्येक अंतिम आदेश उसमें अवधारण के लिए प्रश्न या प्रश्न, उन पर विनिश्चय और विनिश्चय के कारण होंगे।
Important Sub-Sections Explained
धारा 354(1) दंड प्रक्रिया संहिता
यह महत्वपूर्ण उपधारा प्रत्येक आपराधिक निर्णय के लिए मूलभूत आवश्यकताओं को रेखांकित करती है, जिसमें यह निर्धारित किया गया है कि यह न्यायालय की भाषा में होना चाहिए, अवधारण के बिंदुओं, कारणों सहित विनिश्चय, विशिष्ट अपराध और अधिनिर्णीत दंड का विवरण होना चाहिए। यह दोषमुक्ति के निर्णय के लिए आवश्यक अंतर्वस्तु को भी परिभाषित करती है।
धारा 354(3) दंड प्रक्रिया संहिता
यह उपधारा न्यायालय द्वारा पारित दंडादेश के कारणों को शामिल करने को अनिवार्य बनाती है। महत्वपूर्ण रूप से, यह न्यायालय को मृत्युदंड अधिनिर्णीत किए जाने पर ‘विशेष कारण’ प्रदान करने की अपेक्षा करती है, ऐसे दंड की गंभीरता और असाधारण प्रकृति को रेखांकित करती है।
Landmark Judgements
बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980):
इस ऐतिहासिक निर्णय ने भारत में मृत्युदंड अधिरोपित करने के लिए ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ सिद्धांत स्थापित किया। इसमें यह अभिधारित किया गया कि आजीवन कारावास सामान्य नियम है और मृत्युदंड एक अपवाद है, जिसे तभी दिया जाना चाहिए जब वैकल्पिक विकल्प निर्विवाद रूप से समाप्त हो जाए, जिसमें न्यायालय को इसके अधिरोपण के लिए ‘विशेष कारण’ अभिलिखित करने की आवश्यकता होती है।
मनोज प्रताप सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2022):
उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में मृत्युदंड के लिए ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ सिद्धांत को दोहराया और आगे स्पष्ट किया। इसमें गंभीर और शमनकारी दोनों परिस्थितियों के व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर दिया गया, जिसमें ‘विशेष कारणों’ के महत्व और मृत्युदंड की पुष्टि करने से पहले सुधार और पुनर्वास के पहलुओं पर विचार करने पर प्रकाश डाला गया।