धारा 38 BNS VS धारा 100 IPC: शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु कारित करने तक कब विस्तारित होता है

सजा (Punishment)

साधारण अपवाद (मृत्यु तक बचाव)

संज्ञेय (Cognizable)

लागू नहीं

जमानतीय (Bailable)

लागू नहीं

समझौता योग्य (Compoundable

लागू नहीं

विचारणीय न्यायालय (Court)

लागू नहीं

IPC (पुराना कानून)

धारा 100

निम्न 7 स्थितियों में शरीर की रक्षा में किसी को जान से मारा जा सकता है: 1. मृत्यु की आशंका, 2. घोर उपहति की आशंका, 3. बलात्कार का आशय, 4. प्रकृति विरुद्ध कामापराध, 5. अपहरण/व्यपहरण, 6. सदोष परिरोध, 7. एसिड (अम्ल) फेंकने का कृत्य।

BNS (नया कानून)

धारा 38

निम्न 7 स्थितियों में शरीर की रक्षा में किसी को जान से मारा जा सकता है: 1. मृत्यु की आशंका, 2. घोर उपहति की आशंका, 3. बलात्कार का आशय, 4. प्रकृति विरुद्ध कामापराध, 5. अपहरण/व्यपहरण, 6. सदोष परिरोध, 7. एसिड (अम्ल) फेंकने या पिलाने का कृत्य।

विशेषज्ञ टिप्पणी (Expert Analysis)

यह कानून की सबसे ताकतवर धाराओं में से है। BNS 38 (IPC 100) आपको इन 7 विशिष्ट परिस्थितियों में हमलावर को 'जान से मारने' (To cause death) का कानूनी लाइसेंस (बचाव) देती है। इसमें 'एसिड अटैक' (अम्ल फेंकना) को 2013 के संशोधन के बाद जोड़ा गया था, जिसे BNS में यथावत लिया गया है।

तुलना

बचाव का दायरा समान है। बलात्कार, अपहरण या एसिड अटैक की स्थिति में पीड़िता हमलावर की हत्या कर सकती है और उसे कोई सजा नहीं होगी।

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