अध्याय XIX
CrPC Section 248 in Hindi: दोषमुक्ति या दोषसिद्धि
New Law Update (2024)
धारा 288 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता
TRIAL COURT
मजिस्ट्रेट
Punishment
प्रक्रियात्मक – विचारण / आरोप
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) यदि इस अध्याय के अधीन किसी ऐसे मामले में, जिसमें आरोप विरचित किया गया है, मजिस्ट्रेट अभियुक्त को दोषी नहीं पाता है, तो वह दोषमुक्ति का आदेश अभिलिखित करेगा।
(2) जहां इस अध्याय के अधीन किसी मामले में मजिस्ट्रेट अभियुक्त को दोषी पाता है, किंतु धारा 325 या धारा 360 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही नहीं करता है, वहां वह दंडादेश के प्रश्न पर अभियुक्त को सुनने के पश्चात्, विधि के अनुसार उसे दंडादेश देगा।
(3) जहां इस अध्याय के अधीन किसी मामले में धारा 211 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन कोई पूर्व दोषसिद्धि आरोपित की जाती है और अभियुक्त यह स्वीकार नहीं करता है कि वह आरोप में अभिकथित रूप में पूर्व में दोषसिद्ध किया गया है, वहां मजिस्ट्रेट उक्त अभियुक्त को दोषसिद्ध करने के पश्चात्, अभिकथित पूर्व दोषसिद्धि के संबंध में साक्ष्य ले सकता है और उस पर निष्कर्ष अभिलिखित करेगा:
परंतु मजिस्ट्रेट ऐसा कोई आरोप पढ़कर नहीं सुनाएगा और न ही अभियुक्त से उस पर अभिवाक् करने को कहेगा और न ही अभियोजन द्वारा या उसके द्वारा पेश किए गए किसी साक्ष्य में पूर्व दोषसिद्धि का निर्देश किया जाएगा, जब तक और जिस समय तक अभियुक्त उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध नहीं कर दिया जाता है।
Important Sub-Sections Explained
उपधारा (2)
यह उपधारा अधिदेशित करती है कि यदि कोई अभियुक्त दोषी पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को दंडादेश पारित करने से पहले दंडादेश के प्रश्न पर अभियुक्त को सुने जाने का अवसर प्रदान करना चाहिए, जिससे एक निष्पक्ष और न्यायपूर्ण दंडादेश प्रक्रिया सुनिश्चित हो।
उपधारा (3)
यह उपधारा पूर्व दोषसिद्धि के आरोपों से निपटने के लिए विशिष्ट प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार करती है, यह सुनिश्चित करती है कि ऐसी जानकारी तब तक प्रस्तुत या संदर्भित न की जाए जब तक अभियुक्त को वर्तमान अपराध के लिए पहले ही दोषसिद्ध न कर दिया गया हो, इस प्रकार विचारण के दौरान पूर्वाग्रह को रोकती है।
Landmark Judgements
संता सिंह बनाम पंजाब राज्य (1976):
यह ऐतिहासिक निर्णय धारा 248(3) के अधीन पूर्व दोषसिद्धियों से निपटने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है और धारा 248(2) के अधीन दंडादेश के प्रश्न पर अभियुक्त को सुनने की अनिवार्य आवश्यकता पर जोर देता है।
एस. भगवान सिंह बनाम पंजाब राज्य (1993):
इस मामले ने दंडादेश पारित करने से पहले दंडादेश के प्रश्न पर अभियुक्त को सुने जाने का अवसर प्रदान करने के मौलिक महत्व को दोहराया, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(2) में निहित नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को कायम रखा।