अध्याय छब्बीस

CrPC Section 345 in Hindi: अवमान के कतिपय मामलों में प्रक्रिया

New Law Update (2024)

धारा 355 बी.एन.एस.एस.

TRIAL COURT

सिविल, दांडिक या राजस्व न्यायालय

Punishment​

1 मास तक का सादा कारावास + जुर्माना

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) जब भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 228 में वर्णित कोई अपराध किसी सिविल, दांडिक या राजस्व न्यायालय के समक्ष या उसकी उपस्थिति में किया जाता है, तब न्यायालय अपराधी को अभिरक्षा में निरुद्ध करा सकता है और उसी दिन न्यायालय के उठने से किसी भी समय पहले अपराध का संज्ञान कर सकता है और अपराधी को यह हेतुक दर्शित करने का उचित अवसर देने के पश्चात् कि उसे इस धारा के अधीन दंडित क्यों न किया जाए, अपराधी को दो सौ रुपए से अनधिक जुर्माने का दंडादेश दे सकता है और जुर्माने का संदाय न करने पर एक मास तक के सादा कारावास का दंडादेश दे सकता है, जब तक कि ऐसा जुर्माना पहले चुका न दिया जाए।
(2) प्रत्येक ऐसे मामले में न्यायालय अपराध गठित करने वाले तथ्यों को, अपराधी द्वारा किए गए कथन (यदि कोई हो) के साथ-साथ निष्कर्ष और दंडादेश को अभिलिखित करेगा।
(3) यदि अपराध भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 228 के अधीन है, तो अभिलेख में उस न्यायिक कार्यवाही की प्रकृति और प्रक्रम उपदर्शित होगा जिसमें न्यायालय बैठा था और जिसमें बाधा डाली गई थी या जिसका अपमान किया गया था, और बाधा या अपमान की प्रकृति भी उपदर्शित होगी।

Important Sub-Sections Explained

धारा 345(1)

यह उपधारा सिविल, दांडिक या राजस्व न्यायालयों को ऐसे अपराधों, जैसे लोक सेवकों का अपमान करना या लोक न्याय में बाधा डालना (भारतीय दंड संहिता की विशिष्ट धाराओं के अधीन) जो उनकी प्रत्यक्ष दृष्टि में किए जाते हैं, के लिए संक्षेप में दंडित करने का अधिकार देती है। न्यायालय अपराधी को निरुद्ध कर सकता है और उसी दिन संज्ञान ले सकता है, हेतुक दर्शित करने का अवसर प्रदान कर सकता है, और दो सौ रुपये तक का जुर्माना या जुर्माने का संदाय न करने पर एक महीने तक का सादा कारावास अधिरोपित कर सकता है।

धारा 345(2)

यह न्यायालय को अपराध गठित करने वाले तथ्यों, अपराधी द्वारा दिए गए किसी भी कथन, और अंतिम निष्कर्ष और दंडादेश को सावधानीपूर्वक अभिलिखित करने का आदेश देता है। यह पारदर्शिता सुनिश्चित करता है और संक्षिप्त कार्यवाहियों तथा दंड के आधार का स्पष्ट अभिलेख प्रदान करता है।

Landmark Judgements

सुखदेव सिंह बनाम माननीय मुख्य न्यायाधीश एवं पेप्सू उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (1954):

इस ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया गया कि उच्च न्यायालय, अभिलेख न्यायालयों के रूप में, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 जैसे सांविधिक प्रावधानों से स्वतंत्र होकर, अवमानना के लिए दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति रखते हैं। इसने न्यायिक गरिमा और अधिकार बनाए रखने की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

मोहन लाल बनाम राजस्थान राज्य (1995):

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 के अधीन कार्यवाहियों की संक्षिप्त प्रकृति पर बल दिया, यह दोहराते हुए कि न्यायालय की उपस्थिति में किए गए सूचीबद्ध अपराधों के लिए निर्दिष्ट प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। इसने अपराधी को हेतुक दर्शित करने का उचित अवसर प्रदान करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

जसवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995):

इस निर्णय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 345 में निहित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर दिया। उच्चतम न्यायालय ने माना कि इस संक्षिप्त शक्ति का प्रयोग करते समय, न्यायालयों को विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि अपराधी को अपने आचरण की व्याख्या करने का उचित अवसर मिले और अपराध गठित करने वाले तथ्यों को विधिवत अभिलिखित किया जाए।

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