अध्याय तीसवाँ
CrPC Section 398 in Hindi: जांच का आदेश देने की शक्ति
New Law Update (2024)
धारा 326 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
Punishment
प्रक्रियात्मक – अन्वेषण / जांच
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
धारा 397 के अधीन या अन्यथा किसी अभिलेख का परिशीलन करने पर, उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश किसी ऐसी परिवाद में, जिसे धारा 203 या धारा 204 की उपधारा (4) के अधीन खारिज कर दिया गया है, या किसी ऐसे व्यक्ति के मामले में, जिस पर किसी अपराध का आरोप है और जिसे उन्मोचित कर दिया गया है, आगे और जांच करने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को स्वयं या अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसी जांच करने का निर्देश दे सकेगा और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट स्वयं या किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को ऐसी जांच करने का निर्देश दे सकेगा:
परंतु इस धारा के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति के मामले में, जिसे उन्मोचित कर दिया गया है, जांच के लिए कोई निर्देश कोई न्यायालय तब तक नहीं देगा जब तक ऐसे व्यक्ति को यह हेतुक दर्शित करने का अवसर न मिल गया हो कि ऐसा निर्देश क्यों न दिया जाए।
Important Sub-Sections Explained
धारा 398 का मुख्य उपबंध
यह भाग उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सी.जे.एम.) या किसी अधीनस्थ मजिस्ट्रेट को उन मामलों में आगे की जांच करने का निर्देश देने का अधिकार देता है जहाँ आपराधिक परिवाद खारिज कर दिया गया है या अभियुक्त व्यक्ति को उन्मोचित कर दिया गया है, जिससे ऐसे न्यायिक आदेशों की पुनरीक्षा की अनुमति मिलती है।
धारा 398 का परंतुक
महत्वपूर्ण रूप से, यह परंतुक अधिदेशित करता है कि किसी उन्मोचित व्यक्ति के मामले में आगे की जांच के लिए कोई निर्देश तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक कि उस व्यक्ति को ऐसी जांच के विरुद्ध अपने कारण (‘हेतुक दर्शित करने’) प्रस्तुत करने का उचित अवसर न दिया गया हो, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का समर्थन होता है।
Landmark Judgements
निर्मल सिंह काहलों बनाम पंजाब राज्य (2009):
उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने दं.प्र.सं. की धारा 398 के तहत उच्च न्यायालय की शक्ति के दायरे को स्पष्ट किया। इसमें यह अभिनिर्धारित किया गया कि आगे की जांच का निर्देश देने की शक्ति एक महत्वपूर्ण पुनरीक्षण शक्ति है, जिसका प्रयोग किसी व्यक्ति को उन्मोचित किए जाने के बाद भी किया जा सकता है, बशर्ते प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, विशेष रूप से कारण बताओ अवसर के सिद्धांत का पालन किया जाए। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि इस शक्ति का उद्देश्य शिकायतों की खारिज होने या अभियुक्तों के उन्मोचन के मामलों में त्रुटियों को ठीक करना या न्याय के गर्भपात को रोकना है।
प्रमथ नाथ तालुकदार बनाम सरोज रंजन सरकार (1962):
उच्चतम न्यायालय का यह ऐतिहासिक निर्णय, पुरानी दं.प्र.सं. की समान धारा 436 (जो 1973 की संहिता की धारा 398 के समतुल्य है) की व्याख्या करते हुए, यह स्थापित करता है कि उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश को एक खारिज की गई शिकायत या एक उन्मोचित अभियुक्त व्यक्ति के मामले में आगे की जांच का निर्देश देने की शक्ति प्राप्त है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आगे की जांच का ऐसा आदेश एक नए विचारण के समान नहीं है, बल्कि उचित अन्वेषण और न्यायपूर्ण परिणाम सुनिश्चित करने के लिए पिछली कार्यवाही की निरंतरता है।