अध्याय XXXII

CrPC Section 433 in Hindi: दंडादेश का लघुकरण करने की शक्ति

New Law Update (2024)

धारा 493 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता

TRIAL COURT

Punishment​

मृत्यु या आजीवन कारावास

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) मृत्यु दंडादेश का भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) द्वारा उपबंधित किसी अन्य दंड में;
(2) आजीवन कारावास के दंडादेश का चौदह वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास में या जुर्माने में;
(3) कठोर कारावास के दंडादेश का किसी ऐसी अवधि के सादा कारावास में, जिस तक वह व्यक्ति दंडादिष्ट किया जा सकता था, या जुर्माने में;
(4) सादा कारावास के दंडादेश का जुर्माने में।

Important Sub-Sections Explained

धारा 433(1)

यह उपधारा समुचित सरकार को मृत्यु दंडादेश को भारतीय दंड संहिता द्वारा निर्धारित किसी अन्य कम दंड में लघुकरण करने का अधिकार देती है, जिससे मृत्युदंड की गंभीरता को कम करने का एक महत्वपूर्ण मार्ग प्रशस्त होता है।

धारा 433(2)

यह प्रावधान समुचित सरकार को आजीवन कारावास के दंडादेश का चौदह वर्ष से अनधिक की निश्चित अवधि के कारावास में, या जुर्माने में भी लघुकरण करने की अनुमति देता है, जो आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों की संभावित शीघ्र रिहाई के लिए एक तंत्र प्रदान करता है।

Landmark Judgements

मारू राम बनाम भारत संघ (1980):

इस ऐतिहासिक मामले ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 432 और 433 के तहत दंडादेशों के लघुकरण की सरकार की शक्ति के दायरे को स्पष्ट किया। उच्चतम न्यायालय ने माना कि आजीवन कारावास का अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग के लिए कारावास है, जो समुचित सरकार की परिहार या लघुकरण की शक्ति के अधीन है, जिसका प्रयोग विशिष्ट दिशानिर्देशों का पालन करके किया जा सकता है।

स्वामी श्रद्धानंद @ मुरली मनोहर मिश्रा बनाम कर्नाटक राज्य (2008):

उच्चतम न्यायालय ने, इस मामले में, सामान्य आजीवन कारावास और उन मामलों के बीच अंतर किया जहां मृत्युदंड का लघुकरण किया जाता है। इसने यह अवधारणा प्रस्तुत की कि गंभीर मामलों में, न्यायालय यह निर्दिष्ट कर सकता है कि आजीवन कारावास का अर्थ दोषी के प्राकृतिक जीवन के शेष भाग के लिए बिना परिहार या समयपूर्व रिहाई के लाभ के कारावास होगा, जिससे ऐसे मामलों में कार्यपालिका की लघुकरण की शक्ति सीमित हो जाती है।

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