तत्सम, तद्भव, देशज एवं विदेशी शब्द

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1. प्रस्तावना

प्रत्येक समृद्ध भाषा की अपनी एक सुव्यवस्थित ध्वनि-व्यवस्था, शब्द-रचना और वाक्य का एक निश्चित संरचनात्मक ढाँचा (Syntactical Structure) होता है। भाषा केवल भावों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं, बल्कि एक तार्किक अर्थ-प्रणाली भी है। इस प्रणाली में ‘शब्द’ एक सेतु का कार्य करता है, जो अमूर्त ध्वनियों को मूर्त अर्थ में परिवर्तित करता है।

व्याकरणिक दृष्टि से, भाषा की सबसे छोटी मौखिक इकाई ‘ध्वनि’ (Sound) है और लिखित रूप में ‘वर्ण’ (Letter) है, किन्तु भाषा की सबसे छोटी सार्थक इकाई ‘शब्द’ (Word) है। जब ध्वनियों का समूह एक निश्चित अर्थ का वोध कराता है, तो वह शब्द की संज्ञा प्राप्त करता है।

परिभाषा

“एक या एक से अधिक वर्णों के मेल से बनी हुई स्वतंत्र और सार्थक ध्वनि-इकाई को ‘शब्द’ कहते हैं।”

विशेष टिप्पणी (NCERT के अनुसार): जब तक कोई शब्द स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होता है, वह ‘शब्द’ कहलाता है, परन्तु जब वही शब्द व्याकरणिक नियमों (कारक, वचन, लिंग) में बंधकर किसी वाक्य में प्रयुक्त होता है, तो वह ‘पद’ (Term) बन जाता है।

2. शब्दों का वर्गीकरण (Classification of Words)

हिंदी भाषा का विकास-क्रम अत्यंत वैज्ञानिक है। इसने अपनी जननी ‘संस्कृत’ के विपुल शब्द-भंडार को विरासत में प्राप्त किया, साथ ही पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के रास्ते होते हुए विकास के मार्ग पर अग्रसर हुई। अपनी ऐतिहासिक यात्रा में हिंदी ने विदेशी आक्रमणों, औपनिवेशिक काल और वैश्वीकरण के प्रभाव से अनेक भाषाओं के शब्दों को अपने आंचल में समेटा है।

अध्ययन की सुविधा और वैज्ञानिकता की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण निम्नलिखित चार आधारों पर किया जाता है:

  1. उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर (Etymological Basis)
  2. रचना या बनावट के आधार पर (Structural Basis)
  3. प्रयोग या व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर (Grammatical Basis)
  4. अर्थ के आधार पर (Semantic Basis)

(क) उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर (Based on Origin/Source)

हिंदी भाषा के शब्द-भंडार में ऐतिहासिक स्रोतों की विविधता है। उत्पत्ति के आधार पर शब्दों को पाँच मुख्य उपभेदों में वर्गीकृत किया गया है:

1. तत्सम शब्द (Tatsam Words)

व्युत्पत्ति: ‘तत्’ (उसके) + ‘सम’ (समान)। अर्थात् अपनी मूल भाषा (संस्कृत) के समान। परिभाषा: संस्कृत भाषा के वे शब्द जो बिना किसी ध्वनि-परिवर्तन के, अपने मूल रूप में ही हिंदी भाषा में प्रयुक्त होते हैं, ‘तत्सम’ कहलाते हैं। ये शब्द भाषा की शुद्धता और प्राचीनता के परिचायक हैं। उदाहरण: अट्टालिका, उष्ट्र, कर्ण, चंद्र, अग्नि, आम्र, गर्दभ, क्षेत्र, अद्य, कुपुत्र आदि।

2. तद्भव शब्द (Tadbhav Words)

व्युत्पत्ति: ‘तत्’ (उससे) + ‘भव’ (उत्पन्न/विकसित)। परिभाषा: संस्कृत के वे मूल शब्द, जो हजारों वर्षों की यात्रा में पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के घिसने-पिटने की प्रक्रिया से गुजरकर हिंदी में आए हैं और जिनका उच्चारण और वर्तनी परिवर्तित हो गई है, ‘तद्भव’ कहलाते हैं। ये आम बोलचाल की भाषा के शब्द हैं। उदाहरण: अटारी (अट्टालिका से), ऊँट (उष्ट्र से), कान (कर्ण से), खेत (क्षेत्र से)।

विस्तृत तत्सम-तद्भव तालिका (Reference List)

विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण तत्सम-तद्भव शब्दों की प्रामाणिक सूची नीचे दी गई है:

तत्सम (मूल रूप)तद्भव (परिवर्तित रूप)तत्सम (मूल रूप)तद्भव (परिवर्तित रूप)
अ-वर्गक-वर्ग
अकार्यअकाजकर्पासकपास
अगम्यअगमकटुकड़वा
आश्चर्यअचरजकपाटकिवाड़
अक्षतअच्छतकंटककाँटा
अट्टालिकाअटारीकाष्ठकाठ
अज्ञानीअनजानाकाककौवा / कौआ
अंधकारअँधेराकिरणकिरन
अमावस्याअमावसकुकुरकुत्ता
अक्षरआखरकुपुत्रकपूत
अमूल्यअमोलकोणकोना
आम्रचूर्णअमचूरकृषककिसान
अंगुष्ठअँगूठाकर्मकाम
अष्टादशअठारहकदलीकेला
अर्द्धआधाकर्पूरकपूर
अश्रुआँसूकपोतकबूतर
अग्निआगकार्यकाज
अन्नअनाजकार्तिककातिक
अमृतअमियकासखाँसी
आम्रआमकुंभकारकुम्हार
अर्पणअरपनकुष्ठकोढ़
आखेटअहेरकोकिलकोयल
अगणितअनगिनतकृष्णकिसन / कान्ह
आश्विनआसोजकंकणकंगन
आलस्यआलसकच्छपकछुआ
असीसआशिषक्लेशकलेस
आश्रयआसराकज्जलकाजल
उ-वर्गकर्णकान
उज्ज्वलउजलाकर्तरीकतरनी
उच्चऊँचाख, ग, घ-वर्ग
उष्ट्रऊँटगर्तगड्ढा
ए-वर्गस्तम्भखंबा
एकत्रइकट्ठाक्षत्रियखत्री
इक्षुईखखट्वाखाट
उलूकउल्लूक्षीरखीर
एलाइलायचीक्षेत्रखेत
अंचलआँचलग्रंथिगाँठ
ग-वर्ग (क्रमशः)त-वर्ग
गायकगवैयातप्ततपन
ग्रामीणगँवारतीक्ष्णतीखा
गोस्वामीगुसाईंतैलतेल
गृहघरतपस्वीतपसी
गोमयगोबरताम्रतांबा
गौरगोरातीर्थतीरथ
गौगायतुंदतोंद
गुहागुफात्वरिततुरंत
ग्रामगाँवतृणतिनका
गम्भीरगहराद, ध-वर्ग
गोपालकग्वालादधिदही
गोधूमगेहूँदंतदाँत
ग्रीष्मगर्मीदीपशलाकादीयासलाई
घटघड़ादीपदीया
घटिकाघड़ीदीपावलीदीवाली
घोटकघोड़ादुर्बलदुबला
घृतघीद्विपटदुपट्टा
गहनघनाद्वितीयदूजा
च-वर्गदूर्वादूब
चर्मचामदुग्धदूध
चंद्रचाँददुःखदुख
चतुष्कोणचौकोरदक्षिणदाहिना
चतुर्दशचौदहदेवदई / दैव
चित्रकारचितेराधर्मधरम
चैत्रचैतधरित्रीधरती
छत्रछाताधूमधुआँ
चर्मकारचमारधर्त्तूरधतूरा
चर्वणचबानाधैर्यधीरज
चंद्रिकाचाँदनीधनश्रेष्ठिधन्नासेठ
चतुर्थचौथाधान्यधान
चतुष्पदचौपायान, प-वर्ग
चंचुचोंचनग्ननंगा
चतुर्विंशचौबीसनक्षत्रनखत
चौरचोरनव्यनया
चित्रकचीतानापितनाई
चुंबनचूमनानृत्यनाच
चक्रचक्करनकुलनेवला
छायाछाँहनवनौ
छिद्रछेदनयननैन
ज-वर्गनिंबनीम
जन्मजनमनिद्रानींद
ज्योतिजोतनासिकानाक
जिह्वाजीभनिम्बुकनींबू
जंघाजाँघनिष्ठुरनिठुर
ज्येष्ठजेठपक्षपंख
जामाताजमाईपथपंथ
जीर्णझीनापक्षीपंछी
झरणझरनापद्मपदम
त-वर्ग (क्रमशः)पट्टिकापाटी/पट्टी
पर्यंकपलंगफाल्गुनफागुन
परीक्षापरखपरशुफरसा
पर्पटपापड़ब, भ, म-वर्ग
पवनपौनबधिरबहरा
पत्रपत्ताबलीवर्दबैल
पाशफंदावंध्याबाँझ
पादपैरबर्करबकरा
पाषाणपाहनबालुकाबालू
पुच्छपूँछबुभुक्षुभूखा
पुष्करपोखरवंशीबाँसुरी
पिपासाप्यासविकारबिगाड़
पीतपीलाभक्तभगत
पुत्रपूतभल्लुकभालू
पुष्पपुहुपभागिनेयभांजा
पंक्तिपंगतभिक्षाभीख
प्रहरपहरभद्रभला
पानीयपानीभगिनीबहिन
पूर्णपूराभाद्रपदभादों
पंचमपाँचवाँभ्रमरभौंरा
पूर्वपूरबभ्रातृभाई
प्रियपियबाष्पभाप
प्रस्तरपत्थरमशकमच्छर
पितृपितरमत्स्यमछली
प्रकटप्रगटमलमैल
पृष्ठपीठमक्षिकामक्खी
पौत्रपोतामस्तकमाथा
प्रतिच्छायापरछाँईमयूरमोर
मद्यमदमनुष्यमानुस
मातृमातामासमहीना
मातुलमामामित्रमीत
मुक्तामोतीमुखमुँह
मेघमेहमृत्युमौत
श्मशानमसानय, र, ल, व-वर्ग
यतिजतीयजमानजजमान
यमुनाजमुनायमजम
यशजसयोगीजोगी
युवाजवानयंत्र-मंत्रजंतर-मंतर
यशोदाजसोदारज्जुरस्सी
राजपुत्रराजपूतरक्षाराखी
यज्ञोपवीतजनेऊयूथजत्था
राशिरासरिक्तरीता
रोदनरोनारात्रिरात
राज्ञीरानीलक्ष्मणलखन
लज्जालाजलवंगलौंग
लेपनलीपनालोहकारलुहार
लक्षणलच्छनलक्षलाख
लवणनोन/लोनलक्ष्मीलिछमी
लोहलोहालोमशालोमड़ी
वणिक्बनियावत्सबच्चा/बछड़ा
वटबड़वर यात्राबरात
वचनबचनवाणीबैन
विवाहब्याहवर्षाबरखा
वकबगुलावानरबंदर
विष्टाबीटविद्युतबिजली
वृद्धबूढ़ाव्याघ्रबाघ
श, ष, स, ह-वर्ग
शैयासेजशापसराप
शीतलसीतलशुष्कसूखा
शर्कराशक्करशतसौ
शाकसागशिक्षासीख
शुकसुआशुण्डसूँड
श्यामलसाँवलाश्वाससाँस
शृंगारसिंगारशृंगसींग
श्रेष्ठिसेठसरोवरसरवर
शृगालसियारश्रावणसावन
षोडशसोलहसप्तशतीसतसई
संध्यासाँझसपत्नीसौत
सर्पसाँपसर्षपसरसों
सत्यसचसूत्रसूत
सूर्यसूरजस्वर्णकारसुनार
साक्षीसाखीस्वप्नसपना
स्थलथलस्थानथान
स्नेहनेहस्पर्शपरस
हरितहराहस्तिनीहथनी
हट्टहाटहरिद्राहल्दी
हंडीहाँडीहस्तहाथ
हरिणहिरनहास्यहँसी
हीरकहीराहोलिकाहोली
हिंदोलनाहिंडोलाहृदयहिय
क्षणछिनक्षतिछति
क्षीणछीनक्षारखार
त्रयोदशतेरह

3. देशज शब्द (Indigenous/Deshaj Words)

परिभाषा: ‘देशज’ का अर्थ है ‘देश में जन्मा’। ऐसे शब्द जिनकी उत्पत्ति का कोई लिखित संस्कृत स्रोत नहीं मिलता, अपितु जो क्षेत्रीय प्रभाव, लोक-जीवन की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के कारण स्वतः गढ़ लिए गए हैं, वे देशज शब्द कहलाते हैं। इन्हें ‘अज्ञात-व्युत्पत्ति’ (Unknown origin) वाले शब्द भी कहा जाता है।

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देशज शब्दों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में रखा जा सकता है:

(अ) अनुकरणात्मक या मनगढ़ंत शब्द: ये वे शब्द हैं जो मनुष्यों ने ध्वनियों के अनुकरण (Imitation) या अपने अंतर्मन के भावों (आवेश, क्रोध, खुशी) को व्यक्त करने के लिए गढ़ लिए।

  • उदाहरण: ऊधम, अंगोछा, खुरपा, ढोर, लपलपाना, बुद्धू, लोटा, परात, चुटकी, चाट, ठठेरा, खटपट, भड़भड़ाना, हिचकिचाना आदि।

(आ) विभिन्न भारतीय भाषाई परिवारों से गृहीत शब्द: हिंदी ने अपने विकास क्रम में भारत की अन्य मूल जातियों और भाषाई परिवारों से भी शब्द ग्रहण किए हैं।

  • द्रविड़ परिवार (Dravidian origin): अनल, कटी, चिकना, ताला, लूँगी, इडली, डोसा, मीन (मछली) आदि।
  • ऑस्ट्रिक परिवार (कोल, संथाल, मुंडा आदि): कपास, कोड़ी, पान, परवल, बाजरा, सरसों, भिंडी, तांबूल आदि।

4. विदेशी या आगत शब्द (Foreign Words)

भारत के इतिहास में विदेशी संपर्क, व्यापार और शासन का गहरा प्रभाव रहा है। राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से हिंदी ने विदेशी भाषाओं के शब्दों को इतनी सहजता से आत्मसात कर लिया है कि वे अब हिंदी के अपने प्रतीत होते हैं। इन्हें ‘आगत शब्द’ भी कहा जाता है।

प्रमुख विदेशी भाषाओं के शब्द निम्नवत हैं:

  • (अ) अँगरेजी (English): औपनिवेशिक काल और आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से सर्वाधिक शब्द अँगरेजी के हैं।
    • प्रशासनिक/सामान्य: अफसर, एजेंट, क्लास, क्लर्क, नर्स, टीचर, गार्ड, टेलर।
    • वस्तुएं: कार, कॉपी, कोट, चेक, ट्रक, टैक्सी, स्कूल, पेन, पेपर, बस, रेडियो, रजिस्टर, रेल, शर्ट, सूट, स्वेटर, टिकट, रेडीमेड आदि।
  • (आ) अरबी (Arabic): (मुख्यतः कानून और प्रशासन से संबंधित)
    • अक्ल, अदालत, आजाद, इंतजार, इनाम, इलाज, इस्तीफा, कमाल, कब्जा, कानून, कुर्सी, किताब, किस्मत, कबीला, कीमत, जनाब, जलसा, जिला, तहसील, नशा, तारीख, ताकत, तमाशा, दुनिया, दौलत, नतीजा, फकीर, फैसला, बहस, मदद, मतलब, लिफाफा, हलवाई, हुक्म, हिम्मत।
  • (इ) फ़ारसी (Persian): (मुगलकालीन दरबारी भाषा का प्रभाव)
    • अख़बार, अमरूद, आराम, आवारा, आसमान, आतिशबाज़ी, आमदनी, कमर, कारीगर, कुश्ती, खजाना, खर्च, खून, गुलाब, गुब्बारा, जानवर, जेब, जगह, जमीन, दवा, जलेबी, जुकाम, तनख्वाह, तबाह, दर्जी, दीवार, नमक, बीमार, नेक, मजदूर, लगाम, शेर, सूखा, सौदागर, सुल्तान, सुल्फा, सरकार।
  • (ई) पुर्तगाली (Portuguese): (घरेलू सामान से संबंधित)
    • अचार, अगस्त, आलपिन, आलू, आया, अनन्नास, इस्पात, कनस्तर, कार्बन, कमीज, कमरा, गोभी, गोदाम, गमला, चाबी, पीपा, पादरी, फीता, बस्ता, बटन, बाल्टी, पपीता, पतलून, मेज, लबादा, संतरा, साबुन।
  • (उ) तुर्की (Turkish):
    • आका, उर्दू, काबू, कैंची, कुर्की, कुली, कलंगी, कालीन, चाक, चिक, चेचक, चुगली, चोगा, चम्मच, तमगा, तमाशा, तोप, बारूद, बावर्ची, बीबी, बेगम, बहादुर, मुगल, लाश, सराय।
  • (ऊ) अन्य भाषाएँ:
    • फ्रेन्च (French): अंग्रेज, काजू, कारतूस, कूपन, टेबुल, मेयर, मार्शल, मीनू, रेस्त्रां, सूप।
    • चीनी (Chinese): चाय, लीची, लोकाट, तूफान।
    • डच (Dutch): तुरुप, चिड़िया, ड्रिल।
    • जर्मनी (German): नात्सी, नाजीवाद, किंडरगार्टन।
    • तिब्बती (Tibetan): लामा, डांडी।
    • रूसी (Russian): जार, सोवियत, रूबल, स्पूतनिक, बुजुर्ग, लूना।
    • यूनानी (Greek): एकेडमी, एटम, एटलस, टेलीफोन, बाइबिल।
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5. संकर शब्द (Hybrid Words)

दो भिन्न-भिन्न भाषाओं के शब्दों के मेल से बने नए शब्द ‘संकर शब्द’ कहलाते हैं। यह हिंदी की समन्वयवादी प्रकृति का परिचायक है।

शब्दसंरचना (स्रोत)
वर्षगाँठवर्ष (संस्कृत) + गाँठ (हिंदी)
उद्योगपतिउद्योग (संस्कृत) + पति (हिंदी)
रेलयात्रीरेल (अँगरेजी) + यात्री (संस्कृत)
टिकटघरटिकट (अँगरेजी) + घर (हिंदी)
नेकनीयतनेक (फ़ारसी) + नीयत (अरबी)
जाँचकर्ताजाँच (फ़ारसी) + कर्ता (हिंदी)
बेढंगाबे (फ़ारसी) + ढंगा (हिंदी)
बेआबबे (फ़ारसी) + आब (अरबी)
सजाप्राप्तसजा (फ़ारसी) + प्राप्त (हिंदी)
उड़नतश्तरीउड़न (हिंदी) + तश्तरी (फ़ारसी)
बेकायदाबे (फ़ारसी) + कायदा (अरबी)
बमवर्षाबम (अँगरेजी) + वर्षा (हिंदी)

(ख) रचना या बनावट के आधार पर (Based on Structure/Composition)

नए शब्दों के निर्माण की प्रक्रिया को ‘व्युत्पत्ति’ या ‘रचना’ कहते हैं। शब्द के खंड किए जा सकते हैं या नहीं, और उन खंडों का अर्थ क्या निकलता है, इस आधार पर शब्दों के तीन भेद हैं:

1. रूढ़ शब्द (Simple/Root Words)

वे शब्द जो परंपरा से किसी विशिष्ट अर्थ में चले आ रहे हैं और जिनके सार्थक खंड (टुकड़े) नहीं किए जा सकते। यदि इनके टुकड़े किए जाएँ, तो उन टुकड़ों का कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं निकलता।

  • उदाहरण: दूध (दू+ध = निरर्थक), गाय, रोटी, दीपक, पेड़, पत्थर, देवता, आकाश, मेंढक, स्त्री। ये शब्द अपने मूल रूप में ही पूर्ण हैं।
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2. यौगिक शब्द (Compound Words)

‘यौगिक’ का अर्थ है – योग से बना हुआ। वे शब्द जो दो या दो से अधिक सार्थक शब्दों या शब्दांशों (उपसर्ग/प्रत्यय) के मेल से बने होते हैं।

  • विशेषता: इनके खंड सार्थक होते हैं और इन खंडों का अर्थ मिलकर ही मुख्य शब्द का अर्थ बनाते हैं।
  • निर्माण प्रक्रिया: उपसर्ग, प्रत्यय, संधि और समास के द्वारा।
  • उदाहरण:
    • विद्यालय = विद्या + आलय (विद्या का घर)
    • प्रेमसागर = प्रेम + सागर
    • प्रतिदिन = प्रति + दिन
    • दूधवाला = दूध + वाला
    • राष्ट्रपति = राष्ट्र + पति

3. योगरूढ़ शब्द (Complex/Specialized Words)

ये शब्द संरचना की दृष्टि से तो ‘यौगिक’ होते हैं (अर्थात् दो शब्दों से मिलकर बनते हैं), किन्तु अर्थ की दृष्टि से ‘रूढ़’ हो जाते हैं। ये शब्द अपने सामान्य शाब्दिक अर्थ को छोड़कर किसी तीसरे ‘विशेष अर्थ’ (Specific Meaning) का बोध कराते हैं। बहुव्रीहि समास के अधिकांश उदाहरण इसी श्रेणी में आते हैं।

  • उदाहरण:
    • पीताम्बर: पीत (पीला) + अम्बर (वस्त्र) = पीला वस्त्र धारण करने वाले (अर्थात् भगवान विष्णु/कृष्ण)। यहाँ इसका अर्थ केवल ‘पीला कपड़ा’ नहीं है।
    • जलज: जल + ज (जन्म लेने वाला) = कमल। (यद्यपि जल में मछली, सीप आदि भी जन्म लेते हैं, पर ‘जलज’ शब्द कमल के लिए रूढ़ हो गया है)।
    • अन्य उदाहरण: दशानन (रावण), लंबोदर (गणेश), त्रिनेत्र (शिव), घनश्याम, रजनीचर, मुरारि, चक्रधर, षडानन आदि।

(ग) प्रयोग या व्याकरणिक प्रकार्य के आधार पर (Based on Usage/Grammar)

वाक्य में प्रयोग करते समय शब्दों के रूप में परिवर्तन होता है या नहीं, इस आधार पर शब्दों को दो वर्गों में बाँटा जाता है:

1. विकारी शब्द (Declinable Words)

‘विकार’ का अर्थ है – परिवर्तन। वे शब्द जिनमें लिंग (Gender), वचन (Number), कारक (Case) या काल (Tense) के कारण रूप-परिवर्तन (Modification) हो जाता है, विकारी शब्द कहलाते हैं। हिंदी में विकारी शब्द चार प्रकार के होते हैं:

  1. संज्ञा (Noun): जैसे – लड़का (लड़के, लड़कों)।
  2. सर्वनाम (Pronoun): जैसे – मैं (मुझे, मेरा, हम)।
  3. विशेषण (Adjective): जैसे – अच्छा (अच्छी, अच्छे)।
  4. क्रिया (Verb): जैसे – जाता है (जाती है, जाएंगे, गया)।

2. अविकारी या अव्यय शब्द (Indeclinable Words)

‘अ-विकारी’ अर्थात् जिनमें कोई विकार न हो। वे शब्द जिनका रूप सदैव एक सा रहता है और लिंग, वचन या काल के प्रभाव से उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता। इन्हें ‘अव्यय’ (जो व्यय/खर्च न हो) भी कहते हैं। अविकारी शब्द भी चार प्रकार के होते हैं:

  1. क्रिया-विशेषण (Adverb): धीरे-धीरे, आज, कल, यहाँ।
  2. संबंध बोधक (Preposition): के साथ, के बिना, के ऊपर।
  3. समुच्चय बोधक (Conjunction): और, किन्तु, परन्तु, इसलिए।
  4. विस्मयादि बोधक (Interjection): अरे!, वाह!, शाबाश!

(घ) अर्थ के आधार पर (Based on Meaning/Semantics)

अर्थ की स्पष्टता और विविधता के आधार पर शब्दों का वर्गीकरण अत्यंत सूक्ष्म और विस्तृत है:

1. एकार्थी शब्द (Univocal Words)

जिन शब्दों का केवल एक ही निश्चित अर्थ होता है और उनका प्रयोग सामान्यतः उसी अर्थ में किया जाता है। व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ प्रायः इसी श्रेणी में आती हैं।

  • उदाहरण: गंगा, पटना, जर्मन, दिन, धूप, लड़का, पहाड़, नदी (सामान्य संदर्भ में)।

2. अनेकार्थी शब्द (Polysemous Words)

जिन शब्दों के एक से अधिक अर्थ होते हैं और प्रसंग (Context) के अनुसार उनका अर्थ बदल जाता है। भारतीय साहित्य में श्लेष अलंकार में इनका बहुधा प्रयोग होता है।

  • उदाहरण:
    • अज: बकरा, ब्रह्मा, दशरथ के पिता, अजन्मा।
    • अमृत: सुधा, जल, दूध, पारा।
    • कर: हाथ, टैक्स (Tax), हाथी की सूँड़, किरण।
    • सारंग: मोर, सर्प, बादल, हरिण, पपीहा, दीपक।
    • हरि: विष्णु, बंदर, इंद्र, सूर्य, तोता, सर्प।

3. पर्यायवाची शब्द (Synonyms)

वे शब्द जो ध्वनि और रूप में भिन्न होते हुए भी अर्थ में समानता रखते हैं। यद्यपि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो कोई भी दो शब्द पूर्णतः समान नहीं होते, उनका प्रयोग संदर्भ पर निर्भर करता है (जैसे ‘जल’ पूजा के लिए और ‘पानी’ सामान्य प्रयोग के लिए), फिर भी अर्थ की निकटता के कारण इन्हें समानार्थी माना जाता है।

  • उदाहरण:
    • अमृत: पीयूष, सुधा, अमिय, सोम, सुरभोग।
    • अग्नि: आग, पावक, अनल, हुताशन, कृशानु।
    • आकाश: गगन, नभ, अम्बर, व्योम, शून्य।

4. विलोम या विपरीतार्थक शब्द (Antonyms)

जो शब्द एक-दूसरे का उल्टा या विपरीत अर्थ प्रकट करते हैं।

  • नियम: तत्सम शब्द का विलोम तत्सम और तद्भव का विलोम तद्भव होना चाहिए।
  • उदाहरण:
    • दिन – रात
    • उर्वर – ऊसर
    • आर्द्र – शुष्क
    • जंगम – स्थावर
    • आलोक – तिमिर

5. सम-उच्चरित या युग्म शब्द (Homophones)

ऐसे शब्द जिनका उच्चारण सुनने में लगभग समान लगता है, किन्तु उनकी वर्तनी में सूक्ष्म अंतर होता है और अर्थ में पूर्णतः भिन्नता होती है। इन्हें ‘श्रुतिसम-भिन्नार्थक शब्द’ भी कहते हैं।

  • उदाहरण:
    • आदि (प्रारंभ) – आदी (अभ्यस्त/लत होना)
    • अनिल (हवा) – अनल (आग)
    • कुल (वंश/सब) – कूल (किनारा)
    • तरंग (लहर) – तुरंग (घोड़ा)

6. वाक्यांश के लिए एक शब्द (One Word Substitution)

भाषा में संक्षिप्तता और प्रभाव लाने के लिए जब शब्दों के समूह या पूरे वाक्यांश के स्थान पर एक शब्द का प्रयोग किया जाता है।

  • उदाहरण:
    • जहाँ जाना संभव न हो = अगम्य
    • जो अपनी बात से टले नहीं = अटल
    • जिसका कोई शत्रु न जन्मा हो = अजातशत्रु
    • जो कम बोलता हो = मितभाषी

7. समानार्थक प्रतीत होनेवाले भिन्नार्थक शब्द (Words with subtle distinctions)

ये शब्द पर्यायवाची जैसे लगते हैं, लेकिन इनके प्रयोग और अर्थ में सूक्ष्म अंतर होता है।

  • अस्त्र: वह हथियार जिसे फेंककर चलाया जाता है। (जैसे–तीर, भाला, बम)।
  • शस्त्र: वह हथियार जिसे हाथ में थामकर चलाया जाता है। (जैसे–तलवार, लाठी, गदा)।
  • अहंकार: झूठा घमंड (नकारात्मक)।
  • गर्व: उचित स्वाभिमान (सकारात्मक)।

8. समूहवाची शब्द (Collective Words)

हिंदी में समूह (Group) को व्यक्त करने के लिए वस्तु के अनुसार अलग-अलग शब्दों का प्रयोग होता है:

  • गट्ठर: लकड़ी या पुस्तकों का।
  • गुच्छा: चाबियों या अंगूरों का।
  • गिरोह: डाकुओं या माफिया का (नकारात्मक अर्थ में)।
  • रेवड़: भेड़-बकरियों का।
  • काफिला: यात्रियों या सेना का।
  • झुंड: पशुओं का।
  • मंडली: गायकों या मित्रों की।

9. ध्वन्यार्थक शब्द (Onomatopoeic Words)

वे शब्द जिनका अर्थ उनकी ध्वनि पर आधारित होता है। यह भाषा की स्वाभाविकता को दर्शाते हैं।

  • पशुओं की बोलियाँ:
    • दहाड़ना (शेर), भौंकना (कुत्ता), हिनहिनाना (घोड़ा), चिंघाड़ना (हाथी), मिमियाना (भेड़, बकरी), रंभाना (गाय), फुँफकारना (साँप), टर्राना (मेंढक), गुर्राना (चीता), म्याऊँ (बिल्ली)।
  • पक्षियों की बोलियाँ:
    • चहचहाना (चिड़िया), पीऊ-पीऊ (पपीहा), काँव-काँव (कौआ), गुटर-गूँ (कबूतर), कुकड़ू-कूँ (मुर्गा), कुहकना (कोयल)।
  • जड़ पदार्थों की ध्वनियाँ:
    • कड़कना (बिजली), खटखटाना (दरवाजा), छुक-छुक (रेलगाड़ी), गरजना (बादल), खनखनाना (सिक्के/चूड़ियाँ), फड़फड़ाना (पंख)।

निष्कर्ष

शब्द-विचार हिंदी व्याकरण का वह आधारस्तंभ है जिस पर भाषा का भव्य भवन खड़ा है। शब्दों की उत्पत्ति, संरचना और अर्थ के सूक्ष्म भेदों को समझकर ही हम भाषा का शुद्ध, प्रभावशाली और सटीक प्रयोग कर सकते हैं। आधुनिक दौर में जब हिंदी वैश्विक पटल पर उभर रही है, तब तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों का यह समन्वय इसे और अधिक लोचदार (Flexible) और समृद्ध बनाता है।

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