संज्ञा की परिभाषा, भेद, प्रयोग और उदाहरण हिंदी व्याकरण

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भाषा की सबसे सार्थक और स्वतंत्र इकाई ‘शब्द’ है। व्याकरणिक संरचना में शब्दों का महत्व सर्वाधिक है। जब कोई शब्द किसी वाक्य में प्रयुक्त होकर एक निश्चित व्याकरणिक प्रकार्य (Grammatical Function) का निर्वहन करता है, तो वह केवल ‘शब्द’ न रहकर ‘पद’ (Term) कहलाता है। वाक्य में प्रयुक्त होने पर अन्य शब्दों के साथ उसका अन्वय (संबंध) स्थापित होता है और इसी संबंध की अभिव्यक्ति के लिए शब्द अपने मूल स्वरूप में परिवर्तन करता है अथवा कई नए स्वरूपों में प्रकट होता है।

प्रयोग, रूप-परिवर्तन और विकार की दृष्टि से हिंदी व्याकरण में शब्दों को मुख्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया गया है:

शब्दों का व्याकरणिक वर्गीकरण

1. विकारी शब्द (Declinable Words): वे शब्द जिनमें लिंग, वचन, कारक और काल के प्रभाव से विकार (परिवर्तन) उत्पन्न होता है। इसके अंतर्गत संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया आते हैं।

2. अविकारी शब्द (Indeclinable Words): वे शब्द जो हर स्थिति में अपने मूल रूप में बने रहते हैं और जिनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। इन्हें ‘अव्यय’ भी कहा जाता है।

संज्ञा (Noun)

1. परिभाषा

व्याकरणिक शब्दावली में ‘संज्ञा’ (सम् + ज्ञा) का शाब्दिक अर्थ है- ‘सम्यक ज्ञान कराने वाला’। साधारण शब्दों में कहें तो संसार में अस्तित्व रखने वाली (मूर्त) या अनुभव की जाने वाली (अमूर्त) किसी भी इकाई के ‘नाम’ को ही संज्ञा कहते हैं।

नाम ही किसी वस्तु, व्यक्ति या भाव की पहचान है। यदि हम एक उदाहरण देखें:

“राम ने आगरा में ताजमहल की सुंदरता देखी।”

इस वाक्य का व्याकरणिक विश्लेषण करने पर हम पाते हैं:

  • राम: यह एक विशेष व्यक्ति का नाम है।
  • आगरा: यह एक विशेष स्थान का नाम है।
  • ताजमहल: यह एक विशेष वस्तु/इमारत का नाम है।
  • सुंदरता: यह एक गुण या भाव का नाम है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है।

अतः, मानक परिभाषा के अनुसार:

“किसी प्राणी, व्यक्ति, स्थान, वस्तु, अवस्था, गुण अथवा भाव के नाम का बोध कराने वाले विकारी शब्दों को ‘संज्ञा’ कहा जाता है।”

2. संज्ञा के भेद (Classification of Noun)

हिंदी व्याकरण में संज्ञा के भेदों को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं, किंतु मुख्य रूप से और NCERT के मानकों के अनुसार संज्ञा के तीन मूल भेद स्वीकार किए गए हैं। अंग्रेजी व्याकरण के प्रभाव से प्रचलित ‘द्रव्यवाचक’ और ‘समूहवाचक’ संज्ञाओं को हिंदी में ‘जातिवाचक संज्ञा’ के उपभेदों के रूप में समाहित किया जाता है।

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संज्ञा के तीन प्रमुख भेद हैं:

  1. व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun)
  2. जातिवाचक संज्ञा (Common Noun)
  3. भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun)

(क) व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun)

जिस संज्ञा शब्द से किसी एक ही विशिष्ट व्यक्ति, वस्तु या स्थान के नाम का बोध हो, उसे ‘व्यक्तिवाचक संज्ञा’ कहते हैं। यह संज्ञा अपने आप में ‘विशिष्ट’ (Specific) होती है, ‘सामान्य’ (General) नहीं।

प्रमुख विशेषता: व्यक्तिवाचक संज्ञा सदैव एकवचन में प्रयुक्त होती है (अपवादों को छोड़कर)। यह किसी वर्ग का नहीं, बल्कि उस वर्ग के एक विशेष सदस्य का परिचय देती है।

उदाहरण और श्रेणियाँ:

  • व्यक्तियों के नाम: राम, कृष्ण, महात्मा गांधी, लता मंगेशकर।
  • दिशाओं के नाम: उत्तर, पश्चिम, ईशान।
  • देशों और राष्ट्रीयताओं के नाम: भारत, जापान, अमेरिका, भारतीय, रूसी।
  • नदियों और पर्वतों के नाम: गंगा, यमुना, हिमालय, विंध्याचल, अलकनंदा।
  • समुद्रों के नाम: हिंद महासागर, प्रशांत महासागर, काला सागर।
  • पुस्तकों और समाचार-पत्रों के नाम: रामचरितमानस, ऋग्वेद, दैनिक जागरण, द टाइम्स ऑफ इंडिया।
  • दिनों और महीनों के नाम: सोमवार, मंगलवार, जनवरी, चैत्र, वैशाख।
  • त्योहारों और उत्सवों के नाम: होली, दीपावली, गणतंत्र दिवस, रक्षाबंधन।
  • नगरों, चौकों और सड़कों के नाम: दिल्ली, वाराणसी, चांदनी चौक, अशोक राजपथ।

(ख) जातिवाचक संज्ञा (Common Noun)

जिस संज्ञा शब्द से किसी एक ही प्रकार की वस्तुओं अथवा प्राणियों की संपूर्ण जाति (Class or Category) या समुदाय का बोध होता हो, उसे ‘जातिवाचक संज्ञा’ कहते हैं। यह शब्द किसी विशेष का नाम न होकर, उस जैसे सभी पदार्थों का सामान्य नाम होता है।

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उदाहरण:

  • प्राणी: गाय, मनुष्य, घोड़ा, शेर। (जब हम ‘गाय’ कहते हैं, तो यह किसी एक विशेष गाय नहीं, बल्कि विश्व की समस्त गाय प्रजाति का बोध कराती है।)
  • वस्तुएँ: पुस्तक, कुर्सी, मेज, घड़ी, कलम।
  • प्राकृतिक तत्व: नदी, पहाड़, ज्वालामुखी, वर्षा।
  • पद और व्यवसाय: डॉक्टर, वकील, शिक्षक, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, भाई, बहन।

जातिवाचक संज्ञा के दो अन्य आयाम (अंग्रेजी प्रभाव से): यद्यपि मूल हिंदी व्याकरण में इन्हें अलग नहीं गिना जाता, फिर भी अध्ययन की सुविधा हेतु इन्हें जातिवाचक के अंतर्गत ही समझा जाता है:

  1. द्रव्यवाचक संज्ञा (Material Noun): जिन संज्ञा शब्दों से किसी धातु, द्रव्य या पदार्थ का बोध हो जिसे मापा या तौला जा सके (किंतु गिना न जा सके)।
    • उदाहरण: सोना, चाँदी, लोहा, दूध, पानी, तेल, घी, गेहूँ, चावल, ऑक्सीजन।
  2. समूहवाचक संज्ञा (Collective Noun): जिन शब्दों से किसी एक वस्तु का नहीं, बल्कि समूह या समुदाय का बोध हो।
    • उदाहरण: कक्षा, सेना, भीड़, दल, गिरोह, गुच्छा, मंडल, परिवार, पुस्तकालय।

(ग) भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun)

जिस संज्ञा शब्द से किसी प्राणी या वस्तु की स्थिति, गुण, दोष, धर्म, दशा, कार्य-व्यापार या मनोभाव का बोध होता है, उसे ‘भाववाचक संज्ञा’ कहते हैं।

विशेषता: भाववाचक संज्ञाएँ अमूर्त (Intangible) होती हैं। इनका कोई भौतिक आकार नहीं होता; इन्हें केवल अनुभव किया जा सकता है, स्पर्श नहीं।

उदाहरण:

  • गुण-दोष: सुंदरता, कुशाग्रता, मूर्खता, ईमानदारी।
  • अवस्था/दशा: बुढ़ापा, जवानी, बचपन, यौवन, प्यास, भूख।
  • भाव: क्रोध, प्रेम, शत्रुता, मिठास, खटास।
  • क्रिया-व्यापार: चढ़ाई, बहाव, सजावट।

3. भाववाचक संज्ञा की रचना (Formation of Abstract Nouns)

हिंदी भाषा की शब्द-संपदा में भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण बहुत महत्वपूर्ण है। मूल रूप से कुछ शब्द भाववाचक होते हैं (जैसे- सत्य, क्षमा, दया), परंतु अधिकांश भाववाचक संज्ञाएँ अन्य शब्दों में प्रत्यय (Suffix) जोड़कर बनाई जाती हैं।

इनकी रचना मुख्य रूप से पाँच प्रकार के शब्दों से होती है:

  1. जातिवाचक संज्ञा से
  2. सर्वनाम से
  3. विशेषण से
  4. क्रिया से
  5. अव्यय से

नीचे दी गई तालिकाओं में मानक वर्तनी के साथ इनका विस्तृत विवरण प्रस्तुत है:

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(1) जातिवाचक संज्ञा से भाववाचक संज्ञा

जातिवाचक संज्ञाओं में ‘ता’, ‘त्व’, ‘पन’, ‘ई’ आदि प्रत्यय जोड़कर भाववाचक संज्ञाएँ बनाई जाती हैं।

जातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञा (रूपांतरण)जातिवाचक संज्ञाभाववाचक संज्ञा (रूपांतरण)
शिशुशैशव, शिशुताविद्वानविद्वत्ता
मित्रमित्रता, मैत्रीपशुपशुता, पशुत्व
पुरुषपौरुष, पुरुषत्वसतीसतीत्व
लड़कालड़कपनगुरुगुरुत्व, गौरव
बच्चाबचपनसज्जनसज्जनता
आदमीआदमियतइंसानइंसानियत
दानवदानवताबूढ़ाबुढ़ापा
बंधुबंधुत्वव्यक्तिव्यक्तित्व
ईश्वरऐश्वर्यचोरचोरी
ठगठगीदासदासता, दासत्व
ब्राह्मणब्राह्मणत्वक्षत्रियक्षत्रियत्व
मातामातृत्वपितापितृत्व

(2) सर्वनाम से भाववाचक संज्ञा

सर्वनाम शब्दों में ‘त्व’, ‘पन’, ‘कार’ आदि प्रत्यय जोड़कर इनका निर्माण होता है।

सर्वनामभाववाचक संज्ञासर्वनामभाववाचक संज्ञा
ममममता, ममत्वस्वस्वत्व
आपआपासर्वसर्वस्व
निजनिजता, निजत्वअपनाअपनापन, अपनत्व
अहंअहंकारपरायापरायापन

(3) विशेषण से भाववाचक संज्ञा

विशेषण शब्दों से बनी भाववाचक संज्ञाएँ किसी गुण या अवस्था को दर्शाती हैं। इनमें ‘आई’, ‘ता’, ‘आस’, ‘य’ आदि प्रत्यय प्रमुख हैं।

विशेषणभाववाचक संज्ञाविशेषणभाववाचक संज्ञा
कठोरकठोरताविधवावैधव्य
चालाकचालाकीशिष्टशिष्टता
ऊँचाऊँचाईनम्रनम्रता
बुराबुराईमोटामोटापा
स्वस्थस्वास्थ्यमीठामिठास
सरलसरलताशूरशूरता, शौर्य
चतुरचतुराई, चातुर्यसहायकसहायता
आलसीआलस्यगर्मगर्मी
निपुणनिपुणता, नैपुण्यबहुतबहुतायत
मूर्खमूर्खतावीरवीरता, वीर्य
न्यूनन्यूनताआवश्यकआवश्यकता
हराहरियालीपतितपतन
छोटाछुटपनदुष्टदुष्टता
कालाकालिमा, कालापननिर्बलनिर्बलता
सुंदरसुंदरता, सौंदर्यललितलालित्य
करुणकरुणामहत्महत्ता, महत्व

(4) क्रिया से भाववाचक संज्ञा

क्रिया के मूल रूप (धातु) में प्रत्यय जोड़कर भाववाचक संज्ञाएँ बनाई जाती हैं। इसे ‘कृदंत भाववाचक संज्ञा’ भी कहते हैं।

क्रियाभाववाचक संज्ञाक्रियाभाववाचक संज्ञा
सुननासुनवाईगिरनागिरावट
चलनाचालकमानाकमाई
बैठनाबैठकपहचाननापहचान
खेलनाखेलजीनाजीवन
चमकनाचमकसजानासजावट
लिखनालिखावट, लेखपढ़नापढ़ाई
जमनाजमावपूजनापूजा
हँसनाहँसीगूँजनागूँज
जलनाजलनभूलनाभूल
गानागानउड़नाउड़ान
हारनाहारथकनाथकावट, थकान
पीनापानबिकनाबिक्री
घबरानाघबराहटचुननाचुनाव

(5) अव्यय से भाववाचक संज्ञा

कुछ अव्यय (अविकारी) शब्दों से भी भाववाचक संज्ञाओं का निर्माण होता है।

अव्ययभाववाचक संज्ञाअव्ययभाववाचक संज्ञा
दूरदूरीऊपरऊपरी
धिक्धिक्कारशीघ्रशीघ्रता
मनामनाहीनिकटनिकटता, नैकट्य
नीचेनिचाईसमीपसामीप्य
परस्परपारस्पर्यबाहरबाहरी

4. निष्कर्ष

वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा शब्द का व्याकरणिक परिचय देना ही ‘पद-परिचय’ कहलाता है। संज्ञा के विस्तृत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य भाषा में शुद्धता और स्पष्टता लाना है। संक्षेप में, संज्ञा वह धुरी है जिस पर वाक्य का ढांचा खड़ा होता है। चाहे वह किसी व्यक्ति की पहचान हो (व्यक्तिवाचक), किसी वर्ग का प्रतिनिधित्व हो (जातिवाचक), या मानवीय संवेदनाओं और अमूर्त विचारों की अभिव्यक्ति हो (भाववाचक); संज्ञा के बिना भाषा का अस्तित्व संभव नहीं है।

विद्यार्थियों को चाहिए कि वे इन भेदों और रचना-प्रक्रियाओं का निरंतर अभ्यास करें, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाओं और शैक्षणिक मूल्यांकन दोनों ही दृष्टियों से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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