राजस्थान के प्रमुख लोक देवताओं में पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी, हड़बूजी, देवनारायण जी और कल्ला जी शामिल हैं, जिनमें से पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, हड़बूजी और मेहा जी को 'पंच पीर' कहा जाता है, जो राजस्थान की संस्कृति और इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं

राजस्थान के लोक देवता

राजस्थान की संस्कृति में ‘लोक देवताओं’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये वे महापुरुष हैं जिन्होंने अपने अलौकिक कार्यों, गौ-रक्षा, समाज सुधार, और वचन-पालन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। ऐतिहासिक दृष्टि से, इन महापुरुषों का उदय मध्यकाल (विशेषकर 13वीं से 16वीं शताब्दी) के दौरान हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं और स्थानीय सामंतों से सामान्य […]

राजस्थान के लोक देवता Read More »

राजस्थान की प्रमुख लोक देवियों में करणी माता (बीकानेर की कुलदेवी, चूहों वाली देवी), केला देवी (करौली की कुलदेवी, योगमाया), जीण माता (सीकर की चौहान वंश की देवी), शीतला माता (बसवा, जयपुर की देवी, बच्चों की रक्षक), सच्चियाय माता (ओसवालों की कुलदेवी) और नारायणी माता (नाइयों की देवी) शामिल हैं

राजस्थान की लोक देवियां

राजस्थान की मरुधरा न केवल शूरवीरों और त्याग की भूमि है, बल्कि यह शक्ति उपासना का भी एक प्रमुख केंद्र रही है। राजस्थानी संस्कृति में ‘लोक देवियों’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ ‘कुलदेवी’ (जिस वंश में जन्म लिया हो उसकी देवी) और ‘आराध्य देवी’ (जिसकी पूजा इष्ट के रूप में की जाती है) की

राजस्थान की लोक देवियां Read More »

राजस्थान की कला और संस्कृति में कई प्रमुख संत और संप्रदाय शामिल हैं, जो भक्ति, सामाजिक समानता और आध्यात्मिक ज्ञान के संदेशों से समृद्ध हैं, जिनमें रामानंदी, वल्लभ, रामस्नेही, जसनाथी, विश्नोई, निम्बार्क, दादू पंथ, और लालदासी संप्रदाय प्रमुख हैं, जिन्होंने संत मीराबाई, संत धन्ना, संत पीपा, संत जाम्भोजी, संत जसनाथ, और संत दादू दयाल जैसे महान संतों के माध्यम से समाज को दिशा दी

राजस्थान की कला एवं संस्कृति: प्रमुख संत एवं सम्प्रदाय

प्रस्तावना राजस्थान की पावन धरा शूरवीरों की ही नहीं, अपितु संतों और भक्तों की भी भूमि रही है। मध्यकाल में जब भारतीय समाज धार्मिक आडंबरों और बाह्य आक्रमणों से जूझ रहा था, तब राजस्थान में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ। यहाँ की भक्ति धारा को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता

राजस्थान की कला एवं संस्कृति: प्रमुख संत एवं सम्प्रदाय Read More »

राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत त्यौहारों, मेलों और पर्वों से सराबोर है, जिनमें पुष्कर मेला (ऊँटों का सबसे बड़ा मेला), जैसलमेर मरु महोत्सव (रेगिस्तानी संस्कृति का उत्सव), तीज (महिलाओं का प्रमुख त्यौहार), गणगौर (पार्वती पूजा), और मारवाड़ उत्सव (शूरवीरों की याद में) जैसे अनेक रंगीन और जीवंत आयोजन शामिल हैं, जो लोक नृत्य (घूमर, कालबेलिया), संगीत, पारंपरिक कला, हस्तशिल्प, और पशुधन व्यापार को प्रदर्शित करते हैं, राज्य की समृद्ध विरासत को दर्शाते हैं।

राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत: त्यौहार, मेले एवं पर्व

1. प्रस्तावना (Introduction) राजस्थान, जिसे ‘रंगीलो राजस्थान’ के नाम से जाना जाता है, अपनी जीवंत संस्कृति और परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ की संस्कृति में त्यौहारों और मेलों का विशेष महत्व है। एक कहावत प्रसिद्ध है— “सात वार और नौ त्यौहार”—जो यह दर्शाती है कि यहाँ त्यौहारों की निरंतरता बनी रहती है। शैक्षणिक

राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत: त्यौहार, मेले एवं पर्व Read More »

rajasthan-tyohaar-mele राजस्थान अपने रंगीन त्योहारों और मेलों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें पुष्कर मेला (ऊंट मेला), जैसलमेर रेगिस्तान महोत्सव, बीकानेर ऊंट महोत्सव, नागौर मेला, तीज, और गणगौर जैसे प्रमुख हैं

राजस्थान के मेले एवं उत्सव

प्रस्तावना राजस्थान, जिसे ‘रंगीला राजस्थान’ के नाम से जाना जाता है, अपनी जीवंत संस्कृति, लोक परंपराओं और मेलों के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ के मेले केवल वाणिज्यिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक मिलन, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के सशक्त माध्यम हैं। राज्य में पशु मेलों का आर्थिक महत्व अत्यधिक है, जो ग्रामीण

राजस्थान के मेले एवं उत्सव Read More »

Scroll to Top