धारा 229 BNS VS धारा 193 IPC: मिथ्या साक्ष्य के लिए दंड (Punishment for false evidence)

सजा (Punishment)

कठोर या सादा

संज्ञेय (Cognizable)

असंज्ञेय

जमानतीय (Bailable)

गैर-जमानती

समझौता योग्य (Compoundable

गैर-शमनीय

विचारणीय न्यायालय (Court)

प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट

IPC (पुराना कानून)

धारा 193

जो कोई साशय किसी न्यायिक कार्यवाही (Judicial proceeding) के किसी प्रक्रम में मिथ्या साक्ष्य देगा… वह 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडनीय होगा। (अन्य मामलों में 3 वर्ष)।

BNS (नया कानून)

धारा 229

जो कोई साशय किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा… वह 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडनीय होगा। (अन्य मामलों में 3 वर्ष)।

विशेषज्ञ टिप्पणी (Expert Analysis)

झूठी गवाही (Perjury) की सजा! BNS 229 (पूर्व IPC 193) के तहत यदि आप पुलिस/मजिस्ट्रेट इंक्वायरी या कोर्ट केस (Judicial Proceedings) में झूठ बोलते हैं या फर्जी हलफनामा देते हैं, तो जज आपको सीधे 7 साल के लिए जेल भेज सकता है। यह एक गंभीर (गैर-जमानती) अपराध है।

तुलना

न्याय व्यवस्था की पवित्रता बनाए रखने के लिए 7 साल की कड़ी सजा को बरकरार रखा गया है।

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