अध्याय आठ

CrPC Section 110 in Hindi: अभ्यासिक अपराधियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति

New Law Update (2024)

धारा 136 बी.एन.एस.एस.

TRIAL COURT

Punishment​

प्रक्रियात्मक / प्रशासनिक

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

जब प्रथम वर्ग के किसी मजिस्ट्रेट को यह इत्तिला मिलती है कि उसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अंदर कोई व्यक्ति—
(i) अभ्यास से लुटेरा, सेंधमार, चोर या कूटरचक है; अथवा
(ii) अभ्यास से चुराई हुई संपत्ति का प्राप्तकर्ता है यह जानते हुए कि वह चुराई हुई है; अथवा
(iii) अभ्यासिक रूप से चोरों को संरक्षण देता है या उन्हें संश्रय देता है, अथवा चुराई हुई संपत्ति को छिपाने या व्ययन करने में सहायता करता है; अथवा
(iv) अभ्यासिक रूप से व्यपहरण, अपहरण, उद्दापन, छल या रिष्टि के अपराध को करता है, अथवा करने का प्रयत्न करता है, अथवा उसके दुष्प्रेरण में सहायता करता है, अथवा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 12 के अधीन, अथवा उस संहिता की धारा 489क, धारा 489ख, धारा 489ग या धारा 489घ के अधीन दंडनीय कोई अपराध करता है; अथवा
(v) अभ्यासिक रूप से अपराध करता है, अथवा करने का प्रयत्न करता है, अथवा उसके दुष्प्रेरण में सहायता करता है, जिसमें परिशांति भंग अंतर्वलित है; अथवा
(vi) अभ्यासिक रूप से अपराध करता है, अथवा करने का प्रयत्न करता है, अथवा उसके दुष्प्रेरण में सहायता करता है—
(क) निम्नलिखित अधिनियमों में से किसी एक या अधिक के अधीन कोई अपराध, अर्थात्:
औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23);
विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46);
कर्मचारी भविष्य निधि और कुटुंब पेंशन निधि अधिनियम, 1952 (1952 का 19);
खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 (1954 का 37);
आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 (1955 का 10);
अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 (1955 का 22);
सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52); अथवा
विदेशी अधिनियम, 1946; अथवा
(ख) किसी अन्य विधि के अधीन दंडनीय कोई अपराध, जो जमाखोरी या मुनाफाखोरी या खाद्य या औषधियों के अपमिश्रण या भ्रष्टाचार के निवारण का उपबंध करती है; अथवा
(vii) इतना दुराग्रही और खतरनाक है कि उसकी स्वतंत्रता बिना प्रतिभूति के समुदाय के लिए संकटपूर्ण होगी,
तो ऐसा मजिस्ट्रेट, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से, ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह कारण दर्शित करे कि उसे सदाचार के लिए इतनी अवधि के लिए, जो तीन वर्ष से अधिक न होगी, जितनी मजिस्ट्रेट ठीक समझे, प्रतिभुओं सहित बंधपत्र निष्पादित करने का आदेश क्यों न दिया जाए।

Important Sub-Sections Explained

धारा 110(i) से (vi)

ये उपधाराएं ‘अभ्यासिक अपराधियों’ की विभिन्न श्रेणियों को परिभाषित करती हैं जिनसे प्रतिभूति की मांग की जा सकती है। वे ऐसे व्यक्तियों को शामिल करती हैं जो संपत्ति संबंधी अपराधों, चुराई गई वस्तुओं को प्राप्त करने, चोरों की सहायता करने, या बार-बार व्यपहरण, उद्दापन, छल जैसे गंभीर अपराधों को करने, या परिशांति भंग से जुड़े अपराधों, या विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक कानूनों के तहत अपराधों में अभ्यासिक रूप से शामिल होते हैं।

धारा 110(vii)

यह उपधारा उन व्यक्तियों को लक्षित करती है जिन्हें इतना दुराग्रही और खतरनाक माना जाता है कि प्रतिभूति के बिना उनकी स्वतंत्रता समुदाय की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण खतरा पैदा करती है। यह ऐसे लोगों के खिलाफ निवारक कार्रवाई की अनुमति देता है जिनका आचरण आम तौर पर खतरनाक है, भले ही वे अन्य ‘अभ्यासिक’ श्रेणियों में सख्ती से फिट न बैठते हों।

Landmark Judgements

कप्तान सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2021):

उच्चतम न्यायालय ने जोर दिया कि धारा 110 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत कार्यवाही किसी एक अपराध की घटना या अस्पष्ट सामान्य आरोपों के आधार पर शुरू नहीं की जा सकती है। अपराधों की ‘अभ्यासिक’ प्रकृति स्थापित करने के लिए ठोस सबूत होने चाहिए, और मजिस्ट्रेट की वस्तुनिष्ठ संतुष्टि विश्वसनीय जानकारी पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल आशंका पर।

राम नारायण सिंह बनाम बिहार राज्य (1972):

उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने ऐसी धाराओं की निवारक प्रकृति पर प्रकाश डाला, जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा उचित न्यायिक जांच के महत्व पर जोर दिया गया। इसने रेखांकित किया कि उद्देश्य दंडित करना नहीं बल्कि प्रतिभूति की अपेक्षा करके भविष्य में होने वाली हानि को रोकना है, और उचित प्रक्रिया का सावधानीपूर्वक पालन किया जाना चाहिए।

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