अध्याय VIII

CrPC Section 121 in Hindi: प्रतिभूओं को अस्वीकार करने की शक्ति

New Law Update (2024)

धारा 171 बी.एन.एस.एस.

TRIAL COURT

Punishment​

प्रक्रियात्मक – वारंट / समन प्रक्रिया

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) मजिस्ट्रेट किसी प्रस्तावित प्रतिभू को स्वीकार करने से इन्कार कर सकेगा या ऐसे किसी प्रतिभू को अस्वीकार कर सकेगा जिसे उसने या उसके पूर्वाधिकारी ने इस अध्याय के अधीन पहले स्वीकार कर लिया था, इस आधार पर कि ऐसा प्रतिभू बंधपत्र के प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति है: परन्तु ऐसा किसी प्रतिभू को स्वीकार करने से इन्कार करने या उसे अस्वीकार करने के पूर्व, वह या तो स्वयं प्रतिभू की उपयुक्तता के संबंध में शपथ पर जांच करेगा या ऐसी जांच अपने अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट से कराएगा और उससे उस पर रिपोर्ट कराएगा।
(2) ऐसा मजिस्ट्रेट जांच करने के पूर्व प्रतिभू को और उस व्यक्ति को जिसके द्वारा प्रतिभू प्रस्तावित किया गया था, युक्तियुक्त सूचना देगा और जांच करते समय अपने समक्ष पेश किए गए साक्ष्य का सार अभिलिखित करेगा।
(3) यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है, इस प्रकार पेश किए गए साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् चाहे वह उसके समक्ष हो या उपधारा (1) के अधीन प्रतिनियुक्त किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष और ऐसे मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट पर (यदि कोई हो), कि प्रतिभू बंधपत्र के प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्त व्यक्ति है, तो वह उस प्रतिभू को स्वीकार करने से इन्कार करने या उसे अस्वीकार करने का, यथास्थिति, आदेश करेगा और ऐसा करने के अपने कारण अभिलिखित करेगा: परन्तु किसी ऐसे प्रतिभू को अस्वीकार करने का आदेश करने के पूर्व जिसे पहले स्वीकार कर लिया गया था, मजिस्ट्रेट, जैसा वह ठीक समझे, अपना समन या वारंट निकालेगा और उस व्यक्ति को, जिसके लिए प्रतिभू आबद्ध है, अपने समक्ष हाजिर कराएगा या उसे लाया जाएगा।

Important Sub-Sections Explained

धारा 121(1)

यह उपधारा मजिस्ट्रेट को प्रतिभू को अस्वीकार या नामंजूर करने का अधिकार देती है यदि उन्हें बंधपत्र के लिए अनुपयुक्त समझा जाता है, किन्तु ऐसा निर्णय लेने से पूर्व प्रतिभू की उपयुक्तता के संबंध में शपथ पर एक औपचारिक जांच अनिवार्य रूप से अपेक्षित करती है।

धारा 121(3)

यह महत्वपूर्ण उपधारा यह अधिदेश करती है कि जब कोई मजिस्ट्रेट प्रतिभू को अस्वीकार करता है, तो उसे अपने निर्णय के स्पष्ट कारण अभिलिखित करने होंगे। यह उस विशिष्ट प्रक्रिया को भी रेखांकित करती है जिसका पालन करना होता है, जिसमें मुख्य व्यक्ति को समन करना भी शामिल है, ऐसे प्रतिभू को अस्वीकार करने से पूर्व जिसे पहले स्वीकार कर लिया गया था।

Landmark Judgements

एम. वेलइचामी बनाम राज्य (1995):

मद्रास उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 121 के अधीन प्रतिभू को अस्वीकार करने का कोई भी आदेश स्पष्ट और सुसंगत कारणों से समर्थित होना चाहिए। ऐसे कारणों के अभाव में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा और अस्वीकरण को असमर्थनीय बना देगा।

राजेंद्र सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2000):

राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 121 के अधीन प्रतिभू की उपयुक्तता की जांच शपथ पर की गई एक उचित न्यायिक जांच होनी चाहिए, जिसमें प्रतिभू और प्रतिभू को प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को उचित अवसर प्रदान किया गया हो। ऐसी औपचारिक जांच के बिना अस्वीकृति को अवैध माना जाता है।

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