अध्याय XII
CrPC Section 173 in Hindi: अन्वेषण पूरा होने पर पुलिस अधिकारी का प्रतिवेदन
New Law Update (2024)
धारा 193 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
Punishment
प्रक्रियात्मक – संज्ञान
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) इस अध्याय के अधीन किया गया हर अन्वेषण अनावश्यक विलंब के बिना पूरा किया जाएगा।
(1क) भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 376क, 376कख, 376ख, 376ग, 376घ, 376घक, 376घख या 376ङ के अधीन किसी अपराध से संबंधित अन्वेषण, उस तारीख से दो मास के भीतर पूरा किया जाएगा जिसको पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा जानकारी अभिलिखित की गई थी।
(2) (i) जैसे ही वह पूरा होता है, पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी उस अपराध का संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट पर, राज्य सरकार द्वारा विहित प्ररूप में, एक रिपोर्ट भेजेगा, जिसमें निम्नलिखित बातें कथित होंगी—
(क) पक्षकारों के नाम;
(ख) जानकारी की प्रकृति;
(ग) उन व्यक्तियों के नाम जो मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होते हैं;
(घ) क्या कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है और यदि हां, तो किसके द्वारा;
(ङ) क्या अभियुक्त गिरफ्तार किया गया है;
(च) क्या उसे उसके बंधपत्र पर छोड़ दिया गया है और यदि हां, तो प्रतिभुओं सहित या रहित;
(छ) क्या उसे धारा 170 के अधीन अभिरक्षा में भेजा गया है।
(ज) क्या स्त्री की चिकित्सा परीक्षा की रिपोर्ट उपाबद्ध की गई है जहां अन्वेषण भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 376क, 376कख, 376ख, 376ग, 376घ, 376घक, 376घख, या 376ङ के अधीन किसी अपराध से संबंधित है।
(ii) अधिकारी, ऐसे व्यक्ति को भी, यदि कोई हो, जिसे अपराध किए जाने से संबंधित जानकारी सबसे पहले दी गई थी, उसके द्वारा की गई कार्रवाई की जानकारी ऐसे रीति में देगा जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए।
(3) जहां धारा 158 के अधीन पुलिस का कोई वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त किया गया है वहां रिपोर्ट ऐसे हर मामले में जिसमें राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश देती है, उस अधिकारी के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी और वह मजिस्ट्रेट के आदेशों के लंबित रहने तक, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को अतिरिक्त अन्वेषण करने का निदेश दे सकेगा।
(4) जब कभी इस धारा के अधीन भेजी गई रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त को उसके बंधपत्र पर छोड़ दिया गया है तब मजिस्ट्रेट उस बंधपत्र के उन्मोचन के लिए या अन्यथा ऐसा आदेश करेगा जैसा वह उचित समझे।
(5) जब ऐसी रिपोर्ट ऐसे मामले के संबंध में है जिसे धारा 170 लागू होती है, तब पुलिस अधिकारी रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजेगा—
(क) सभी दस्तावेज या उनके सुसंगत उद्धरण जिन पर अभियोजन निर्भर करने का प्रस्ताव करता है, उन दस्तावेजों से भिन्न जो अन्वेषण के दौरान मजिस्ट्रेट को पहले ही भेजे जा चुके हैं;
(ख) उन सभी व्यक्तियों के धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथन जिनकी अभियोजन अपने साक्षी के रूप में परीक्षा करने का प्रस्ताव करता है।
(6) यदि पुलिस अधिकारी की राय है कि ऐसे किसी कथन का कोई भाग कार्यवाही के विषय-वस्तु से सुसंगत नहीं है या उसका अभियुक्त को प्रकट किया जाना न्याय के हितों में आवश्यक नहीं है और लोक हित में अवांछनीय है, तो वह कथन के उस भाग पर, जिससे निर्देश संबंधित है, इस आशय का एक टिप्पण लिखेगा और उसे मजिस्ट्रेट को संसूचित करेगा।
(7) जहां पुलिस अधिकारी की राय है कि अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के पास भेजने को न्यायोचित ठहराने के लिए साक्ष्य पर्याप्त नहीं है, वहां पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, यदि अभियुक्त अभिरक्षा में है, तो उसे उसके बंधपत्र के निष्पादन पर, प्रतिभुओं सहित या रहित, जैसा ऐसा अधिकारी निदेश दे, मजिस्ट्रेट के समक्ष, जो पुलिस रिपोर्ट पर अपराध का संज्ञान लेने के लिए सशक्त है और उसे विचारित करने या विचारण के लिए सुपुर्द करने के लिए, यदि और जब ऐसा अपेक्षित हो, हाजिर होने के लिए निर्मुक्त कर देगा।
(8) इस धारा की कोई बात उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेज दिए जाने के पश्चात् किसी अपराध के संबंध में अतिरिक्त अन्वेषण को प्रतिवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी और जहां ऐसे अन्वेषण पर, पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी अतिरिक्त साक्ष्य अभिप्राप्त करता है, तो वह मजिस्ट्रेट को ऐसे साक्ष्य के बारे में विहित प्ररूप में एक और रिपोर्ट या रिपोर्टें भेजेगा; और उपधाराओं (2) से (6) के उपबंध, यथाशक्य, ऐसी किसी रिपोर्ट या रिपोर्टों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उपधारा (2) के अधीन भेजी गई रिपोर्ट के संबंध में लागू होते हैं।
Important Sub-Sections Explained
धारा 173(2)
यह उपधारा पुलिस को अन्वेषण पूरा होते ही मजिस्ट्रेट को एक विस्तृत रिपोर्ट (जिसे अक्सर आरोप पत्र या अंतिम रिपोर्ट कहा जाता है) प्रस्तुत करने का आदेश देती है, जिसमें मामले के प्रमुख तथ्य, गिरफ्तार व्यक्ति और एकत्रित साक्ष्य का वर्णन होता है, जिससे न्यायालय को संज्ञान लेने में सुविधा होती है।
धारा 173(8)
यह शक्तिशाली प्रावधान उपधारा (2) के अधीन एक रिपोर्ट दाखिल किए जाने के बाद भी पुलिस द्वारा अतिरिक्त अन्वेषण की अनुमति देता है। यह सुनिश्चित करता है कि अपूर्ण अन्वेषण से न्याय में बाधा न आए, नए साक्ष्य एकत्र करने और मजिस्ट्रेट को पूरक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की अनुमति देता है।
Landmark Judgements
विनुभाई हरीशभाई मालवीय बनाम गुजरात राज्य (2019):
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने धारा 173(8) दं.प्र.सं. के तहत मजिस्ट्रेट की अतिरिक्त अन्वेषण का निर्देश देने की शक्ति की पुष्टि की, यहां तक कि पुलिस रिपोर्ट स्वीकार करने और संज्ञान लेने के बाद भी, एक निष्पक्ष विचारण और पूर्ण अन्वेषण सुनिश्चित करने में इसकी भूमिका पर जोर दिया।
हसनभाई वलीभाई कुरैशी बनाम गुजरात राज्य (2004):
सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि धारा 173(8) के तहत अतिरिक्त अन्वेषण का आदेश देने की शक्ति मजिस्ट्रेट को आरोप पत्र दाखिल करने और संज्ञान लेने के बाद भी उपलब्ध है, यह स्पष्ट करते हुए कि यह एक न्यायपूर्ण विचारण के लिए प्रारंभिक अन्वेषण की निरंतरता है।
सतीश कुमार शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020):
इस मामले ने धारा 173 दं.प्र.सं. के तहत अंतिम रिपोर्ट (समापन रिपोर्ट) स्वीकार करने से पहले सूचनादाता के सुने जाने के अधिकार पर प्रकाश डाला। इसमें यह अनिवार्य किया गया कि सूचनादाता को विरोध याचिका दायर करने और मजिस्ट्रेट द्वारा सुने जाने का अधिकार है, जिससे पीड़ित के दृष्टिकोण पर विचार सुनिश्चित हो सके।
Draft Format / Application
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग / महानगर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में, [शहर, राज्य]
आपराधिक विविध आवेदन संख्या ________ सन् 20______
के मामले में:
[आवेदक/सूचनादाता का नाम]
पुत्र/पुत्री/पत्नी [पिता/पति का नाम]
आयु लगभग [आयु] वर्ष,
निवासी [पता]
… आवेदक/सूचनादाता
बनाम
राज्य [राज्य]
(पुलिस थाना [पुलिस थाना का नाम] के माध्यम से, एफ.आई.आर. संख्या [एफ.आई.आर. संख्या] सन् [वर्ष])
… प्रत्यर्थी
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 173(8) के अधीन अतिरिक्त अन्वेषण के लिए आवेदन
अत्यंत विनम्रतापूर्वक निवेदन है कि:
1. यह कि आवेदक/सूचनादाता ने पुलिस थाना [पुलिस थाना का नाम] में धारा [संबंधित भा.दं.सं. धाराएँ] के अधीन दंडनीय अपराधों के लिए [अभियुक्त/अज्ञात व्यक्तियों का नाम/नामों] के विरुद्ध एफ.आई.आर. संख्या [एफ.आई.आर. संख्या] सन् [वर्ष] दर्ज कराई थी।
2. यह कि उक्त एफ.आई.आर. के अनुसरण में, पुलिस द्वारा अन्वेषण किया गया था, और तत्पश्चात्, दिनांकित [रिपोर्ट की तारीख] का एक [आरोप पत्र/अंतिम रिपोर्ट] इस माननीय न्यायालय के समक्ष दाखिल किया गया था।
3. यह कि आवेदक/सूचनादाता प्रस्तुत करता है कि पुलिस द्वारा किया गया अन्वेषण निम्नलिखित कारणों से अपूर्ण/दोषपूर्ण/महत्वपूर्ण साक्ष्य की कमी है:
(क) [लापता साक्ष्य/अन्वेषण के पहलुओं को निर्दिष्ट करें, उदाहरण के लिए, “महत्वपूर्ण गवाह ए और बी की जांच नहीं की गई है।”]।
(ख) [आगे के बिंदुओं को निर्दिष्ट करें, उदाहरण के लिए, “आइटम एक्स की फॉरेंसिक रिपोर्ट अभी भी प्रतीक्षित है/पर विचार नहीं किया गया है।”]।
(ग) [आगे के बिंदुओं को निर्दिष्ट करें, उदाहरण के लिए, “अन्य अभियुक्त व्यक्तियों की संलिप्तता का ठीक से अन्वेषण नहीं किया गया है।”]।
4. यह कि आवेदक/सूचनादाता का मानना है कि जब तक इस माननीय न्यायालय द्वारा अतिरिक्त अन्वेषण का निर्देश नहीं दिया जाता, तब तक घोर अन्याय होगा, और मामले के सच्चे तथ्य सामने नहीं आएंगे।
5. यह कि आवेदक/सूचनादाता अतिरिक्त अन्वेषण के उद्देश्य से जांच एजेंसी को हर संभव तरीके से सहायता करने के लिए तैयार और इच्छुक है।
6. यह कि यह आवेदन सद्भावपूर्वक और न्याय के हित में प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रार्थना:
अतः, अत्यंत विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की जाती है कि यह माननीय न्यायालय कृपया निम्नलिखित आदेश पारित करें:
(क) जांच अधिकारी, पुलिस थाना [पुलिस थाना का नाम], को एफ.आई.आर. संख्या [एफ.आई.आर. संख्या] सन् [वर्ष] में अतिरिक्त अन्वेषण करने और धारा 173(8) दं.प्र.सं. के अधीन एक पूरक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दें।
(ख) वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में इस माननीय न्यायालय द्वारा जो भी उचित और उपयुक्त समझा जाए, ऐसा कोई अन्य आदेश या निर्देश पारित करें।
और इस दयालु कार्य के लिए, आवेदक अपने कर्तव्यबद्ध के रूप में सदैव प्रार्थना करेगा।
दिनांक: [दिनांक]
स्थान: [स्थान]
(आवेदक/सूचनादाता के हस्ताक्षर)
[आवेदक/सूचनादाता का नाम]
(आवेदक के अधिवक्ता के हस्ताक्षर)
[अधिवक्ता का नाम]
[पंजीयन संख्या]
[संपर्क विवरण]