अध्याय सतरहवाँ
CrPC Section 211 in Hindi: आरोप की अंतर्वस्तु
New Law Update (2024)
बी.एन.एस.एस. धारा 230
TRIAL COURT
Punishment
प्रक्रियात्मक – विचारण / आरोप
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) इस संहिता के अधीन हर आरोप में वह अपराध वर्णित होगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है।
(2) यदि उस विधि में, जिससे अपराध सृजित हुआ है, अपराध को कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया गया है तो आरोप में अपराध का वर्णन केवल उसी नाम से किया जा सकेगा।
(3) यदि उस विधि में, जिससे अपराध सृजित हुआ है, अपराध को कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया गया है तो अपराध की इतनी परिभाषा वर्णित की जाएगी कि अभियुक्त को उस बात की सूचना हो जाए जिसका उस पर आरोप है।
(4) उस विधि और विधि की उस धारा का, जिसके विरुद्ध अपराध का किया जाना अभिकथित है, आरोप में उल्लेख किया जाएगा।
(5) आरोप का विरचित किया जाना इस कथन के समतुल्य होगा कि विधि द्वारा अपेक्षित हर ऐसी विधिक शर्त, जिससे आरोपित अपराध बनता है, विशिष्ट मामले में पूरी कर दी गई थी।
(6) आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा।
(7) यदि अभियुक्त किसी अपराध के लिए पूर्व दोषसिद्ध होने के कारण किसी पश्चात् के अपराध के लिए वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का दायी है और ऐसे पूर्व दोषसिद्धि का साबित किया जाना ऐसे दंड पर प्रभाव डालने के प्रयोजन से आशयित है, जो पश्चात् के अपराध के लिए न्यायालय अधिनिर्णीत करना उचित समझे, तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में वर्णित किया जाएगा; और यदि ऐसे कथन का लोप कर दिया गया है तो न्यायालय उसे दंडादेश पारित किए जाने के पूर्व किसी भी समय जोड़ सकेगा।
Important Sub-Sections Explained
धारा 211(1)
यह उपधारा मूलभूत नियम निर्धारित करती है कि हर आरोप में वह सटीक अपराध स्पष्ट रूप से विनिर्दिष्ट किया जाना चाहिए जिसके लिए अभियुक्त का विचारण किया जा रहा है, जिससे विधिक कार्यवाहियों में पारदर्शिता और स्पष्टता सुनिश्चित हो सके।
धारा 211(7)
यह महत्वपूर्ण प्रावधान अधिदेशित करता है कि यदि पूर्व दोषसिद्धि किसी अभियुक्त को अधिक कठोर दंड के लिए पात्र बनाती है, तो उस दोषसिद्धि का विवरण (तथ्य, तारीख, स्थान) आरोप में स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया जाना चाहिए, जिससे न्यायालय उसे दंडादेश के लिए विचार कर सके।
Landmark Judgements
विलि (विलियम) स्लेनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1956):
उच्चतम न्यायालय के इस ऐतिहासिक मामले में यह स्थापित किया गया था कि आरोप में, उसकी अंतर्वस्तु सहित, त्रुटियाँ या चूकें विचारण के लिए घातक नहीं होती हैं, जब तक कि उनसे न्याय की विफलता न हुई हो। महत्वपूर्ण परीक्षण यह है कि क्या अभियुक्त आरोप में दोष के कारण गुमराह या पूर्वाग्रहित हुआ था, जिससे उसकी स्वयं का बचाव करने की क्षमता प्रभावित हुई हो।
सी. एम. नारायणस्वामी बनाम मद्रास राज्य (1951):
उच्चतम न्यायालय ने एक स्पष्ट और सटीक आरोप के मूलभूत महत्व पर जोर दिया, यह टिप्पणी करते हुए कि यह अभियुक्त को उनके विरुद्ध आरोपों की असंदिग्ध सूचना देने का कार्य करता है। आरोप में दोष, यद्यपि हमेशा दोषमुक्ति का कारण नहीं बनते, अभियुक्त को पूर्वाग्रहित कर सकते हैं और यदि न्याय की विफलता प्रदर्शित होती है तो सुधार या पुनः-विचारण को वारंट कर सकते हैं।