अध्याय XVII
CrPC Section 223 in Hindi: किन व्यक्तियों पर संयुक्ततः आरोप लगाया जा सकेगा
New Law Update (2024)
धारा 250 बीएनएसएस
TRIAL COURT
मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक / प्रशासनिक
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) एक ही अपराध के अभियुक्त व्यक्ति जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किया गया हो;
(2) किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति और ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण या उसे करने के प्रयत्न के अभियुक्त व्यक्ति;
(3) एक ही किस्म के एक से अधिक अपराधों के अभियुक्त व्यक्ति जो धारा 219 के अर्थ में उन्होंने बारह मास की अवधि के अंदर संयुक्ततः किए हों;
(4) भिन्न-भिन्न अपराधों के अभियुक्त व्यक्ति जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए हों;
(5) किसी ऐसे अपराध के अभियुक्त व्यक्ति जिसमें चोरी, उद्दापन, छल या आपराधिक दुर्विनियोग भी है, और ऐसे संपत्ति को, जिसके कब्जे का प्रथम वर्णित व्यक्तियों द्वारा किए गए ऐसे किसी अपराध द्वारा अंतरण होना अभिकथित है, प्राप्त करने या रखे रहने के या उसके व्ययन या छिपाने में सहायता करने के अभियुक्त व्यक्ति, या ऐसे अंतिम वर्णित अपराधों में से किसी के दुष्प्रेरण या उसे करने के प्रयत्न के अभियुक्त व्यक्ति;
(6) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 411 और 414 के अधीन अपराधों के अभियुक्त व्यक्ति या उनमें से किसी धारा के अधीन चुराई हुई ऐसी संपत्ति के बारे में जिसके कब्जे का एक अपराध द्वारा अंतरण हुआ है;
(7) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 12 के अधीन जाली सिक्के से संबंधित किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति और उक्त अध्याय के अधीन उसी सिक्के से संबंधित किसी अन्य अपराध के अभियुक्त व्यक्ति या ऐसे किसी अपराध के दुष्प्रेरण या उसे करने के प्रयत्न के अभियुक्त व्यक्ति; और इस अध्याय के पूर्वगामी भाग में अंतर्विष्ट उपबंध, जहां तक हो सकेगा, ऐसे सभी आरोपों को लागू होंगे; परंतु जहां कई व्यक्तियों पर पृथक्-पृथक् अपराधों का आरोप है और ऐसे व्यक्ति इस धारा में विनिर्दिष्ट किसी भी प्रवर्ग में नहीं आते हैं, वहां मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय, यदि ऐसे व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहें, और यदि वह संतुष्ट है कि ऐसे व्यक्तियों पर उससे प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, और ऐसा करना समीचीन है, तो ऐसे सभी व्यक्तियों का एक साथ विचारण कर सकेगा।
Important Sub-Sections Explained
धारा 223(1) दंड प्रक्रिया संहिता
यह उप-धारा कई व्यक्तियों के लिए संयुक्त विचारण की अनुमति देती है जब उन सभी पर एक ही अपराध करने का आरोप हो, बशर्ते ये अपराध घटनाओं या कार्यों की एक ही, निरंतर श्रृंखला (‘एक ही संव्यवहार’) के दौरान हुए हों।
धारा 223(4) दंड प्रक्रिया संहिता
यह महत्वपूर्ण प्रावधान कई व्यक्तियों के संयुक्त विचारण की अनुमति देता है, भले ही उन पर भिन्न-भिन्न अपराधों का आरोप हो, बशर्ते ये सभी भिन्न अपराध ‘एक ही संव्यवहार’ या घटनाओं के अनुक्रम के भीतर किए गए हों।
Landmark Judgements
आंध्र प्रदेश राज्य बनाम चीमलपति गणेश्वर राव (1964):
उच्चतम न्यायालय ने धारा 223 के तहत ‘एक ही संव्यवहार’ वाक्यांश की विस्तृत व्याख्या की, यह मानते हुए कि केवल समय की निकटता पर्याप्त नहीं है। ‘एक ही संव्यवहार’ गठित करने के लिए उद्देश्य, अभिकल्पना या कार्य में निरंतरता होनी चाहिए, जो संयुक्त विचारणों के लिए एक महत्वपूर्ण कसौटी प्रदान करती है।
नत्थी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1990):
उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि धारा 223 के तहत संयुक्त विचारण तब अनुमेय है जब अपराध, भले ही भिन्न हों, ‘एक ही संव्यवहार’ के अनुक्रम में किए गए हों। न्यायालय ने संयुक्त विचारण के लिए विवेकाधिकार का प्रयोग करते समय अभियुक्त को पूर्वाग्रह से बचाने के महत्व पर जोर दिया।