अध्याय 18
CrPC Section 228 in Hindi: आरोप विरचित करना
New Law Update (2024)
धारा 243 भारतीय न्याय संहिता
TRIAL COURT
सेशन न्यायालय, प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट
Punishment
प्रक्रियात्मक – वारंट / समन प्रक्रिया
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) यदि, पूर्वोक्त विचार और सुनवाई के पश्चात्, न्यायाधीश की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है जो —
(क) सेशन न्यायालय द्वारा अनन्यतः विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकता है और आदेश द्वारा मामले को विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या किसी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को अंतरित कर सकता है और अभियुक्त को ऐसी तारीख को, जो वह ठीक समझे, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष या, यथास्थिति, प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होने का निदेश दे सकता है और तब ऐसा मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट-मामलों के विचारण की प्रक्रिया के अनुसार अपराध का विचारण करेगा;
(ख) न्यायालय द्वारा अनन्यतः विचारणीय है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध लिखित रूप में आरोप विरचित करेगा।
(2) जहाँ न्यायाधीश उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोई आरोप विरचित करता है, वहाँ आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा और अभियुक्त से पूछा जाएगा कि क्या वह लगाए गए अपराध का दोषी होने का अभिवचन करता है या विचारण किए जाने का दावा करता है।
Important Sub-Sections Explained
धारा 228(1)(क)
यह उपधारा सेशन न्यायाधीश को एक मामले को न्यायिक मजिस्ट्रेट को विचारण के लिए अंतरित करने का अधिकार देती है, यदि कथित अपराध सेशन न्यायालय द्वारा अनन्यतः विचारणीय नहीं है, जिससे कम गंभीर अपराधों के लिए उचित क्षेत्राधिकार सुनिश्चित होता है।
धारा 228(1)(ख)
यह उपधारा सेशन न्यायाधीश को अभियुक्त के विरुद्ध औपचारिक रूप से लिखित आरोप विरचित करने का अधिदेश देती है, यदि कथित अपराध सेशन न्यायालय द्वारा अनन्यतः विचारणीय है, जिससे उस न्यायालय में विचारण प्रक्रिया शुरू होती है।
Landmark Judgements
भारत संघ बनाम प्रफुल्ल कुमार समल (1979):
इस ऐतिहासिक उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 और 228 के तहत आरोप विरचित करने के सिद्धांतों को स्थापित किया। इसने स्पष्ट किया कि इस चरण में, न्यायालय को यह देखना है कि क्या अभियुक्त के विरुद्ध ‘गंभीर संदेह’ है, न कि साक्ष्य की सूक्ष्म जांच, ताकि आरोप विरचित करने के साथ आगे बढ़ा जा सके।
अमित कपूर बनाम रमेश चंद्र और अन्य (2012):
उच्चतम न्यायालय ने आरोप विरचित करने के संबंध में विचारण न्यायालय के निर्णय में उच्च न्यायालयों के हस्तक्षेप के सीमित दायरे को दोहराया। इसने बल दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227/228 के चरण में, न्यायालय को केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।