अध्याय 21क
CrPC Section 265ई in Hindi: मामले का व्ययन
New Law Update (2024)
धारा 285 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
Punishment
प्रक्रियात्मक – निर्णय / दंडादेश
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जहां धारा 265घ के अधीन मामले का समाधानकारक व्ययन किया गया है, वहां न्यायालय निम्नलिखित रीति से मामले का व्ययन करेगा, अर्थात्:—
(क) न्यायालय धारा 265घ के अधीन हुए व्ययन के अनुसार पीड़ित को प्रतिकर अधिनिर्णित करेगा और दंड की मात्रा, धारा 360 के अधीन सदाचरण की परवीक्षा पर या भर्त्सना के पश्चात् अभियुक्त को निर्मुक्त करने के संबंध में या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) के उपबंधों के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन अभियुक्त से व्यवहार करने के लिए पक्षकारों को सुनेगा और अभियुक्त पर दंड अधिरोपित करने के लिए पश्चात्वर्ती खंडों में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण करेगा;
(ख) खंड (क) के अधीन पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यदि न्यायालय का यह विचार है कि अभियुक्त के मामले में धारा 360 या अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 (1958 का 20) के उपबंध या तत्समय प्रवृत्त कोई अन्य विधि लागू होती है, तो वह अभियुक्त को परिवीक्षा पर निर्मुक्त कर सकेगा या ऐसी किसी विधि का फायदा प्रदान कर सकेगा, यथास्थिति;
(ग) खंड (ख) के अधीन पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यदि न्यायालय यह पाता है कि अभियुक्त द्वारा किए गए अपराध के लिए विधि के अधीन न्यूनतम दंड उपबंधित किया गया है, तो वह अभियुक्त को ऐसे न्यूनतम दंड के आधे का दंड आदेशित कर सकेगा;
(घ) खंड (ख) के अधीन पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यदि न्यायालय यह पाता है कि अभियुक्त द्वारा किया गया अपराध खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन नहीं आता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे अपराध के लिए उपबंधित या विस्तारणीय, यथास्थिति, दंड के एक-चौथाई का दंड आदेशित कर सकेगा।
Important Sub-Sections Explained
धारा 265ई(1)(ग)
यह उपधारा न्यायालय को किसी अभियुक्त व्यक्ति को अपराध के लिए विधि द्वारा विहित न्यूनतम दंड के आधे का दंड आदेशित करने के लिए सशक्त करती है, बशर्ते कि अभिवचन सौदाकरण सफलतापूर्वक तय किया गया हो।
धारा 265ई(1)(घ)
विशिष्ट न्यूनतम दंड या परिवीक्षा के अंतर्गत न आने वाले अपराधों के लिए, यह उपधारा न्यायालय को अधिकतम संभावित दंड के एक-चौथाई तक दंड को कम करने की अनुमति देती है, जिससे अभियुक्त के लिए महत्वपूर्ण कमी सुगम होती है।
Landmark Judgements
गुजरात राज्य बनाम नटवर हरचंदजी ठाकोर (2009):
उच्चतम न्यायालय ने अभिवचन सौदाकरण के उपबंधों (दंड प्रक्रिया संहिता का अध्याय 21क) की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, आपराधिक न्याय को त्वरित करने और न्यायालयों पर बोझ कम करने में इसकी भूमिका पर जोर दिया, जिससे धारा 265ई के तहत व्ययन का मार्गदर्शन करने वाले मूलभूत सिद्धांतों की पुष्टि हुई।
नरेंद्र कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2012):
उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि अभिवचन सौदाकरण प्रभावी आपराधिक न्याय वितरण के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है, इस बात पर जोर दिया कि धारा 265ई के तहत कम दंड और पीड़ितों के लिए प्रतिकर सहित लाभों को अभिवचन करार की स्वैच्छिक और निष्पक्ष प्रकृति के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए।