अध्याय XXIII
CrPC Section 284 in Hindi: जब साक्षी की हाजिरी से अभिमुक्ति दी जा सके और कमीशन निकाला जा सके
New Law Update (2024)
धारा 265 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता
TRIAL COURT
कोई भी दांडिक न्यायालय, विशेषकर मजिस्ट्रेट का न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक – अन्वेषण / जांच
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब कभी इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के अनुक्रम में, किसी न्यायालय या मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए किसी साक्षी की परीक्षा आवश्यक है, और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतनी विलंब, व्यय या असुविधा के बिना, जो मामले की परिस्थितियों में अनुचित होगी, अभिप्राप्त नहीं की जा सकती, तब न्यायालय या मजिस्ट्रेट ऐसी हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकता है और इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार साक्षी की परीक्षा के लिए कमीशन निकाल सकता है; परंतु जहां भारत के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल या किसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक की साक्षी के रूप में परीक्षा न्याय के उद्देश्यों के लिए आवश्यक है, वहां ऐसे साक्षी की परीक्षा के लिए कमीशन निकाला जाएगा।
(2) न्यायालय, जब अभियोजन के लिए किसी साक्षी की परीक्षा के लिए कमीशन निकाले, यह निदेश दे सकेगा कि अभियुक्त के खर्चों को, जिनके अंतर्गत प्लीडर की फीस भी है, पूरा करने के लिए न्यायालय द्वारा उचित समझी गई इतनी रकम अभियोजन द्वारा संदत्त की जाए।
Important Sub-Sections Explained
धारा 284(1) दंड प्रक्रिया संहिता
यह उप-धारा किसी न्यायालय को किसी साक्षी को शारीरिक उपस्थिति से छूट देने और कमीशन के माध्यम से उसकी परीक्षा का आदेश देने की अनुमति देती है, लेकिन केवल तभी जब उसकी उपस्थिति न्याय के लिए महत्वपूर्ण हो और अनुचित विलंब, व्यय या कठिनाई के बिना सुनिश्चित न की जा सके। यह राष्ट्रपति या राज्यपाल जैसे उच्च पदस्थ अधिकारियों की परीक्षा के लिए कमीशन जारी करने का भी आदेश देती है।
धारा 284(2) दंड प्रक्रिया संहिता
यह उप-धारा न्यायालय को अभियोजन को अभियुक्त के उचित खर्चों को, जिसमें उसकी कानूनी फीस भी शामिल है, कवर करने का निर्देश देने का अधिकार देती है, जब अभियोजन साक्षी की परीक्षा के लिए कमीशन जारी किया जाता है, जिससे अभियुक्त के प्रति निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
Landmark Judgements
पी. राम रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1999):
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि इस धारा के तहत कमीशन जारी करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है, जिसके लिए उप-धारा (1) में निर्धारित शर्तों का कड़ाई से पालन आवश्यक है। इसने जोर दिया कि न्यायालय का विवेकाधिकार केवल तभी विवेकपूर्ण ढंग से प्रयोग किया जाना चाहिए, जब अनुचित विलंब, व्यय या असुविधा के बिना शारीरिक उपस्थिति सुनिश्चित न की जा सके, और जब यह न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक हो।
महाराष्ट्र राज्य बनाम डॉ. पी.सी. सावंत और अन्य (2004):
बंबई उच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि कमीशन जारी करना एक विवेकाधीन शक्ति है जिसका प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए। इसने स्पष्ट किया कि केवल असुविधा के दावे अपर्याप्त हैं; आवेदक को यह संतोषजनक ढंग से प्रदर्शित करना होगा कि किसी साक्षी की उपस्थिति यथोचित रूप से अभिप्राप्त नहीं की जा सकती, जिससे न्याय के उचित प्रशासन के लिए कमीशन के माध्यम से परीक्षा एक आवश्यकता बन जाए।