अध्याय पच्चीस
CrPC Section 335 in Hindi: ऐसे आधार पर दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाना
New Law Update (2024)
धारा 344 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
कोई आपराधिक न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक – विचारण/आरोप
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब कभी यह निष्कर्ष दिया जाता है कि अभियुक्त व्यक्ति ने अभिकथित कार्य किया है, तब जिस मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष विचारण हुआ है वह, यदि ऐसा कार्य पाई गई अक्षमता न होती तो, अपराध होता तो,—
(क) ऐसे व्यक्ति को ऐसे स्थान और रीति से सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध किए जाने का आदेश देगा जो मजिस्ट्रेट या न्यायालय ठीक समझे; अथवा
(ख) ऐसे व्यक्ति को उसके किसी नातेदार या मित्र को परिदत्त किए जाने का आदेश देगा।
(2) उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अभियुक्त को पागलखाने में निरुद्ध करने का कोई आदेश ऐसे नियमों के अनुसार ही दिया जाएगा जो राज्य सरकार ने भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 (1912 का 4) के अधीन बनाए हों, अन्यथा नहीं।
(3) उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन अभियुक्त को किसी नातेदार या मित्र को परिदत्त किए जाने का कोई आदेश ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर और मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समाधानप्रद रूप से उसकी प्रतिभूति दिए जाने पर ही किया जाएगा कि परिदत्त व्यक्ति—
(i) की उचित रूप से देखभाल की जाएगी और उसे स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से रोका जाएगा;
(ii) ऐसे अधिकारी के निरीक्षण के लिए, और ऐसे समयों और स्थानों पर पेश किया जाएगा, जैसा राज्य सरकार निर्दिष्ट करे।
(4) मजिस्ट्रेट या न्यायालय राज्य सरकार को उपधारा (1) के अधीन की गई कार्यवाही की रिपोर्ट करेगा।
Important Sub-Sections Explained
धारा 335(1) दं.प्र.सं.
यह महत्वपूर्ण उपधारा न्यायालय को यह अधिदेश देती है कि वह मन की अस्वस्थता के कारण दोषमुक्त किए गए, लेकिन जिसने कार्य किया है, अभियुक्त को या तो सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध करे या उसे देखभाल के लिए किसी नातेदार या मित्र को सौंप दे।
धारा 335(3) दं.प्र.सं.
यह उपधारा उन कठोर शर्तों को निर्दिष्ट करती है जिनके तहत मन की अस्वस्थता के आधार पर दोषमुक्त किए गए व्यक्ति को किसी नातेदार या मित्र को परिदत्त किया जा सकता है, जिसके लिए उचित देखभाल और निरीक्षण के लिए पेश करने हेतु प्रतिभूति और वचनबंध की आवश्यकता होती है।
Landmark Judgements
रतन लाल बनाम पंजाब राज्य (1965):
उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय मन की अस्वस्थता के आधार पर दोषमुक्ति के सिद्धांतों को स्थापित करने में मौलिक है, जिसमें अभियुक्त की मानसिक स्थिति की गहन जांच की आवश्यकता पर जोर दिया गया है जो दं.प्र.सं. की धारा 335 के आवेदन से पहले होती है।
शांता बनाम महाराष्ट्र राज्य (2000):
इस मामले में बंबई उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की शक्तियों और धारा 335 के समान प्रावधानों के तहत मन की अस्वस्थता के कारण निरुद्ध व्यक्ति की रिहाई की शर्तों को स्पष्ट किया, जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा और व्यक्ति के कल्याण के बीच संतुलन बनाया गया।
सुरेंद्र कुमार भाटिया बनाम महाराष्ट्र राज्य (2001):
बंबई उच्च न्यायालय के इस निर्णय ने दं.प्र.सं. की धारा 330 से 335 की प्रक्रियात्मक योजना पर स्पष्टता प्रदान की, जिसमें विचारण के दौरान अस्वस्थ मन का पाए गए अभियुक्त से निपटने के कदमों का विवरण दिया गया है, जिसमें उनकी निरोध या मानसिक स्वास्थ्य सुविधा में स्थानांतरण शामिल है।