अध्याय XXVII
CrPC Section 356 in Hindi: पूर्वं दोषसिद्ध अपराधी के पते की सूचना देने का आदेश
New Law Update (2024)
धारा 401 बी.एन.एस.एस.
TRIAL COURT
दंडादेश पारित करने वाला कोई भी न्यायालय (द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को छोड़कर); आदेश के लिए अपीलीय/पुनरीक्षण न्यायालय; नियमों के उल्लंघन के लिए सक्षम अधिकारिता वाला मजिस्ट्रेट
Punishment
सात वर्ष तक का कारावास और जुर्माना
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब भारत में किसी न्यायालय द्वारा धारा 215, धारा 489क, धारा 489ख, धारा 489ग या धारा 489घ या धारा 506 (जहां तक कि वह आपराधिक अभित्रास से संबंधित है जो सात वर्ष तक के कारावास से, या जुर्माने से, या दोनों से दंडनीय है) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अधीन या उस संहिता के अध्याय 12 या अध्याय 17 के अधीन किसी ऐसे अपराध के लिए, जो तीन वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है, दोषसिद्ध किया गया कोई व्यक्ति, द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय द्वारा, उन धाराओं या अध्यायों में से किसी के अधीन किसी ऐसे अपराध के लिए, जो तीन वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है, पुनः दोषसिद्ध किया जाता है, तो ऐसा न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति पर कारावास का दंडादेश पारित करते समय, यह भी आदेश दे सकेगा कि उसकी निर्मुक्ति के पश्चात् उसके निवास स्थान और ऐसे निवास स्थान में किसी परिवर्तन की या उससे अनुपस्थिति की सूचना, उस दंडादेश की समाप्ति की तारीख से पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से दी जाए।
(2) उपधारा (1) के उपबंध, उसमें विनिर्दिष्ट अपराधों के संबंध में, ऐसे अपराधों को करने के आपराधिक षड्यंत्रों और ऐसे अपराधों के दुष्प्रेरण और उन्हें करने के प्रयत्नों पर भी लागू होंगे।
(3) यदि ऐसी दोषसिद्धि अपील में या अन्यथा अपास्त कर दी जाती है तो ऐसा आदेश शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अधीन कोई आदेश अपील न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी तब किया जा सकेगा जब वह अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।
(5) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, निर्मुक्त दोषसिद्ध व्यक्तियों द्वारा निवास स्थान की या निवास स्थान में परिवर्तन की या उससे अनुपस्थिति की सूचना से संबंधित इस धारा के उपबंधों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(6) ऐसे नियम उनके भंग के लिए दंड का उपबंध कर सकेंगे और ऐसे किसी नियम के भंग के दोषी किसी व्यक्ति का विचारण उस जिले में सक्षम अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकेगा जिसमें उसके द्वारा अपने निवास स्थान के रूप में अंतिम बार सूचित किया गया स्थान स्थित है।
Important Sub-Sections Explained
धारा 356(1)
यह महत्वपूर्ण उपधारा उन परिस्थितियों का विवरण देती है जिनके तहत एक न्यायालय, विशिष्ट गंभीर अपराधों के लिए पूर्व में दोषसिद्ध और तत्पश्चात पुनः दोषसिद्ध किसी व्यक्ति को, उसकी निर्मुक्ति के बाद पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए अपना पता और उसमें कोई भी परिवर्तन सूचित करने का निर्देश दे सकता है। यह गंभीर अपराधों में संलिप्त बार-बार के अपराधियों को लक्षित करती है।
धारा 356(6)
यह उपधारा राज्य सरकार को नियम बनाने का अधिकार देती है, जिसमें दंड के प्रावधान भी शामिल हैं, यदि कोई निर्मुक्त दोषसिद्ध व्यक्ति निवास की सूचना संबंधी आवश्यकताओं का पालन करने में विफल रहता है। यह आगे स्थापित करती है कि ऐसे उल्लंघन का विचारण उस क्षेत्र के सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकता है जहां अपराधी ने अंतिम बार अपने निवास स्थान की सूचना दी थी।
Landmark Judgements
सुरजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य, 1990 (3) आरसीआर (आपराधिक) 400 (पी एंड एच):
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 356 के तहत एक आदेश कारावास की सज़ा सुनाते समय ही विचारण न्यायालय द्वारा पारित किया जाना चाहिए। ऐसा आदेश एक अलग या बाद के निर्देश के रूप में नहीं दिया जा सकता है।
किशोरी लाल बनाम राज्य, 1980 क्रि.एल.जे. 802 (अल्ह.):
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 356 के तहत निवास की सूचना के लिए आदेश जारी करने की न्यायालय की शक्ति का प्रयोग कारावास की सज़ा पारित करने के साथ-साथ किया जाना चाहिए और इसे स्वयं निर्णय में एकीकृत किया जाना चाहिए।