अध्याय XXVII
CrPC Section 363 in Hindi: निर्णय की प्रति अभियुक्त को और अन्य व्यक्तियों को दी जानी
New Law Update (2024)
धारा 398 बी.एन.एस.एस.
TRIAL COURT
दंड न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक – निर्णय/दंडादेश
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब अभियुक्त को कारावास का दंडादेश दिया जाता है तब निर्णय सुनाए जाने के तुरंत पश्चात् निर्णय की एक प्रति उसे निःशुल्क दी जाएगी।
(2) अभियुक्त के आवेदन पर, निर्णय की प्रमाणित प्रति या जब वह चाहे तब, यदि साध्य हो तो उसकी अपनी भाषा में, या न्यायालय की भाषा में उसका अनुवाद उसे अविलंब दिया जाएगा और ऐसी प्रति ऐसे हर मामले में जिसमें अभियुक्त निर्णय की अपील कर सकता है, निःशुल्क दी जाएगी: परंतु जहां उच्च न्यायालय द्वारा मृत्यु का दंडादेश पारित किया जाता है या पुष्टि की जाती है वहां निर्णय की एक प्रमाणित प्रति अभियुक्त को तुरंत निःशुल्क दी जाएगी चाहे उसने उसके लिए आवेदन किया हो या नहीं।
(3) उपधारा (2) के उपबंध धारा 117 के अधीन आदेश के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे ऐसे निर्णय के संबंध में लागू होते हैं जिसकी अभियुक्त अपील कर सकता है।
(4) जब किसी न्यायालय द्वारा अभियुक्त को मृत्यु का दंडादेश दिया जाता है और ऐसे निर्णय की अपील अधिकारतः की जा सकती है तब न्यायालय उसे वह कालावधि बताएगा जिसके भीतर यदि वह अपील करना चाहता है तो उसकी अपील की जानी चाहिए।
(5) उपधारा (2) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो किसी दांडिक न्यायालय द्वारा पारित किसी निर्णय या आदेश से प्रभावित है, इस निमित्त किए गए आवेदन पर और विहित शुल्कों के संदाय पर ऐसे निर्णय या आदेश की या किसी साक्ष्य-लेखन की या अभिलेख के किसी अन्य भाग की प्रति दी जाएगी: परंतु न्यायालय यदि विशेष कारण से ठीक समझता है तो उसे निःशुल्क दे सकता है।
(6) उच्च न्यायालय, नियमों द्वारा, किसी दांडिक न्यायालय के किसी निर्णय या आदेश की प्रतियों को किसी ऐसे व्यक्ति को देने के लिए उपबंध कर सकता है जो किसी निर्णय या आदेश से प्रभावित नहीं है, ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसे शुल्क के संदाय पर और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो उच्च न्यायालय ऐसे नियमों द्वारा उपबंधित करे।
Important Sub-Sections Explained
धारा 363(1) और (2) दंड प्रक्रिया संहिता
उपधारा (1) यह अधिदेशित करती है कि कारावास का दंडादेश दिए गए अभियुक्त को निर्णय सुनाए जाने पर तुरंत निर्णय की एक निःशुल्क प्रति प्राप्त होनी चाहिए। उपधारा (2) आगे यह सुनिश्चित करती है कि एक अभियुक्त निर्णय की एक प्रमाणित प्रति प्राप्त कर सकता है, जिसे यदि संभव हो तो उसकी भाषा में अनुवादित किया जा सकता है, बिना किसी देरी के, और यह प्रति निःशुल्क होनी चाहिए यदि निर्णय अपील योग्य है या इसमें मृत्यु दंडादेश शामिल है।
Landmark Judgements
एम. एच. होसकोट बनाम महाराष्ट्र राज्य (1978):
उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि एक निर्धन अभियुक्त को निःशुल्क कानूनी सेवाएं प्रदान करना, जिसमें निर्णय की निःशुल्क प्रति का प्रावधान भी शामिल है, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्याभूत ‘उचित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण’ प्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक है। यह अधिकार अपील के चरण तक विस्तारित है।
बी. आर. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1983):
उच्चतम न्यायालय ने एक निर्धन अभियुक्त को अपील के अपने अधिकार का प्रयोग सुगम बनाने के लिए निर्णय की एक निःशुल्क प्रति प्रदान करने के महत्व को दोहराया, इस बात पर बल दिया कि गरीबी के कारण न्याय तक पहुंच से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।