अध्याय 29
CrPC Section 393 in Hindi: अपीलों पर निर्णयों और आदेशों का अंतिम होना
New Law Update (2024)
धारा 357 BNSS
TRIAL COURT
Punishment
प्रक्रियात्मक – निर्णय / दंडादेश
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) धारा 378 के अधीन दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील, उसी मामले में उद्भूत होने वाली, या
(2) धारा 377 के अधीन दंडादेश को बढ़ाने के लिए अपील, उसी मामले में उद्भूत होने वाली।
Important Sub-Sections Explained
धारा 393(1) और (2)
ये उप-धाराएँ उन विशिष्ट अपवादों को विस्तृत करती हैं जहां अपीलीय न्यायालय का निर्णय अंतिम नहीं माना जाता है। यह तब होता है जब दोषमुक्ति के विरुद्ध एक लंबित अपील (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378 के अधीन) या दंडादेश में वृद्धि की मांग करने वाली अपील (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 377 के अधीन) हो, बशर्ते कि दोनों अपीलें एक ही आपराधिक मामले से उद्भूत होती हों।
Landmark Judgements
किशोर सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2000):
उच्चतम न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि निर्णयों के अंतिम होने का सिद्धांत, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 393 में सन्निहित है, न्यायिक दक्षता के लिए महत्वपूर्ण है और अंतहीन मुकदमेबाजी को रोकता है। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जब तक कोई विशिष्ट सांविधिक प्रावधान आगे अपील या पुनरीक्षण की अनुमति नहीं देता है, एक अपीलीय निर्णय अंतिम हो जाता है।
पंजाब राज्य बनाम सुचा सिंह (2003):
उच्चतम न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 393 के साथ धारा 377 और 378 के क्षेत्र और परस्पर क्रिया को स्पष्ट किया। इसने रेखांकित किया कि धारा 393 के अधीन अंतिम होने के अपवादों की संकीर्ण व्याख्या की जाती है, जो केवल तभी लागू होते हैं जब उसी मामले से दोषमुक्ति या दंडादेश को बढ़ाने के लिए अपीलें वास्तव में किसी सक्षम न्यायालय के समक्ष लंबित हों।