अध्याय चौंतीस
CrPC Section 456 in Hindi: स्थावर सम्पत्ति के कब्जे का प्रत्यावर्तन करने की शक्ति
New Law Update (2024)
धारा 480 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
विचारण न्यायालय, अपीलीय न्यायालय, पुनरीक्षण न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक – अपीलें / पुनरीक्षण
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब कोई व्यक्ति ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है, जिसके साथ आपराधिक बल या आपराधिक बल का प्रदर्शन या आपराधिक अभित्रास हुआ था, और न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि ऐसे बल या बल के प्रदर्शन या अभित्रास से किसी व्यक्ति को किसी स्थावर सम्पत्ति से बेकब्जा किया गया है, तब न्यायालय यदि वह ठीक समझे, आदेश दे सकता है कि उसी सम्पत्ति का कब्जा उस व्यक्ति को, यदि आवश्यक हो तो बलपूर्वक किसी अन्य व्यक्ति को जो सम्पत्ति पर कब्जे में हो, बेदखल करके, प्रत्यावर्तित किया जाए; परन्तु न्यायालय ऐसा कोई आदेश दोषसिद्धि की तारीख के पश्चात् एक मास से अधिक समय के बाद नहीं देगा।
(2) जहां अपराध का विचारण करने वाले न्यायालय ने उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश नहीं दिया है, वहां अपील, पुष्टि या पुनरीक्षण न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, अपील, निर्देश या पुनरीक्षण का निपटारा करते समय, यथास्थिति, ऐसा आदेश दे सकता है।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश दिया गया है, वहां धारा 454 के उपबन्ध तत्संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 453 के अधीन दिए गए आदेश के संबंध में लागू होते हैं।
(4) इस धारा के अधीन दिया गया कोई भी आदेश ऐसी स्थावर सम्पत्ति के किसी ऐसे अधिकार या हित पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा, जिसे कोई व्यक्ति किसी सिविल वाद में स्थापित करने में समर्थ हो।
Important Sub-Sections Explained
धारा 456(1)
यह उपधारा आपराधिक बल या अभित्रास से जुड़े अपराध के लिए किसी व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराने पर एक आपराधिक न्यायालय को बेकब्जा व्यक्ति को स्थावर संपत्ति की बहाली का आदेश देने का अधिकार देती है। हालांकि, यह आदेश दोषसिद्धि की तारीख से एक महीने के भीतर दिया जाना चाहिए।
धारा 456(4)
यह महत्वपूर्ण उपधारा स्पष्ट करती है कि धारा 456 के तहत संपत्ति की बहाली के लिए दिया गया कोई भी आदेश उस संपत्ति पर किसी भी मौजूदा अधिकार या हितों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता या उन्हें प्रभावित नहीं करता, जिसे किसी भी व्यक्ति द्वारा एक अलग सिविल वाद के माध्यम से अभी भी स्थापित या चुनौती दी जा सकती है।
Landmark Judgements
भगवती बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1976):
इस मामले में यह स्पष्ट किया गया कि दं.प्र.सं. की धारा 456 के तहत कब्जे की बहाली का आदेश विवेकाधीन है और इसे तभी पारित किया जा सकता है जब आपराधिक बल से जुड़े अपराध के लिए दोषसिद्धि और स्थावर संपत्ति से बेदखली के बीच सीधा संबंध हो। न्यायालय को इस बात से संतुष्ट होना चाहिए कि बेदखली उस बल या बल प्रदर्शन के सीधे परिणाम के रूप में हुई जिसके लिए अभियुक्त को दोषी ठहराया गया था।
फूलचंद बनाम राजस्थान राज्य (1983):
उच्च न्यायालय ने माना कि धारा 456 द्वारा प्रदत्त शक्ति आपराधिक दोषसिद्धि के आनुषंगिक है और इसका उद्देश्य व्यापक सिविल उपचारों का स्थान लेना नहीं है। इसने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक बल, या अभित्रास से जुड़े अपराध के लिए दोषसिद्धि, जिससे सीधे तौर पर बेदखली हुई हो, इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए एक मौलिक शर्त है, और इसका उपयोग न्यायोचित ढंग से किया जाना चाहिए।