अध्याय XXXVI

CrPC Section 483 in Hindi: न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का निरंतर अधीक्षण का कर्तव्य

New Law Update (2024)

धारा 534 भा.ना.सु.सं.

TRIAL COURT

Punishment​

प्रक्रियात्मक / प्रशासनिक

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अपना अधीक्षण ऐसे प्रयोग करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसे मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का त्वरित और उचित निपटान हो।

Important Sub-Sections Explained

Landmark Judgements

हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979):

इस महत्वपूर्ण मामले ने त्वरित विचारण के संवैधानिक अधिकार पर प्रकाश डाला, इस बात पर जोर दिया कि विचाराधीन कैदियों की लंबी हिरासत अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है। यद्यपि धारा 483 का सीधे संदर्भ नहीं दिया गया था, इसने शीघ्र निपटान को अनिवार्य करने वाले न्यायिक सक्रियता की नींव रखी, एक ऐसा सिद्धांत जिसे धारा 483 प्रशासनिक रूप से बनाए रखने का लक्ष्य रखती है।

पी. रामचन्द्र राव बनाम कर्नाटक राज्य (2002):

उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि त्वरित विचारण का अधिकार अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न अंग है और विचारण न्यायालयों के लिए मामलों का शीघ्र निपटान सुनिश्चित करने हेतु दिशानिर्देश प्रदान किए, जिससे धारा 483 के तहत उच्च न्यायालयों के अधीक्षण कर्तव्य को सुदृढ़ किया गया।

भोजा राम बनाम राजस्थान राज्य (2009):

राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 483 के तहत अधीक्षण मुख्य रूप से प्रशासनिक प्रकृति का है, जिसका उद्देश्य शीघ्र मामला निपटान के लिए अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों के कुशल और उचित कामकाज को सुनिश्चित करना है, न कि उनके न्यायिक निर्णयों में हस्तक्षेप करना।

Draft Format / Application

Leave a Reply

Scroll to Top