अध्याय 5

CrPC Section 50क in Hindi: गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति का गिरफ्तार व्यक्ति की गिरफ्तारी आदि के बारे में नामिती व्यक्ति को सूचित करने का दायित्व (नियम, सजा और Bare Act PDF)

New Law Update (2024)

धारा 35 बी.एन.एस.एस.

TRIAL COURT

Punishment​

प्रक्रियात्मक / प्रशासनिक

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) इस संहिता के अधीन कोई गिरफ्तारी करने वाला प्रत्येक पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति ऐसी गिरफ्तारी और उस स्थान की जानकारी, जहाँ गिरफ्तार व्यक्ति को रखा गया है, उसके किसी मित्र, नातेदार या ऐसे अन्य व्यक्ति को तत्काल देगा जिसका खुलासा गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा ऐसी जानकारी देने के प्रयोजन के लिए किया गया हो या जो उसके द्वारा नामित किया गया हो।
(2) पुलिस अधिकारी, गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस थाने में लाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र उपधारा (1) के अधीन उसके अधिकारों से अवगत कराएगा।
(3) ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी के बारे में किसे जानकारी दी गई है, इस तथ्य की प्रविष्टि पुलिस थाने में रखी जाने वाली ऐसी पुस्तक में की जाएगी जो इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए।
(4) ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति को जिस मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाता है, उसका यह कर्तव्य होगा कि वह अपना समाधान कर ले कि उपधारा (2) और उपधारा (3) की अपेक्षाओं का ऐसे गिरफ्तार व्यक्ति के संबंध में अनुपालन किया गया है।

Important Sub-Sections Explained

धारा 50क(1)

यह उपधारा यह अनिवार्य करती है कि कोई भी पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति जो गिरफ्तारी करता है, वह तत्काल गिरफ्तार व्यक्ति के किसी मित्र, नातेदार या उसके द्वारा नामित किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी और उसके निरोध के स्थान के बारे में सूचित करे। यह सुनिश्चित करता है कि गिरफ्तार व्यक्ति का तत्काल सहायता नेटवर्क उसकी स्थिति से अवगत हो, जिससे पारदर्शिता बढ़ती है और हिरासत में दुर्व्यवहार की संभावना कम होती है।

धारा 50क(4)

यह उपधारा मजिस्ट्रेट पर एक महत्वपूर्ण कर्तव्य डालती है, जिसके समक्ष गिरफ्तार व्यक्ति को पेश किया जाता है, जिसमें उसे यह सत्यापित करना होता है कि पुलिस ने गिरफ्तार व्यक्ति को उसके अधिकारों से अवगत कराया है और सूचना के विवरण को विधिवत दर्ज किया है। यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक सुरक्षा उपाय के रूप में कार्य करता है, जो प्रक्रियात्मक अनुपालन सुनिश्चित करता है और गिरफ्तार व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सक्रिय रूप से रक्षा करता है।

Landmark Judgements

डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997):

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय ने पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा गिरफ्तारी और निरोध के लिए व्यापक दिशा-निर्देश निर्धारित किए। इसमें विशेष रूप से गिरफ्तार व्यक्ति के मौलिक अधिकार पर जोर दिया गया कि उसके किसी मित्र या नातेदार को उसकी गिरफ्तारी और निरोध के स्थान के बारे में सूचित किया जाए, साथ ही इस जानकारी को दर्ज करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। इस फैसले के परिणामस्वरूप दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 50क को बाद में जोड़ा गया, जिसने अवैध निरोध और हिरासत में दुर्व्यवहार के खिलाफ इन महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को औपचारिक रूप दिया।

Draft Format / Application

Leave a Reply

Scroll to Top