अध्याय 6

CrPC Section 82 in Hindi: फरार व्यक्ति के लिए उद्घोषणा

New Law Update (2024)

बी.एन.एस.एस. की धारा 102

TRIAL COURT

Punishment​

प्रक्रियात्मक – वारंट / समन प्रक्रिया

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) यदि किसी न्यायालय को (साक्ष्य लेने के पश्चात् या उसके बिना भी) यह विश्वास करने का कारण है कि किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिसके लिए उसके द्वारा वारंट जारी किया गया है, फरार हो गया है या अपने को छिपा रहा है जिससे ऐसे वारंट का निष्पादन नहीं किया जा सकता है, तो ऐसा न्यायालय उस व्यक्ति को किसी विशिष्ट स्थान में और विनिर्दिष्ट समय पर, जो ऐसी उद्घोषणा के प्रकाशन की तारीख से कम से कम तीस दिन का होगा, हाजिर होने की अपेक्षा करने वाली लिखित उद्घोषणा प्रकाशित कर सकता है।
(2) उद्घोषणा निम्नलिखित रीति से प्रकाशित की जाएगी—
(i) (क) वह उस नगर या ग्राम के, जिसमें ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है, किसी सहजदृश्य स्थान में सार्वजनिक रूप से पढ़ी जाएगी;
(ख) वह ऐसे घर या गृहस्थान के, जिसमें ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है, किसी सहजदृश्य भाग पर या ऐसे नगर या ग्राम के किसी सहजदृश्य स्थान पर लगाई जाएगी;
(ग) उसकी एक प्रति न्यायालय गृह के किसी सहजदृश्य भाग पर लगाई जाएगी;
(ii) न्यायालय, यदि वह ठीक समझता है तो, उद्घोषणा की एक प्रति उस स्थान में परिचालित होने वाले किसी दैनिक समाचार-पत्र में प्रकाशित करने का निदेश भी दे सकता है जहाँ ऐसा व्यक्ति मामूली तौर पर निवास करता है।
(3) उद्घोषणा जारी करने वाले न्यायालय का यह लिखित कथन कि उद्घोषणा उपधारा (2) के खंड (i) में विनिर्दिष्ट रीति से और विनिर्दिष्ट दिन पर सम्यक् रूप से प्रकाशित की गई थी, इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगा कि इस धारा की अपेक्षाओं का अनुपालन किया गया है और उद्घोषणा उस दिन प्रकाशित की गई थी।
(4) जहाँ उपधारा (1) के अधीन प्रकाशित उद्घोषणा भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 302, 304, 364, 367, 382, 392, 393, 394, 395, 396, 397, 398, 399, 400, 402, 436, 449, 459 या 460 के अधीन दण्डनीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति के संबंध में है और ऐसा व्यक्ति उद्घोषणा द्वारा अपेक्षित विनिर्दिष्ट स्थान और समय पर हाजिर होने में विफल रहता है, वहाँ न्यायालय, ऐसी जाँच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, उसे उद्घोषित अपराधी घोषित कर सकता है और इस आशय की घोषणा कर सकता है।
(5) उपधारा (2) और (3) के उपबंध न्यायालय द्वारा उपधारा (4) के अधीन की गई घोषणा को ऐसे लागू होंगे जैसे वे उपधारा (1) के अधीन प्रकाशित उद्घोषणा को लागू होते हैं।

Important Sub-Sections Explained

उपधारा (1) – उद्घोषणा जारी करना

यह महत्वपूर्ण उपधारा उन परिस्थितियों को रेखांकित करती है जिनमें एक न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध लिखित उद्घोषणा जारी कर सकता है जिसने फरार होकर या स्वयं को छिपाकर गिरफ्तारी वारंट से बचा है, और जिसे न्यूनतम तीस दिनों के भीतर उपस्थित होने की आवश्यकता होती है।

उपधारा (4) – उद्घोषित अपराधी घोषित करना

यह महत्वपूर्ण प्रावधान न्यायालय को किसी व्यक्ति को ‘उद्घोषित अपराधी’ घोषित करने में सक्षम बनाता है, यदि वह उद्घोषणा के बाद उपस्थित होने में विफल रहता है, विशेष रूप से भारतीय दण्ड संहिता के तहत कुछ गंभीर अपराधों के लिए, जिससे गंभीर कानूनी निहितार्थ जुड़े होते हैं।

Landmark Judgements

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम संजय सिंह (2007):

उच्चतम न्यायालय ने दं.प्र.सं. की धारा 82 और 83 में निर्धारित प्रक्रिया के अनिवार्य स्वरूप पर बल दिया, यह कहते हुए कि ये प्रावधान, अपनी प्रकृति में बलपूर्वक होने के कारण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा संपत्ति को प्रभावित करने वाले होने के कारण, उनका सख्ती और सावधानी से पालन किया जाना चाहिए।

वीरेंद्र सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2016):

इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि धारा 82(4) के तहत किसी व्यक्ति को ‘उद्घोषित अपराधी’ घोषित करना अनुपस्थिति पर स्वतः नहीं होता। इसके लिए न्यायिक मन का अनुप्रयोग और उचित जाँच करने के बाद न्यायालय द्वारा एक विशिष्ट घोषणा की आवश्यकता होती है।

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