अध्याय VII
CrPC Section 95 in Hindi: कुछ प्रकाशनों को समपहृत घोषित करने और उनके लिए तलाशी-वारंट जारी करने की शक्ति
New Law Update (2024)
बी.एन.एस.एस. धारा 106
TRIAL COURT
Punishment
प्रक्रियात्मक – वारंट / समन प्रक्रिया
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जहाँ राज्य सरकार को यह प्रतीत होता है कि किसी समाचारपत्र या पुस्तक या किसी दस्तावेज में, वह जहाँ कहीं भी मुद्रित हुआ हो, कोई ऐसी बात अंतर्विष्ट है जिसके प्रकाशन का भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 124क या धारा 153क या धारा 153ख या धारा 292 या धारा 293 या धारा 295क के अधीन दंडनीय है, तो राज्य सरकार अपनी राय के आधारों का कथन करते हुए अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकती है कि ऐसे विषय को अंतर्विष्ट करने वाले समाचारपत्र के अंक की प्रत्येक प्रति और ऐसी पुस्तक या अन्य दस्तावेज की प्रत्येक प्रति सरकार के पक्ष में समपहृत कर ली जाएगी, और तत्पश्चात् कोई भी पुलिस अधिकारी उसे भारत में जहाँ कहीं भी पाया जाए, अभिगृहीत कर सकेगा और कोई भी मजिस्ट्रेट वारंट द्वारा किसी ऐसे पुलिस अधिकारी को, जो उप-निरीक्षक के पद से नीचे का न हो, ऐसे किसी स्थान में प्रवेश करने और तलाशी लेने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जहाँ ऐसे अंक की या ऐसी पुस्तक या अन्य दस्तावेज की कोई प्रति हो या जिसके होने का युक्तियुक्त संदेह हो।
(2) इस धारा में और धारा 96 में–
(क) “समाचारपत्र” और “पुस्तक” के वही अर्थ हैं जो प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) में हैं;
(ख) “दस्तावेज” के अंतर्गत कोई भी पेंटिंग, ड्राइंग या फोटोग्राफ या अन्य दृश्य निरूपण है।
(3) इस धारा के अधीन पारित किसी आदेश या की गई किसी कार्रवाई को किसी न्यायालय में धारा 96 के उपबंधों के अनुसार ही अन्यथा प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।
Important Sub-Sections Explained
धारा 95(1)
यह उपधारा राज्य सरकार को समाचारपत्रों, पुस्तकों या दस्तावेजों जैसे प्रकाशनों को समपहृत करने का आदेश देने का अधिकार देती है, यदि उनमें विशिष्ट भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत दंडनीय सामग्री शामिल है, जैसे राजद्रोह या अश्लीलता से संबंधित। यह पुलिस को इन सामग्रियों को जब्त करने और मजिस्ट्रेटों को तलाशी वारंट जारी करने की भी अनुमति देता है।
धारा 95(3)
यह उपधारा निर्दिष्ट करती है कि धारा 95 के तहत पारित किसी भी आदेश या की गई कार्रवाई को केवल दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 96 में निर्धारित विशिष्ट प्रक्रिया का पालन करके ही कानून की अदालत में चुनौती दी जा सकती है, जिसका आमतौर पर मतलब उच्च न्यायालय में आवेदन दाखिल करना है।
Landmark Judgements
ब्रजनंदन शर्मा बनाम बिहार राज्य (1950):
पटना उच्च न्यायालय ने, प्रेस (आपातकालीन शक्तियां) अधिनियम, 1931 (जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 95 के समरूप प्रावधान थे) से संबंधित इस ऐतिहासिक मामले में, यह माना कि न्यायिक जांच के बिना प्रकाशनों की जब्ती की अनुमति देने वाले प्रावधानों ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया।
एन. राघवेन्द्र राव बनाम कर्नाटक राज्य (1987):
इस मामले ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 95 की सख्त प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं पर प्रकाश डाला, इस बात पर जोर दिया कि जब्ती के लिए राज्य सरकार की अधिसूचना में कानून के उचित अनुप्रयोग को सुनिश्चित करने और धारा 96 के तहत संभावित चुनौती की अनुमति देने के लिए अपनी राय के आधारों को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए।