1. प्रस्तावना
राजस्थान की संस्कृति में आभूषण और वेशभूषा केवल सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि वे यहाँ की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक प्रतिष्ठा, वैवाहिक स्थिति और जातीय पहचान के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मरुधरा की भौगोलिक विषमताओं और जलवायु ने यहाँ के निवासियों की वेशभूषा को रंगीन और विविधतापूर्ण बनाया है, वहीं वैभवशाली इतिहास ने आभूषण कला को विश्व पटल पर स्थापित किया है।
कालीबंगा (हनुमानगढ़) और आहड़ (उदयपुर) जैसी प्राचीन सभ्यताओं के पुरातात्विक साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि राजस्थान में आभूषणों की परंपरा सहस्राब्दियों पुरानी है। उत्खनन में प्राप्त मृणमय (मिट्टी के) और चमकीले पत्थरों की मणियों के अवशेष बताते हैं कि उस युग की स्त्रियाँ भी अलंकरण प्रेमी थीं। शुंगकालीन मृणमूर्तियों (मिट्टी के खिलौनों) और फलकों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में स्त्रियाँ हाथों में चूड़ियाँ, कड़े, पैरों में खड़वे और गले में भारी हार पहनती थीं, जो कालांतर में राजस्थान की आभूषण परंपरा की नींव बने।
2. आभूषण परंपरा
आभूषण सौंदर्य संवर्धन का प्राथमिक माध्यम रहे हैं। राजस्थान में सामाजिक स्तरीकरण के आधार पर आभूषणों की सामग्री में भिन्नता देखने को मिलती है:
- उच्च एवं सामंत वर्ग: स्वर्ण (सोना), रजत (चाँदी), बहुमूल्य रत्न (हीरा, पन्ना, माणिक), और मोती।
- मध्यम एवं सामान्य वर्ग: काँसा, पीतल, ताँबा, और रजत मिश्रित धातुएं।
- आदिवासी एवं घुमक्कड़ जातियाँ: गिलट, रांगा, पीतल, कौड़ी, सीप, मूँगा, और हाथी दाँत।
साहित्यिक और मूर्तिकला साक्ष्य
प्राचीन भारतीय साहित्य और राजस्थान के मध्यकालीन ग्रंथों में आभूषणों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
- साहित्यिक साक्ष्य: ‘समरादित्य कथा’ और ‘कुवलयमाला’ जैसे ग्रंथों में सिर के आभूषणों को ‘चूड़ारत्न’ तथा गले और वक्षस्थल के आभूषणों को ‘दूसूरुल्लक’, ‘पत्रलता’, ‘मणीश्ना’, ‘कंठिका’ और ‘आमुक्तावली’ कहा गया है। ‘फ्यूमश्रीचरय्’ में विवाह के अवसर पर वधू (पद्मश्री) के अलंकरण में नूपुर, कुंडल और मुकुट का उल्लेख मिलता है।
- मूर्तिकला साक्ष्य: दिल्ली और बीकानेर संग्रहालय में संरक्षित प्रसिद्ध सरस्वती की प्रतिमा, ओसियाँ (जोधपुर), नागदा, देलवाड़ा और कुम्भलगढ़ की मूर्तिकला में कुंडल, हार, बाजूबन्ध, कंकण और नूपुर के विविध रूपों का अंकन मिलता है। ये मूर्तियाँ सिद्ध करती हैं कि एक-एक आभूषण की पच्चीसों प्रकार की डिज़ाइनें (अभिकल्पनाएं) प्रचलित थीं।
3. राजस्थान की विशिष्ट आभूषण निर्माण शैलियाँ (शिल्प कला)
राजस्थान के आभूषण अपने निर्माण की जटिल तकनीकों और कलात्मकता के लिए विश्व विख्यात हैं। राज्य के विभिन्न नगर अपनी विशिष्ट शैलियों के लिए भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI) और वैश्विक पहचान रखते हैं।
1. कुंदन कला (जयपुर)
- विवरण: स्वर्ण आभूषणों पर कीमती पत्थरों (रत्नों) की जड़ाई की कला को ‘कुंदन कला‘ कहा जाता है। यह मुग़ल और राजस्थानी शैली का मिश्रण है।
- प्रक्रिया: इसमें सोने के बेहद पतले पत्रों (Foils) का उपयोग करके पत्थरों को आभूषण के सांचे में जमाया जाता है। जयपुर इस कला का विश्व प्रसिद्ध केंद्र है।
2. थेवा कला (प्रतापगढ़) – GI टैग प्राप्त
- विवरण: रंगीन बेल्जियम काँच (Glass) पर सोने (Gold) का अत्यंत बारीक और कलात्मक चित्रांकन ‘थेवा कला’ कहलाता है।
- विशेषता: इस कला के लिए प्रतापगढ़ का ‘राजसोनी’ परिवार विगत कई शताब्दियों से एकाधिकार रखता है। इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है, जो इसकी विशिष्टता को प्रमाणित करता है।
3. तारकशी (नाथद्वारा – राजसमंद)
- विवरण: नाथद्वारा, जो श्रीनाथजी की नगरी है, अपने चाँदी के आभूषणों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ चाँदी के बेहद बारीक तारों को गूँथकर जेवर बनाए जाते हैं, जिसे ‘तारकशी’ कहा जाता है।
4. कोफ्तगिरी (जयपुर व अलवर)
- विवरण: फौलाद (Steel/Iron) की वस्तुओं (जैसे तलवार की मूठ, ढाल, कटार) पर सोने के पतले तारों की जड़ाई करना ‘कोफ्तगिरी’ कहलाता है। यह दमिश्क (Damascus) मूल की कला है जिसे राजस्थान में संरक्षण मिला।
5. मीनाकारी (जयपुर)
- विवरण: सोने या चाँदी के आभूषणों पर रंग-बिरंगे मीने (Enamel) चढ़ाने की कला। जयपुर के राजा मानसिंह प्रथम इसे लाहौर से आमेर लाए थे।
4. स्त्रियों के आभूषण
राजस्थान में स्त्रियों का श्रृंगार ‘सिर से पाँव’ तक (आपादमस्तक) विशिष्ट आभूषणों से होता है।
(क) सिर और मस्तक के आभूषण
सिर के आभूषण सुहाग और सम्मान के प्रतीक माने जाते हैं।
- बोर/बोरला: बेर के फल के आकार का गोल स्वर्ण आभूषण, जो ललाट के मध्य में पहना जाता है। इसमें छोटे-छोटे दाने उभरे होते हैं।
- रखड़ी: यह बोर के पीछे पहना जाने वाला भारी और गोलाकार आभूषण है, जिसे दबाने पर यह टिक जाता है।
- शीशफूल/सिरमांग: सोने की जंजीरों से बना आभूषण जो सिर के बालों के ऊपर फैलाकर पहना जाता है।
- मेमंद: सिर पर पहना जाने वाला लोकगीतों में चर्चित आभूषण।
- टीडीभलको: ललाट पर मांग के नीचे पहना जाने वाला टीका।
- सांकली/गोफड़: बालों की वेणी (चोटी) में गूंथा जाने वाला आभूषण।
- अन्य: चूड़ारत्न, मुकुट, टिकड़ा।
(ख) कान के आभूषण
- कर्णफूल/कुंडल: कान के निचले हिस्से में पहने जाने वाले पुष्प आकृति के आभूषण।
- पीपलपत्रा: कान के ऊपरी हिस्से में पहनी जाने वाली सोने/चाँदी की वलयाकार (Ring shaped) रचना, जो पीपल के पत्ते जैसी दिखती है।
- झेला/लटकन: यह कान के आभूषणों का भार संभालने के लिए बालों में अटकाया जाने वाला जंजीरनुमा आभूषण है।
- सुरलिया: कान में पहना जाने वाला एक विशिष्ट आभूषण।
- अन्य: अंगोट्या, ओगन्या, टोटी, बाली, मोरफवर।
(ग) नाक के आभूषण
- बेसरि: यह किशनगढ़ चित्रशैली (बनी-ठनी) का प्रमुख आभूषण है, जो नाक में पहना जाता है और इसका एक हिस्सा मोर की आकृति का होता है।
- नथ/नथनी: विवाह के अवसर पर पहनी जाने वाली बड़ी गोलाकार रिंग। यह सुहाग का प्रतीक है।
- चोप: नाक में पहनी जाने वाली छोटी लौंग जैसी कील (इसे ‘चूं’ भी कहते हैं)। ध्यान दें: ‘चूप’ दांत का आभूषण है, जबकि ‘चोप’ नाक का।
- लौंग/काँटा/बारी: नाक की बायीं ओर छिद्र में पहने जाने वाले छोटे आभूषण।
(घ) दाँत के आभूषण
- रखन: दाँतों के बीच में सोने या चाँदी की कील जड़वाना।
- चूप: दाँत में सोने की मेख लगवाना।
(ङ) गले और वक्षस्थल के आभूषण
- तिमणियाँ: सोने की तीन लड़ियों वाला आभूषण जो गले में पहना जाता है। यह मारवाड़ क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय है।
- हाँसली/खुंगाली: गले का हंसली की हड्डी (Clavicle bone) पर टिकने वाला ठोस कड़ा। यह बच्चों और ग्रामीणों में अधिक प्रचलित है।
- चम्पाकली: चम्पा की कलियों के आकार की लड़ियों वाला हार।
- मादलिया: ताबीज के आकार का आभूषण जिसे देवी-देवताओं के नाम पर पहना जाता है।
- आड़: राजपूती महिलाओं द्वारा विवाह में पहना जाने वाला आयताकार सोने का आभूषण जो पूरे गले को ढकता है।
- तुलसी/बजट्टी: गले से सटा हुआ पट्टेनुमा आभूषण।
- अन्य: हार, चंद्रहार, कंठमाला, मटरमाला, पोत, सरी, झालर, मंगलसूत्र, पंचलड़ी।
(च) हाथ और कलाई के आभूषण
- गोखरू: सोने या चाँदी का बना कड़ा जिसमें नुकीले उभार (कांटे जैसी डिजाइन) होते हैं।
- नौगरी: मोतियों की लड़ियों से बना आभूषण जो चूड़ियों के बीच पहना जाता है।
- हाथी दाँत का चूड़ा: राजस्थानी (विशेषकर राजपूत) सुहागिन स्त्रियाँ विवाह के अवसर पर हाथी दाँत का चूड़ा पहनती हैं। वर्तमान में प्लास्टिक या लाख का उपयोग बढ़ा है।
- बाजूबंद/उतरणी: भुजा पर पहना जाने वाला आभूषण। यह कपड़े की पट्टी पर सोने के काम से भी बनता है।
- अन्य: टड्डा, अणत, कंकण, गजरा, पूंचिया, कड़ा।
(छ) उंगलियों के आभूषण
- हथपान/सोहनपान: कलाई से लेकर उंगलियों तक जंजीरों से जुड़ा हुआ आभूषण, जिसमें अंगूठियाँ जुड़ी होती हैं।
- दामणा: दो उंगलियों में एक साथ पहनी जाने वाली अंगूठी।
- अरसी: अंगूठे में पहनी जाने वाली अंगूठी जिसमें छोटा सा दर्पण (शीशा) लगा होता था, ताकि रानियाँ अपना मुख देख सकें।
- अन्य: बींटी, मूंदड़ी, छड़ा।
(ज) कमर के आभूषण
- कंदोरा/करधनी: कमर में बांधी जाने वाली सोने या चाँदी की जंजीर।
- सटका: लहंगे के नेफे में अटकाकर लटकाया जाने वाला आभूषण, जिसमें चाबियाँ का गुच्छा लटकाया जाता है।
- अन्य: तागड़ी, कणकती, मेखला।
(झ) पैर के आभूषण
- रमझोल: चमड़े के पट्टे पर बहुत सारे घुंघरू लगाकर बनाया गया आभूषण, जो नृत्य के समय बजता है।
- नेवरी: पाँव में पहना जाने वाला वलयाकार आभूषण जो पायल जैसा होता है, लेकिन इसकी बनावट भिन्न होती है।
- आंवला/सांठ: ठोस चाँदी का कड़ा।
- फोलरी: पैर की उंगलियों में पहनी जाने वाली बिछिया।
- अन्य: पाजेब, नूपुर, झाँझर, लंगर, कड़ा, तोड़ा, हिरना मैन, तेधड़ (भील स्त्रियों द्वारा)।
5. पुरुषों के आभूषण
राजस्थान में पुरुष भी प्राचीन काल से आभूषण प्रिय रहे हैं।
- कान: मुरकियां (गोलाकार बाली), लोंग, झाले, छैलकड़ी।
- हाथ: कड़ा (जिसे ‘नरमुखा’ या ‘नाका’ भी कहते हैं)।
- गला: कंठा, जंजीर, ताबीज।
- उंगलियां: अंगूठी, छाप।
6. राजस्थान की वेशभूषा
वेशभूषा किसी भी क्षेत्र की जलवायु, भौगोलिक स्थिति और जातीयता का दर्पण होती है। राजस्थान में ‘रंगीलो राजस्थान’ की छवि यहाँ के परिधानों के चटकीले रंगों से ही बनी है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कालीबंगा और आहड़ सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त ‘तकली’ और ‘रुई कातने के चक्र’ यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ सूती वस्त्रों की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। बैराठ (जयपुर) की सभ्यता में सूती कपड़े के अवशेष मिले हैं। प्राचीन मूर्तियों में पुरुषों को धोती (अधोवस्त्र) और उत्तरीय (दुपट्टा) पहने दर्शाया गया है।
गुप्तोत्तर काल (कल्याणपुर की मूर्तियाँ) और मध्यकाल (कीर्तिस्तम्भ) की कला में वेशभूषा का क्रमिक विकास दिखता है। छपे हुए वस्त्र (Block Printing) और कसीदाकारी का प्रचलन बढ़ा। मुगल संपर्क के बाद वेशभूषा में जामा, पटका और पायजामा का समावेश हुआ।
प्रचलित वस्त्रों के प्रकार (ऐतिहासिक)
मध्यकालीन राजस्थान में वस्त्रों की विविधता अत्यधिक थी। प्रमुख कपड़ों में शामिल थे:
- मलमल, मखमल, पारचा, मसरु, छींट (Prints)।
- दरबारी वस्त्र: जामदानी, किमखाब, नौरंगशाही, बादला (धातु के तारों से युक्त कपड़ा), बाफ्टा, गंगाजली आदि।
7. पुरुषों के परिधान
(क) पगड़ी (साफा/पाग/पेंचा)
राजस्थान में पगड़ी केवल सिर ढकने का वस्त्र नहीं, बल्कि यह व्यक्ति की प्रतिष्ठा (आन-बान-शान) और जाति का सूचक है।
- प्रमुख तथ्य: मेवाड़ की पगड़ी आकार में चपटी होती है, जबकि मारवाड़ का साफा ऊँचा और फूला हुआ होता है।
- विश्व रिकॉर्ड: विश्व की सबसे बड़ी पगड़ी ‘बागौर की हवेली’ संग्रहालय (उदयपुर) में रखी गई है।
- पगड़ी बांधने की कला: इसे बांधने वाले पेशेवर व्यक्ति को ‘छाबदार’ कहा जाता है।
पगड़ी के प्रकार (ऋतु और अवसर के अनुसार):
- मोठड़ा पगड़ी: विवाह के उत्सव पर पहनी जाती है (जिसमें धारियां एक-दूसरे को काटती हैं)।
- लहरिया पगड़ी: श्रावण मास (सावन) में तीज के अवसर पर।
- मदील: दशहरे के अवसर पर पहनी जाने वाली जरदोजी कसीदाकारी युक्त पगड़ी।
- केसरिया पगड़ी: युद्ध में जाते समय या दीपावली के अवसर पर।
- फूल-पत्ती की छपाई वाली पगड़ी: होली के अवसर पर।
- पचरांगा/राजशाही: जयपुर की प्रसिद्ध लहरिया पगड़ी।
रियासती पगड़ियाँ (शैलियाँ):
विभिन्न रियासतों में पगड़ी बांधने की अलग शैलियाँ थीं, जैसे: उदयशाही (मेवाड़), जसवंत शाही (जोधपुर), भीमशाही, मानशाही, राठौड़ी, हम्मीरशाही, अमरशाही, शाहजहाँनी (मुगल प्रभाव), चुड़ावत शाही।
पगड़ी के आभूषण:
पगड़ी को सजाने के लिए उस पर तुर्रे, सरपेच, बालाबंदी, धुगधुगी, गोसpeच, लटकन और फतेहपेच लगाए जाते हैं।
(ख) अंगरखी (बुगतरी)
यह शरीर के ऊपरी भाग में पहना जाने वाला वस्त्र है। यह एक प्रकार का लंबा कुर्ता होता है जो बगल में बंद होता है।
- अन्य नाम: अचकन, बण्डी, तनसुख, दुतई, गाबा, गदर, मिर्जई, डोढी, कानो, डगला।
- ग्रामीण परंपरा: सर्दी में रुईदार अंगरखी पहनी जाती है।
(ग) धोती और पछेवड़ा
- धोती: कमर के नीचे पहना जाने वाला 4-5 मीटर लंबा वस्त्र।
- पछेवड़ा/घुघी: सर्दी से बचाव के लिए ओढ़ा जाने वाला मोटा सूती या ऊनी वस्त्र (शॉल की तरह)।
- आत्मसुख: तेज सर्दी में अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला कश्मीरी फिरन जैसा लबादा। सबसे पुराना ‘आत्मसुख’ जयपुर के सिटी पैलेस संग्रहालय में सुरक्षित है।
(घ) अन्य पुरुष वस्त्र
- चौगा: अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला चोगानुमा वस्त्र (अक्सर संपन्न वर्ग द्वारा)।
- जामा: विवाह या युद्ध के समय पहना जाने वाला घेरदार वस्त्र।
- ब्रीचेस (Breeches)/बिरजस: ब्रिटिश प्रभाव से आया वस्त्र, जो चूड़ीदार पायजामे जैसा होता है लेकिन घुटनों से ऊपर गुब्बारे जैसा फूला हुआ होता है। यह शिकार या पोलो खेलते समय पहना जाता था।
- कमरबंद/पटका: जामा या अंगरखी के ऊपर कमर में बांधा जाने वाला कपड़ा, जिसमें तलवार या कटार रखी जाती थी।
8. स्त्रियों के परिधान
(क) ओढ़नी (लुगड़ी)
यह स्त्रियों की लज्जा और सुहाग का प्रतीक है।
- पोमचा: कमल की तरह गोल खंजन वाली ओढ़नी।
- पीला पोमचा: पुत्र जन्म पर जलवा पूजन के समय प्रसूता ओढ़ती है।
- गुलाबी पोमचा: पुत्री जन्म पर ओढ़ा जाता है।
- चीड़ का पोमचा: हाड़ौती क्षेत्र में विधवा स्त्रियों द्वारा ओढ़ी जाने वाली काले रंग की ओढ़नी।
- लहरिया: सावन के महीने में जयपुर का समुद्र-लहर और पचरंगी लहरिया प्रसिद्ध है।
- जब लहरिये की धारियां एक-दूसरे को काटती हैं, तो उसे ‘मोठड़ा’ कहते हैं।
- चूनड़/चूंदड़ी: जोधपुर की प्रसिद्ध है। इसमें बंधेज का कार्य होता है।
- दामणी: मारवाड़ में लाल रंग की ओढ़नी जिस पर धागों से कसीदाकारी की जाती है।
- पवरी: दुल्हन द्वारा विवाह के समय ओढ़ी जाने वाली लाल-गुलाबी ओढ़नी।
- कंवरजोड़: मामा द्वारा विवाह के अवसर पर अपनी भांजी के लिए लाई गई ओढ़नी।
(ख) घाघरा (लहंगा)
कलीदार स्कर्ट। कलियों की संख्या घाघरे की भव्यता को दर्शाती है (जैसे- 80 कली का घाघरा)।
- अन्य नाम: पेटीकोट, लहंगा।
- सामग्री: छींट, साटन, सिल्क या सूती।
(ग) कुर्ती और कांचली
- कुर्ती: बिना बांह का वक्षस्थल का वस्त्र।
- कांचली: बांह वाली चोली जो पीठ पर डोरियों से बांधी जाती है।
- तिलका: मुस्लिम महिलाओं द्वारा चूड़ीदार पायजामे के ऊपर पहना जाने वाला चोगानुमा वस्त्र।
(घ) साड़ी
- कोटा डोरिया (मसूरिया): कोटा (कैथून) की प्रसिद्ध जालीदार साड़ी। इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है। यह अपनी हल्कापन और चौकोर चेक पैटर्न (खत) के लिए प्रसिद्ध है।
- सवाई माधोपुर: सूंठ की साड़ियों के लिए प्रसिद्ध।
- आदिवासी साड़ियाँ: जामसाही साड़ी (विवाह पर)।
9. आदिवासी वेशभूषा और संस्कृति
राजस्थान की जनजातियों (भील, गरासिया, सहरिया, मीणा) की वेशभूषा उनकी पृथक पहचान है।
आदिवासी पुरुष वस्त्र
- पोत्या: भील पुरुषों द्वारा सिर पर बांधा जाने वाला सफेद साफा।
- ढेपाड़ा: भील पुरुषों की तंग धोती।
- खोयतू: लंगोटिया भीलों द्वारा कमर में बांधी जाने वाली लंगोटी।
- पन्छा: सहरिया जनजाति की धोती।
- खपटा: सहरिया साफा।
- सलूका: सहरिया पुरुषों की अंगरखी।
आदिवासी स्त्री वस्त्र
- नान्दणा (नादड़ा): यह आदिवासियों का सबसे प्राचीन वस्त्र है। यह नीले रंग की छींट का लहंगा होता है।
- कछावू: भील महिलाओं द्वारा घुटनों तक पहना जाने वाला घाघरा (लाल-काले रंग का)।
- कटकी (पावली भांत की ओढ़नी): अविवाहित आदिवासी युवतियों द्वारा ओढ़ी जाने वाली ओढ़नी।
- जामसाई साड़ी: विवाह के अवसर पर आदिवासी दुल्हन द्वारा पहनी जाने वाली साड़ी।
- रेनसाई: आदिवासी महिलाओं का काले रंग का लहंगा जिस पर लाल-भूरे रंग की बूटियाँ होती हैं।
- तारा भांत/केरी भांत/ज्वार भांत की ओढ़नी: आदिवासी महिलाओं में अत्यंत लोकप्रिय ओढ़नी की शैलियाँ।
10. निष्कर्ष
राजस्थान की वेशभूषा और आभूषण केवल अलंकरण मात्र नहीं हैं, अपितु वे यहाँ के इतिहास, भूगोल, कला और समाजशास्त्र का जीवित दस्तावेज हैं। जहाँ एक ओर ‘थेवा कला’ और ‘कुंदन’ ने अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अपनी धाक जमाई है, वहीं दूसरी ओर ‘कोटा डोरिया’ और ‘सांगानेरी प्रिंट’ जैसे वस्त्र उद्योगों ने भौगोलिक संकेतक (GI Tags) के माध्यम से कानूनी संरक्षण प्राप्त किया है। यह भौतिक संस्कृति (Material Culture) राजस्थान की पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित और संवर्धित कर रही है।
