अध्याय 15
CrPC Section 202 in Hindi: आदेशिका के जारी किए जाने का स्थगन
New Law Update (2024)
धारा 236 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
सेशन न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक – वारंट/समन आदेशिका
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध की परिवाद प्राप्त होने पर जिसका संज्ञान करने के लिए वह प्राधिकृत है या जिसे धारा 192 के अधीन उसे सुपुर्द किया गया है, यदि वह ठीक समझे तो, और ऐसे मामले में करेगा जिसमें अभियुक्त उस क्षेत्र के बाहर रहता है जिसमें वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग करता है, अभियुक्त के विरुद्ध आदेशिका के जारी किए जाने को स्थगित कर देगा, और या तो मामले की स्वयं जांच करेगा या किसी पुलिस अधिकारी द्वारा या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जिसे वह ठीक समझे, अन्वेषण किए जाने का निदेश देगा, यह अवधारण करने के प्रयोजन के लिए कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं:
परंतु अन्वेषण के लिए कोई ऐसा निदेश नहीं दिया जाएगा—
(क) जहां मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि परिवादित अपराध अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है; या
(ख) जहां परिवाद किसी न्यायालय द्वारा नहीं किया गया है, जब तक परिवादी और उपस्थित साक्षियों (यदि कोई हों) की धारा 200 के अधीन शपथ पर परीक्षा नहीं कर ली गई है।
(2) उपधारा (1) के अधीन की गई जांच में, मजिस्ट्रेट, यदि वह ठीक समझे तो, साक्षियों का शपथ पर साक्ष्य ले सकेगा:
परंतु यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि परिवादित अपराध अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है, तो वह परिवादी से उसके सभी साक्षियों को पेश करने के लिए कहेगा और उनकी शपथ पर परीक्षा करेगा।
(3) यदि उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो पुलिस अधिकारी नहीं है, तो उस अन्वेषण के लिए उसे वे सभी शक्तियां होंगी जो इस संहिता द्वारा पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति के सिवाय प्रदत्त हैं।
Important Sub-Sections Explained
धारा 202(1) दं.प्र.सं.
यह महत्वपूर्ण उपधारा एक मजिस्ट्रेट को सशक्त करती है कि वह किसी अभियुक्त के विरुद्ध समन या वारंट जारी करने को स्थगित कर दे और इसके बजाय स्वयं जांच करे या अन्वेषण का निदेश दे। यह अनिवार्य है यदि अभियुक्त मजिस्ट्रेट की अधिकारिता के बाहर रहता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल वास्तविक आधार वाले मामले ही आगे बढ़ें, जिससे अनावश्यक उत्पीड़न को रोका जा सके।
Landmark Judgements
महमूद उल रहमान बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2007):
उच्चतम न्यायालय ने धारा 202 के अधीन जांच के दायरे को स्पष्ट किया, इस बात पर जोर देते हुए कि मजिस्ट्रेट को यह निर्धारित करने के लिए अपना विवेक लगाना होगा कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार हैं या नहीं, और इसका उद्देश्य निराधार शिकायत से किसी निर्दोष व्यक्ति को उत्पीड़न से बचाना है।
शिवजी सिंह बनाम नागेंद्र तिवारी (2010):
उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि धारा 202 के अधीन जांच यह सुनिश्चित करने के लिए है कि अभियुक्त के विरुद्ध आदेशिका जारी करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, और इसका उद्देश्य साक्ष्य की विस्तृत जांच करना नहीं है मानो वह कोई विचारण हो।