अध्याय छब्बीस

CrPC Section 340 in Hindi: धारा 195 में उल्लिखित मामलों में कार्यविधि

New Law Update (2024)

धारा 351 बी.एन.एस.एस.

TRIAL COURT

प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट

Punishment​

प्रक्रियात्मक – अन्वेषण / जांच

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) जब इस निमित्त उसे किए गए आवेदन पर या अन्यथा यदि किसी न्यायालय की यह राय है कि न्याय के हित में यह समीचीन है कि धारा 195 की उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी ऐसे अपराध के बारे में जांच की जाए जो उस न्यायालय में की किसी कार्यवाही में या उसके संबंध में, या यथास्थिति, उस न्यायालय की किसी कार्यवाही में पेश की गई या साक्ष्य में दी गई किसी दस्तावेज के संबंध में किया गया प्रतीत होता है, तो ऐसा न्यायालय, ऐसी प्रारंभिक जांच के पश्चात्, यदि कोई हो, जो वह आवश्यक समझे,
(क) उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा;
(ख) उसकी लिखित परिवाद करेगा;
(ग) उसे अधिकारिता रखने वाले प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को भेजेगा;
(घ) अभियुक्त की ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिरी के लिए पर्याप्त प्रतिभूति लेगा, या यदि अभिकथित अपराध अजमानतीय है और न्यायालय ऐसा करना आवश्यक समझता है, तो अभियुक्त को अभिरक्षा में ऐसे मजिस्ट्रेट को भेजेगा; और
(ङ) किसी व्यक्ति को ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होने और साक्ष्य देने के लिए आबद्ध करेगा।
(2) उपधारा (1) द्वारा किसी न्यायालय को किसी अपराध के संबंध में प्रदत्त शक्ति, किसी ऐसे मामले में जहां उस न्यायालय ने न तो उस अपराध के संबंध में उपधारा (1) के अधीन परिवाद किया है और न ही ऐसे परिवाद के करने के लिए आवेदन को नामंजूर किया है, उस न्यायालय द्वारा प्रयोग की जा सकेगी जिसके अधीनस्थ ऐसा पूर्ववर्ती न्यायालय धारा 195 की उपधारा (4) के अर्थ में है।
(3) इस धारा के अधीन किया गया परिवाद—
(क) जहां परिवाद करने वाला न्यायालय उच्च न्यायालय है, वहां न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा जिस अधिकारी को न्यायालय नियुक्त करे;
(ख) किसी अन्य मामले में, न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा या न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा जिसे न्यायालय इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत करे।
(4) इस धारा में, “न्यायालय” का वही अर्थ है जो धारा 195 में है।

Important Sub-Sections Explained

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340(1)

यह उपधारा एक न्यायालय को जांच शुरू करने और एक मजिस्ट्रेट को औपचारिक परिवाद करने का अधिकार देती है, जब उसे विश्वास हो कि एक अपराध, जैसे झूठी गवाही या दस्तावेज़ जालसाज़ी (जैसा कि धारा 195(1)(ख) में सूचीबद्ध है), उसकी कार्यवाही में किया गया है और न्याय के लिए यह आवश्यक है। यह उन विशिष्ट कदमों को रेखांकित करती है जिनका न्यायालय को पालन करना चाहिए, जिसमें प्रारंभिक जांच, निष्कर्षों का अभिलेखन और अभियुक्त को भेजना या उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना शामिल है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340(2)

यह उपधारा एक उच्च न्यायालय को धारा 340(1) की शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार देती है, यदि अधीनस्थ न्यायालय, जिससे वह पदानुक्रमित रूप से जुड़ा हुआ है, ने न तो स्वयं उस अपराध के संबंध में परिवाद शुरू किया है और न ही ऐसे परिवाद के लिए आवेदन को अस्वीकार किया है।

Landmark Judgements

प्रीतीश नंदी बनाम महाराष्ट्र राज्य (1994):

इस मामले में यह उजागर किया गया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत शक्ति विवेकाधीन है और इसका प्रयोग तभी किया जाना चाहिए जब न्यायालय की यह राय बने कि जांच शुरू करना ‘न्याय के हित में समीचीन’ है, न कि नियमित प्रक्रिया के तौर पर।

एम.एस. अहलावत बनाम हरियाणा राज्य (2000):

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत न्यायालय की शक्ति मुख्य रूप से अपनी कार्यवाही से संबंधित अपराधों, जैसे झूठी गवाही देने की जांच करना है, और ऐसी कार्रवाई शुरू करने के लिए प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं पर जोर देती है।

एन. नटराजन बनाम बी.के. सुब्बा राव (2003):

इस निर्णय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत न्यायालय द्वारा परिवाद करने से पहले ‘न्याय के हित में समीचीनता’ की आवश्यक राय बनाने में प्रारंभिक जांच के महत्व को दोहराया, भले ही यह विवेकाधीन हो।

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