अध्याय बीस

CrPC Section 256 in Hindi: परिवादी का हाज़िर न होना या उसकी मृत्यु

New Law Update (2024)

धारा 297 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता

TRIAL COURT

मजिस्ट्रेट न्यायालय

Punishment​

प्रक्रियात्मक – वारंट / समन प्रक्रिया

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) यदि परिवाद पर समन जारी किया गया है और अभियुक्त के हाज़िर होने के लिए नियत दिन, या किसी ऐसे पश्चातवर्ती दिन को जिसको सुनवाई स्थगित की जाए, परिवादी हाज़िर नहीं होता है, तो मजिस्ट्रेट, इसमें किसी बात के होते हुए भी, अभियुक्त को दोषमुक्त कर देगा जब तक कि किसी कारण से वह मामले की सुनवाई किसी अन्य दिन तक के लिए स्थगित करना ठीक न समझे: परंतु जहां परिवादी किसी प्लीडर द्वारा या अभियोजन का संचालन करने वाले अधिकारी द्वारा प्रतिनिधित्व करता है, या जहां मजिस्ट्रेट की राय है कि परिवादी की व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक नहीं है, वहां मजिस्ट्रेट उसकी हाजिरी माफ कर सकता है और मामले को आगे बढ़ा सकता है।
(2) उपधारा (1) के उपबंध, यथाशक्य, ऐसे मामलों को भी लागू होंगे जहां परिवादी का हाज़िर न होना उसकी मृत्यु के कारण है।

Important Sub-Sections Explained

धारा 256(1)

यह महत्वपूर्ण उपधारा एक समन मामले में परिवादी के हाज़िर होने में विफल रहने के डिफ़ॉल्ट परिणाम को रेखांकित करती है, जो अभियुक्त की दोषमुक्ति है, जब तक कि मजिस्ट्रेट सुनवाई को स्थगित करना उचित न समझे। यह मजिस्ट्रेट को परिवादी की व्यक्तिगत हाजिरी को माफ करने की शक्ति भी प्रदान करती है यदि उनका प्रतिनिधित्व किया जाता है या यदि उनकी उपस्थिति आवश्यक नहीं है।

धारा 256(2)

यह उपधारा उपधारा (1) में स्थापित सिद्धांत का विस्तार उन स्थितियों को कवर करने के लिए करती है जहां परिवादी की अनुपस्थिति उनकी मृत्यु के कारण होती है, यह सुनिश्चित करती है कि हाज़िर न होने के संबंध में दोषमुक्ति की ओर ले जाने वाले समान प्रक्रियात्मक विचार ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में लागू होते हैं।

Landmark Judgements

एस. आनंद बनाम के.पी. गोविंदास्वामी (2023):

सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 256 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत दोषमुक्ति की अनिवार्य प्रकृति को स्पष्ट किया यदि परिवादी हाज़िर होने में विफल रहता है, जब तक कि मजिस्ट्रेट स्थगन के लिए एक वैध कारण दर्ज न करे। इसने इस बात पर ज़ोर दिया कि परिवादी की हाजिरी माफ करने का विवेकाधिकार न्यायिक रूप से प्रयोग किया जाना चाहिए, न कि किसी प्लीडर द्वारा प्रतिनिधित्व पर स्वतः ही।

के.एस. पांडुरंगा बनाम कर्नाटक राज्य (2013):

इस सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने धारा 256 के परंतुक के तहत मजिस्ट्रेट के विवेकाधिकार को स्पष्ट किया, जिससे परिवादी की हाजिरी की छूट की अनुमति मिलती है। इसने इस बात पर बल दिया कि ऐसे विवेकाधिकार का प्रयोग सावधानीपूर्वक विचार के बाद किया जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य त्वरित न्याय सुनिश्चित करना और परिवादी की अनुपस्थिति के कारण अभियुक्त को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना है।

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