अध्याय XXVII

CrPC Section 357 in Hindi: प्रतिकर देने का आदेश

New Law Update (2024)

धारा 396 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता

TRIAL COURT

विचारण न्यायालय, अपील न्यायालय, पुनरीक्षण न्यायालय

Punishment​

प्रक्रियात्मक – निर्णय / दंडादेश

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) जब कोई न्यायालय जुर्माना या ऐसा दंडादेश (जिसके अंतर्गत मृत्यु दंडादेश भी है) अधिरोपित करता है जिसका जुर्माना भाग है तब न्यायालय निर्णय सुनाते समय आदेश दे सकेगा कि वसूल किए गए जुर्माने का पूरा या कोई भाग निम्नलिखित में उपयोजित किया जाए—
(क) अभियोजन में उचित रूप से उपगत व्ययों को चुकाने में;
(ख) अपराध से हुई किसी हानि या क्षति के लिए किसी व्यक्ति को प्रतिकर के संदाय में, जब न्यायालय की राय में ऐसा प्रतिकर सिविल न्यायालय में ऐसे व्यक्ति द्वारा वसूलनीय हो;
(ग) जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के या ऐसे अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करने के किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है तब उन व्यक्तियों को प्रतिकर चुकाने में जो घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 (1855 का 13) के अधीन, ऐसे व्यक्ति से, जिसे ऐसे मृत्यु से हुई हानि के लिए दंडादेश दिया गया है, नुकसानी वसूल करने के हकदार हैं;
(घ) जब कोई व्यक्ति ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है जिसमें चोरी, आपराधिक दुर्विनियोग, आपराधिक न्यास-भंग, या छल आता है, या चुराई हुई संपत्ति का बेईमानी से प्राप्त करना या प्रतिधारण करना, या यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि वह चुराई हुई है, उसके व्ययन में स्वेच्छा से सहायता करना आता है तब ऐसी संपत्ति के किसी सद्भावपूर्वक क्रेता को उसके खोने के लिए प्रतिकर देने में यदि ऐसी संपत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे में लौटा दी जाती है।
(2) यदि जुर्माना ऐसे मामले में अधिरोपित किया जाता है जो अपील योग्य है तो ऐसा कोई संदाय अपील उपस्थित करने के लिए अनुज्ञात अवधि के बीत जाने से पहले नहीं किया जाएगा, या यदि अपील उपस्थित की जाती है तो अपील के विनिश्चय से पहले नहीं किया जाएगा।
(3) जब कोई न्यायालय ऐसा दंडादेश अधिरोपित करता है जिसका जुर्माना भाग नहीं है तब न्यायालय निर्णय सुनाते समय अभियुक्त व्यक्ति को, प्रतिकर के तौर पर, इतनी रकम चुकाने का आदेश दे सकेगा जितनी आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए उस व्यक्ति को जिसे उस कार्य के कारण, जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को ऐसा दंडादेश दिया गया है, कोई हानि या क्षति हुई है।
(4) इस धारा के अधीन आदेश अपील न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी तब किया जा सकेगा जब वह अपनी पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।
(5) उसी विषय से संबंधित किसी पश्चात्वर्ती सिविल वाद में प्रतिकर अधिनिर्णीत करते समय न्यायालय इस धारा के अधीन प्रतिकर के रूप में संदत्त या वसूल की गई किसी रकम को हिसाब में लेगा।

Important Sub-Sections Explained

धारा 357(1)

यह उपधारा किसी न्यायालय को, जब वह जुर्माना या ऐसा दंडादेश अधिरोपित करता है जिसमें आंशिक रूप से जुर्माना शामिल है, यह निर्देश देने की अनुमति देती है कि वसूल किया गया जुर्माना पीड़ितों को प्रतिकर देने, अभियोजन व्ययों को कवर करने, या मृत्यु या चोरी की संपत्ति के मामलों में नुकसानी चुकाने के लिए उपयोग किया जाए।

धारा 357(7)

यह महत्वपूर्ण प्रावधान न्यायालय को अभियुक्त को पीड़ित को प्रतिकर चुकाने का आदेश देने में सक्षम बनाता है, भले ही दंडादेश में जुर्माना शामिल न हो, यह सुनिश्चित करते हुए कि पीड़ित अपनी हानि या चोट के लिए सीधे अपराधी से प्रत्यास्थापन प्राप्त कर सकें।

Landmark Judgements

हरि सिंह बनाम सुखबीर सिंह (1988):

उच्चतम न्यायालय ने रेखांकित किया कि धारा 357 के तहत प्रतिकर प्रदान करने की शक्ति केवल सहायक नहीं बल्कि एक अतिरिक्त, महत्वपूर्ण शक्ति है। इसमें यह अनिवार्य किया गया कि न्यायालयों को प्रतिकर के मुद्दे पर अपना दिमाग लगाना चाहिए और यदि पीड़ित को कोई प्रतिकर नहीं दिया जाता है तो विशिष्ट कारण दर्ज करने चाहिए।

अंकुश शिवाजी गायकवाड़ बनाम महाराष्ट्र राज्य (2013):

इस ऐतिहासिक निर्णय ने सभी आपराधिक न्यायालयों के लिए प्रत्येक मामले में पीड़ितों को प्रतिकर प्रदान करने पर विचार करना अनिवार्य कर दिया, भले ही अपराध जुर्माने से दंडनीय हो या नहीं। यदि न्यायालय प्रतिकर प्रदान न करने का निर्णय लेता है, तो उसे ऐसे निर्णय के लिए विशिष्ट कारण दर्ज करने होंगे, जिससे पीड़ित अधिकारों और पुनर्वास को महत्वपूर्ण रूप से बल मिला है।

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