अध्याय XXVII

CrPC Section 357A in Hindi: पीड़ित प्रतिकर योजना

New Law Update (2024)

धारा 396 बीएनएसएस

TRIAL COURT

विचारण न्यायालय (सिफारिश के लिए), जिला/राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (विनिश्चय और अधिनिर्णय के लिए)

Punishment​

प्रक्रियात्मक – विचारण/आरोप

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) प्रत्येक राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार के समन्वय से, ऐसे पीड़ित या उसके आश्रितों को, जिन्हें अपराध के परिणामस्वरूप हानि या क्षति हुई है और जिन्हें पुनर्वास की आवश्यकता है, प्रतिकर देने के प्रयोजन के लिए निधियां उपलब्ध कराने के लिए एक योजना तैयार करेगी।
(2) जब कभी न्यायालय द्वारा प्रतिकर के लिए सिफारिश की जाती है तब यथास्थिति, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, प्रतिकर की उस मात्रा को अवधारित करेगा जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट योजना के अधीन दिया जाना है।
(3) यदि विचारण न्यायालय, विचारण की समाप्ति पर, यह समाधान कर लेता है कि धारा 357 के अधीन दिया गया प्रतिकर ऐसे पुनर्वास के लिए पर्याप्त नहीं है या जहां मामलों का परिणाम दोषमुक्ति या उन्मोचन है और पीड़ित का पुनर्वास किया जाना है, तो वह प्रतिकर के लिए सिफारिश कर सकेगा।
(4) जहां अपराधी का पता नहीं लगाया गया है या उसकी पहचान नहीं हुई है, किंतु पीड़ित की पहचान हुई है और जहां कोई विचारण नहीं होता है, वहां पीड़ित या उसके आश्रित प्रतिकर दिए जाने के लिए राज्य या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को आवेदन कर सकेंगे।
(5) ऐसी सिफारिशों की प्राप्ति पर या उपधारा (4) के अधीन आवेदन पर, राज्य या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, सम्यक् जांच के पश्चात्, दो मास के भीतर जांच पूरी करके पर्याप्त प्रतिकर देगा।
(6) यथास्थिति, राज्य या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, पीड़ित के कष्ट को कम करने के लिए, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति के पुलिस अधिकारी के या संबंधित क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के प्रमाण-पत्र पर तत्काल प्राथमिक उपचार सुविधा या चिकित्सीय फायदा निःशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश दे सकेगा या कोई अन्य अंतरिम अनुतोष दे सकेगा जैसा समुचित प्राधिकारी ठीक समझे।

Important Sub-Sections Explained

धारा 357क(1)

यह उपधारा प्रत्येक राज्य सरकार को, केन्द्रीय सरकार के समन्वय से, उन पीड़ितों या उनके आश्रितों को प्रतिकर देने के लिए निधियां उपलब्ध कराने हेतु एक योजना तैयार करने का अधिदेश देती है जिन्हें अपराध से हानि या क्षति हुई है और जिन्हें पुनर्वास की आवश्यकता है। यह भारत में संपूर्ण पीड़ित प्रतिकर ढांचे की नींव रखती है।

धारा 357क(4)

यह महत्वपूर्ण उपधारा पीड़ितों या उनके आश्रितों को सीधे राज्य या जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को प्रतिकर के लिए आवेदन करने में सक्षम बनाती है, भले ही अपराधी का पता नहीं चला हो या उसकी पहचान नहीं हुई हो, या जहां कोई विचारण नहीं होता हो। यह सुनिश्चित करती है कि पीड़ितों को केवल प्रक्रियात्मक जटिलताओं या दोषसिद्धि के अभाव के कारण प्रतिकर से वंचित न किया जाए।

Landmark Judgements

निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ, (2013) 8 एससीसी 607:

उच्चतम न्यायालय के इस ऐतिहासिक निर्णय ने पीड़ितों के प्रतिकर के संवैधानिक अधिकार को रेखांकित किया, विशेषकर यौन उत्पीड़न के पीड़ितों के लिए। न्यायालय ने धारा 357क के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए, जिसमें राज्यों से त्वरित और पर्याप्त राहत सुनिश्चित करने हेतु पीड़ित प्रतिकर योजनाओं को स्थापित और संचालित करने का आग्रह किया गया।

सुरेश बनाम हरियाणा राज्य, (2018) 12 एससीसी 474:

इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारा 357क की अनिवार्य प्रकृति को दोहराया और विधिक सेवा प्राधिकरणों द्वारा प्रतिकर का विनिश्चय और अधिनिर्णय करने में निभाई जाने वाली सक्रिय भूमिका पर प्रकाश डाला। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि इस धारा के अधीन प्रतिकर किसी अन्य प्रतिकर से भिन्न और पूरक है, और आवेदनों के समय पर निपटान पर बल दिया गया।

मनोहरन बनाम राज्य (पुलिस निरीक्षक द्वारा), (2017) 12 एससीसी 377:

उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय ने धारा 357क के अधीन प्रतिकर की मात्रा का अवधारण करते समय विचार किए जाने वाले कारकों को स्पष्ट किया, इसे हानि, क्षति और पुनर्वास की आवश्यकता की सीमा से जोड़ते हुए। इसने यह भी पुष्टि की कि यह योजना अपराध के सभी पीड़ितों पर व्यापक रूप से लागू होती है, न केवल उन पर जहां अपराधी को दोषी ठहराया गया है।

Draft Format / Application

सेवा में,
सचिव,
[जिला विधिक सेवा प्राधिकरण / राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण],
[जिला/राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का पता],
[शहर, राज्य, पिन कोड]

विषय: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357क(4) के अधीन पीड़ित प्रतिकर के लिए आवेदन।

महोदय/महोदया,

मैं, [आवेदक का नाम], पुत्र/पुत्री/पत्नी [पिता/पति का नाम], लगभग [आयु] वर्ष, निवासी [आवेदक का पूरा पता], अत्यंत विनम्रतापूर्वक निवेदन करता/करती हूँ कि:

1. यह कि मैं पीड़ित [पीड़ित का नाम] का/की पीड़ित/आश्रित हूँ, जिसे [संक्षेप में हानि/क्षति/अपराध की प्रकृति का वर्णन करें, जैसे, गंभीर चोटें, प्राथमिक कमाऊ सदस्य की मृत्यु, यौन उत्पीड़न] की हानि/क्षति हुई, जो [घटना की तारीख] को या उसके आसपास [घटना का स्थान] पर हुए एक अपराध के परिणामस्वरूप हुई।
2. यह कि उक्त अपराध के संबंध में, [प्राथमिकी संख्या और पुलिस थाना, यदि लागू हो, या बताएं कि कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई थी/अपराधी का पता नहीं चला है]।
3. यह कि इस मामले में, अपराधी का पता नहीं चला/पहचान नहीं हुई है (या) कोई विचारण नहीं हुआ है (या) मामला दोषमुक्ति/उन्मोचन में समाप्त हुआ है (या) धारा 357 दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन दिया गया प्रतिकर पुनर्वास के लिए अपर्याप्त है (लागू कारण चुनें)।
4. यह कि उपर्युक्त अपराध के कारण, मुझे/पीड़ित को गंभीर वित्तीय कठिनाई, शारीरिक चोट, मानसिक आघात हुआ है, और पुनर्वास/चिकित्सा उपचार/आजीविका सहायता की आवश्यकता है (आवश्यकताओं को निर्दिष्ट करें)।
5. यह कि मैं दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357क(4) के अधीन यह आवेदन दायर कर रहा/रही हूँ, भुगती गई हानि और क्षति के लिए तथा मेरे/पीड़ित के पुनर्वास के लिए पर्याप्त प्रतिकर की मांग करते हुए।
6. यह कि मैं सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने का वचन देता/देती हूँ और इस माननीय प्राधिकरण द्वारा की गई किसी भी जांच में सहयोग करूंगा/करूंगी।

उपर्युक्त के आलोक में, अत्यंत विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की जाती है कि यह माननीय प्राधिकरण कृपया यह आदेश करे कि:
क) मुझे/पीड़ित को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357क(1) के अधीन निर्मित पीड़ित प्रतिकर योजना के अनुसार पर्याप्त प्रतिकर प्रदान करें।
ख) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357क(6) के अधीन तत्काल अंतरिम अनुतोष, जिसमें चिकित्सीय लाभ शामिल हैं, जैसा उचित समझा जाए, निर्देशित करें।
ग) न्याय के हित में कोई अन्य आदेश पारित करें जो यह माननीय प्राधिकरण उचित और न्यायसंगत समझे।

धन्यवाद सहित,

भवदीय,

[आवेदक के हस्ताक्षर]
[आवेदक का नाम]
[आवेदक का फोन नंबर]
[आवेदक का ईमेल पता]

स्थान: [शहर]
दिनांक: [दिनांक]

संलग्नक:
1. प्राथमिकी/पुलिस शिकायत की प्रति (यदि कोई हो)
2. मेडिकल रिपोर्ट/प्रमाण पत्र
3. मृत्यु प्रमाण पत्र (यदि लागू हो)
4. पहचान और पते का प्रमाण
5. कोई अन्य प्रासंगिक दस्तावेज

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