अध्याय VIII

CrPC Section 106 in Hindi: सिद्धदोष ठहराए जाने पर परिशांति कायम रखने के लिए प्रतिभूति

New Law Update (2024)

धारा 130 बी.एन.एस.एस.

TRIAL COURT

सेशन न्यायालय, प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट

Punishment​

प्रक्रियात्मक – निर्णय / दंडादेश

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) जब सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट का न्यायालय किसी व्यक्ति को उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी अपराध का या ऐसे किसी अपराध का दुष्प्रेरण करने का सिद्धदोष ठहराता है और उसकी राय है कि ऐसे व्यक्ति से परिशांति कायम रखने के लिए प्रतिभूति लेना आवश्यक है, तब न्यायालय ऐसे व्यक्ति पर दंडादेश देते समय उसे ऐसी अवधि के लिए, जो तीन वर्ष से अधिक नहीं होगी, जैसी वह ठीक समझे, प्रतिभुओं सहित या रहित परिशांति कायम रखने के लिए बंधपत्र निष्पादित करने का आदेश दे सकता है।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपराध ये हैं—
(i) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 8 के अधीन दंडनीय कोई अपराध, धारा 153क या धारा 153ख या धारा 154 के अधीन दंडनीय अपराध के सिवाय;
(ii) कोई अपराध जिसमें हमला या आपराधिक बल का प्रयोग या रिष्टि करना अंतर्विष्ट है या आता है;
(iii) आपराधिक अभित्रास का कोई अपराध;
(iv) कोई अन्य अपराध, जिससे परिशांति भंग हुई है, या जिससे परिशांति भंग होने का आशय था या जिसके कारण परिशांति भंग होने की संभावना ज्ञात थी।
(3) यदि अपील में या अन्यथा सिद्धदोष किया जाना अपास्त कर दिया जाता है, तो इस प्रकार निष्पादित बंधपत्र शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अधीन आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या ऐसे न्यायालय द्वारा भी दिया जा सकता है जब वह अपनी पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो।

Important Sub-Sections Explained

धारा 106(1)

यह उपधारा सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के न्यायालय को कुछ अपराधों के लिए किसी व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराने पर, यदि न्यायालय इसे आवश्यक समझे, तो उसे तीन वर्ष तक की अवधि के लिए परिशांति बनाए रखने हेतु बंधपत्र निष्पादित करने का आदेश देने का अधिकार देती है। यह आदेश दंडादेश देते समय दिया जाता है।

धारा 106(2)

यह उपधारा उन अपराधों के प्रकारों को विनिर्दिष्ट करती है जिनके लिए धारा 106(1) के तहत प्रतिभूति का आदेश दिया जा सकता है। इनमें भारतीय दंड संहिता के अध्याय VIII के तहत अपराध (धारा 153क, 153ख, 154 को छोड़कर), हमला, आपराधिक बल, रिष्टि, आपराधिक अभित्रास से जुड़े अपराध, या परिशांति भंग करने की संभावना वाले किसी अन्य अपराध शामिल हैं।

Landmark Judgements

कमला प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 1982 क्रि.ल.ज. 1776 (इलाहाबाद):

इस मामले ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 106 के तहत कार्य करते समय, न्यायालय को यह निश्चित राय बनानी चाहिए कि सिद्धदोष व्यक्ति से परिशांति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति लेना आवश्यक है। बंधपत्र लगाना दोषसिद्धि का स्वतः परिणाम नहीं है बल्कि इसके लिए आवश्यकता का न्यायिक मूल्यांकन आवश्यक है।

के.वी.आर. अय्यर बनाम राज्य, ए.आई.आर. 1964 केर 104:

इस निर्णय में प्रतिभूति कार्यवाहियों के संदर्भ में ‘परिशांति भंग’ की व्याख्या पर चर्चा की गई थी। इसमें यह अभिनिर्धारित किया गया कि न्यायालय को यह संतुष्टि करनी चाहिए कि जिस अपराध के लिए अभियुक्त को सिद्धदोष ठहराया गया है, उसमें परिशांति भंग शामिल है, या इसका इरादा था या इसके होने की संभावना थी, तभी इस धारा के तहत प्रतिभूति का आदेश दिया जा सकता है।

Draft Format / Application

Leave a Reply

Scroll to Top