अध्याय 8
CrPC Section 117 in Hindi: प्रतिभूति देने का आदेश
New Law Update (2024)
धारा 130 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
मजिस्ट्रेट (कार्यपालक/न्यायिक)
Punishment
प्रक्रियात्मक – अन्वेषण / जांच
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) किसी भी व्यक्ति को धारा 111 के अधीन किए गए आदेश में विनिर्दिष्ट प्रकृति से भिन्न या उससे अधिक रकम की या उससे अधिक अवधि की प्रतिभूति देने का आदेश नहीं दिया जाएगा;
(2) प्रत्येक बंधपत्र की रकम मामले की परिस्थितियों का सम्यक् ध्यान रखकर नियत की जाएगी और वह अत्यधिक नहीं होगी;
(3) जब वह व्यक्ति जिसके संबंध में जांच की जाती है, अवयस्क है, तब बंधपत्र केवल उसके प्रतिभूओं द्वारा निष्पादित किया जाएगा।
Important Sub-Sections Explained
धारा 117(1)
यह उपधारा सुनिश्चित करती है कि आदेशित प्रतिभूति की प्रकृति, रकम और अवधि धारा 111 के तहत प्रारंभिक आदेश में मूल रूप से प्रस्तावित से अधिक नहीं हो सकती, जिससे प्रतिभूति आवश्यकताओं में मनमानी वृद्धि को रोका जा सके।
धारा 117(2)
यह महत्वपूर्ण प्रावधान अनिवार्य करता है कि किसी भी बंधपत्र की रकम मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित की जानी चाहिए और कभी भी अत्यधिक नहीं होनी चाहिए, जिससे व्यक्तियों को असंगत मांगों के माध्यम से वित्तीय कठिनाई या उत्पीड़न से बचाया जा सके।
Landmark Judgements
किशन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1970 क्रि.लॉ.ज. 1061):
उच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 117 के तहत निर्धारित बंधपत्र की राशि अत्यधिक नहीं होनी चाहिए और मामले की परिस्थितियों और निवारक न्याय के उद्देश्य के अनुपात में होनी चाहिए, जो दंडात्मक नहीं है। मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह सुनिश्चित करे कि बंधपत्र उचित और दमनकारी न हो।
बंसीधर बनाम राजस्थान राज्य (1970 क्रि. लॉ. ज. 1061):
इस निर्णय ने इस सिद्धांत को दोहराया कि मांगी जाने वाली प्रतिभूति की राशि संबंधित व्यक्ति की परिस्थितियों और वित्तीय क्षमता का विधिवत ध्यान रखते हुए तय की जानी चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह दमनकारी या व्यक्ति के साधनों से परे न हो, जिससे धारा 117(2) दंड प्रक्रिया संहिता की भावना को बनाए रखा जा सके।