अध्याय चौदह
CrPC Section 199 in Hindi: मानहानि के लिए अभियोजन
New Law Update (2024)
धारा 220 बी.एन.एस.एस.
TRIAL COURT
सेशन न्यायालय, मजिस्ट्रेट
Punishment
प्रक्रियात्मक – संज्ञान
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) कोई भी न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय इक्कीस के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद के सिवाय नहीं करेगा जो उस अपराध से व्यथित है:
परंतु जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या कोई जड़मति या पागल है, या बीमारी या दुर्बलता के कारण परिवाद करने में असमर्थ है, या ऐसी स्त्री है जिसे स्थानीय रूढ़ियों और शिष्टाचारों के अनुसार सार्वजनिक रूप से उपस्थित होने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए, वहां कोई अन्य व्यक्ति न्यायालय की अनुज्ञा से उसकी ओर से परिवाद कर सकेगा।
(2) इस संहिता में किसी बात के होते हुए भी, जब भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय इक्कीस के अधीन आने वाला कोई अपराध ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध किया जाना अभिकथित है जो ऐसे किए जाने के समय भारत का राष्ट्रपति, भारत का उपराष्ट्रपति, किसी राज्य का राज्यपाल, किसी संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक या संघ का या किसी राज्य का या किसी संघ राज्यक्षेत्र का मंत्री है, या संघ के या किसी राज्य के कार्यकलापों के संबंध में नियोजित कोई अन्य लोक सेवक अपने लोक कृत्यों के निर्वहन में अपने आचरण के संबंध में है, तब सेशन न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान, मामले के उसे सुपुर्द किए बिना, लोक अभियोजक द्वारा किए गए लिखित परिवाद पर कर सकेगा।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक परिवाद में वे तथ्य कथित होंगे जो अभिकथित अपराध, ऐसे अपराध की प्रकृति और ऐसी अन्य विशिष्टियां गठित करते हैं जो अभियुक्त को उस अपराध की सूचना देने के लिए पर्याप्त रूप से युक्तियुक्त हैं जो उसके द्वारा किया जाना अभिकथित है।
(4) लोक अभियोजक द्वारा उपधारा (2) के अधीन कोई परिवाद पूर्व मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा—
(क) राज्य सरकार की, ऐसे व्यक्ति के मामले में जो उस राज्य का राज्यपाल रहा है या मंत्री रहा है;
(ख) राज्य सरकार की, राज्य के कार्यकलापों के संबंध में नियोजित किसी अन्य लोक सेवक के मामले में;
(ग) केंद्रीय सरकार की, किसी अन्य मामले में।
(5) सेशन न्यायालय उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं करेगा जब तक कि अपराध के किए जाने के अभिकथित तारीख से छह मास के भीतर परिवाद नहीं किया जाता है।
(6) इस धारा की कोई बात उस व्यक्ति के अधिकार पर प्रभाव नहीं डालेगी जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना अभिकथित है, कि वह उस अपराध के संबंध में अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद करे या ऐसे मजिस्ट्रेट की उस परिवाद पर अपराध का संज्ञान करने की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी।
Important Sub-Sections Explained
धारा 199(1)
यह उपधारा सामान्य नियम निर्धारित करती है कि केवल ‘व्यथित व्यक्ति’ ही मानहानि के लिए परिवाद दायर कर सकता है, जिसमें अवयस्कों, मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों या सार्वजनिक रूप से उपस्थित होने में असमर्थ महिलाओं की ओर से दूसरों को दायर करने की अनुमति देने वाले विशेष प्रावधान हैं।
धारा 199(2)
यह प्रावधान राष्ट्रपति या मंत्रियों जैसे उच्च लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध मानहानि के लिए एक विशेष प्रक्रिया का उल्लेख करता है, जिसमें लोक अभियोजक को पूर्व सुपुर्दगी कार्यवाही के बिना सीधे सेशन न्यायालय के समक्ष लिखित परिवाद दायर करने में सक्षम बनाता है।
Landmark Judgements
सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016):
उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता (मानहानि) की धारा 499 और 500 और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 199 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, यह पुष्टि करते हुए कि मानहानि एक सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति करती है और व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा करती है। इसने धारा 199(2) के तहत प्रक्रिया और लोक अभियोजक की भूमिका को स्पष्ट किया।
श्रीमती किरण बेदी बनाम जांच समिति (1989):
इस मामले में धारा 199(2) के तहत ‘लोक सेवक’ और ‘अपने लोक कृत्यों के निर्वहन में अपने आचरण के संबंध में’ की व्याख्या की गई, जिसमें लोक पदाधिकारियों के विरुद्ध मानहानि के अभियोजन के दायरे को स्पष्ट किया गया।