अध्याय XX

CrPC Section 259 in Hindi: समंस-मामलों को वारंट-मामलों में परिवर्तित करने की न्यायालय की शक्ति

New Law Update (2024)

धारा 297 BNSS

TRIAL COURT

मजिस्ट्रेट न्यायालय

Punishment​

छह मास तक का साधारण कारावास

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

जब, छह मास से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध से संबंधित किसी समंस-मामले के विचारण के अनुक्रम में, मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि न्याय के हित में उस अपराध का विचारण वारंट-मामलों के विचारण के लिए उपबंधित प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए, तब वह मजिस्ट्रेट इस संहिता द्वारा वारंट-मामलों के विचारण के लिए उपबंधित रीति से मामले की पुनः सुनवाई करने के लिए अग्रसर हो सकेगा और किसी ऐसे साक्षी को वापस बुला सकेगा जिसकी परीक्षा की गई हो।

Important Sub-Sections Explained

Landmark Judgements

Kewal Krishan v. Suraj Bhan (1980):

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 259 के तहत शक्ति विवेकाधीन है और मजिस्ट्रेट द्वारा प्रयोग की जा सकती है जब कोई समंस-मामला छह मास से अधिक कारावास से दंडनीय अपराध से संबंधित हो, और न्याय के हित में इसे वारंट-मामले के रूप में विचारित करना प्रतीत होता हो। परिवर्तन का निर्णय मजिस्ट्रेट की सूचित राय पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल सुविधा के लिए।

T.A. Hariharan v. S.N. Subramaniam (2009):

इस निर्णय ने दोहराया कि धारा 259 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत एक समंस-मामले को वारंट-मामले में परिवर्तित करने का मजिस्ट्रेट का विवेक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर समुचित विचार करने के बाद, और दर्ज कारणों के साथ, न्यायिक रूप से प्रयोग किया जाना चाहिए। ऐसा परिवर्तन न्याय के व्यापक हितों को पूरा करता है और निष्पक्ष विचारण सुनिश्चित करता है, विशेष रूप से जब अपराध की गंभीरता अधिक विस्तृत प्रक्रिया को आवश्यक बनाती है।

Draft Format / Application

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