अध्याय XXIII
CrPC Section 275 in Hindi: वारंट-मामलों में अभिलेख
New Law Update (2024)
धारा 297 बी.एन.एस.एस.
TRIAL COURT
मजिस्ट्रेट का न्यायालय
Punishment
प्रक्रियात्मक – वारंट / समन प्रक्रिया
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय सब वारंट-मामलों में, प्रत्येक साक्षी की साक्ष्य, उसकी परीक्षा के दौरान, या तो मजिस्ट्रेट द्वारा स्वयं या उसके खुले न्यायालय में श्रुतलेखन द्वारा या जहां वह शारीरिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण ऐसा करने में असमर्थ है, उसके निदेश और अधीक्षण के अधीन, उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त न्यायालय के किसी अधिकारी द्वारा लिखित रूप में अभिलिखित की जाएगी।
(2) जहां मजिस्ट्रेट साक्ष्य को अभिलिखित कराता है, वहां वह एक प्रमाणपत्र अभिलिखित करेगा कि साक्ष्य उपधारा (1) में निर्दिष्ट कारणों से उसके द्वारा स्वयं अभिलिखित नहीं की जा सकी।
(3) ऐसी साक्ष्य मामूली तौर पर वर्णनात्मक रूप में अभिलिखित की जाएगी, किंतु मजिस्ट्रेट स्वविवेक से ऐसी साक्ष्य के किसी भाग को प्रश्नोत्तर के रूप में अभिलिखित कर सकेगा या अभिलिखित करा सकेगा।
(4) इस प्रकार अभिलिखित साक्ष्य पर मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर होंगे और वह अभिलेख का भाग होगी।
Important Sub-Sections Explained
धारा 275(1)
यह उपधारा वारंट-मामलों में साक्षी की गवाही दर्ज करने के लिए मौलिक नियम निर्धारित करती है, जिसमें यह प्रावधान है कि मजिस्ट्रेट या उनके प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण के तहत एक नामित अधिकारी को परीक्षा आगे बढ़ने के साथ ही साक्ष्य दर्ज करना चाहिए, जिससे एक उचित कानूनी अभिलेख सुनिश्चित हो सके।
धारा 275(2)
यह अनिवार्य करता है कि यदि मजिस्ट्रेट अक्षमता के कारण व्यक्तिगत रूप से साक्ष्य दर्ज नहीं करता है, तो इस प्रत्यायोजन के विशिष्ट कारणों को स्पष्ट करते हुए एक औपचारिक प्रमाणपत्र अभिलेख पर रखा जाना चाहिए, जिससे विचारण प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
Landmark Judgements
मोहम्मद नईमुद्दीन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2011):
यह निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 275(2) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र की अनिवार्य प्रकृति पर जोर देता है, जब मजिस्ट्रेट साक्ष्य की रिकॉर्डिंग का प्रत्यायोजन करता है। यह उजागर करता है कि इस प्रमाणपत्र को प्रस्तुत करने में विफलता, जिसमें प्रत्यायोजन के कारणों का उल्लेख नहीं है, एक प्रक्रियात्मक अनियमितता है जो कार्यवाही को दूषित कर सकती है।
महाराष्ट्र राज्य बनाम रामदास धुले (1999):
बंबई उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 275(1) के तहत “शारीरिक या अन्य अक्षमता” की व्याख्या पर चर्चा की, इस बात पर जोर दिया कि मजिस्ट्रेट समग्र निर्देशन और अधीक्षण बनाए रखता है, भले ही एक अधिकारी साक्ष्य रिकॉर्ड करता हो। यह निर्णय गवाही की सटीक और वैध रिकॉर्डिंग सुनिश्चित करने के लिए मजिस्ट्रेट की अंतिम जिम्मेदारी को रेखांकित करता है।