अध्याय XXIV

CrPC Section 306 in Hindi: सह-अपराधी को क्षमादान की प्रस्थापना

New Law Update (2024)

धारा 344 बीएनएसएस

TRIAL COURT

सेशन न्यायालय, विशेष न्यायाधीश का न्यायालय, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट

Punishment​

कारावास जिसकी अवधि 7 वर्ष तक की हो सकेगी

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

धारा 306: सह-अपराधी को क्षमादान की प्रस्थापना

(1) किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य अभिप्राप्त करने की दृष्टि से जिसके बारे में यह अनुमान है कि वह किसी ऐसे अपराध से जिसका इस धारा में उल्लेख है प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संबंधित रहा है या उसे जानता है, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट अपराध के अन्वेषण या जांच या विचारण के किसी भी प्रक्रम में, और प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, अपराध की जांच या विचारण के किसी भी प्रक्रम में, ऐसे व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमादान दे सकता है कि वह अपराध से और हर ऐसे अन्य व्यक्ति से, जो उसमें चाहे मूल अपराधी के रूप में या दुष्प्रेरक के रूप में संपृक्त हो, संबंधित उन सब परिस्थितियों का, जिनकी उसे जानकारी है, पूर्ण और सही प्रकटीकरण करेगा।

(2) यह धारा निम्नलिखित को लागू होती है—

(क) कोई ऐसा अपराध जो विशेष रूप से सेशन न्यायालय द्वारा या आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 46) के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा विचारणीय है;

(ख) कोई ऐसा अपराध जो कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या अधिक कठोर दंडादेश से दंडनीय है।

(3) हर ऐसा मजिस्ट्रेट जो उपधारा (1) के अधीन क्षमादान देता है, —

(क) ऐसा करने के अपने कारण;

(ख) क्या उस व्यक्ति ने जिसे क्षमादान दिया गया था, उसे स्वीकार किया था या नहीं,

निम्नलिखित अभिलिखित करेगा और अभियुक्त द्वारा आवेदन किए जाने पर, उसे ऐसे अभिलेख की एक प्रतिलिपि निःशुल्क देगा।

(4) हर व्यक्ति जो उपधारा (1) के अधीन दिए गए क्षमादान को स्वीकार करता है,—

(क) अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में और यदि कोई पश्चातवर्ती विचारण हो तो उसमें साक्षी के रूप में परीक्षित किया जाएगा;

(ख) जब तक कि वह पहले से जमानत पर न हो, विचारण के समाप्त होने तक अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाएगा।

(5) जहां किसी व्यक्ति ने उपधारा (1) के अधीन दिए गए क्षमादान को स्वीकार कर लिया है और उपधारा (4) के अधीन परीक्षित किया जा चुका है, वहां अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट मामले में कोई और जांच किए बिना,—

(क) उसे विचारण के लिए सुपुर्द करेगा—

(i) सेशन न्यायालय को यदि अपराध अनन्यतः उस न्यायालय द्वारा विचारणीय है या यदि संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है;

(ii) आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम, 1952 (1952 का 46) के अधीन नियुक्त विशेष न्यायाधीश के न्यायालय को, यदि अपराध अनन्यतः उस न्यायालय द्वारा विचारणीय है;

(ख) किसी अन्य मामले में, मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सौंप देगा जो मामले का विचारण स्वयं करेगा।

Important Sub-Sections Explained

धारा 306(1)

यह उपधारा विशिष्ट मजिस्ट्रेटों (मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, महानगर मजिस्ट्रेट, या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट) को अन्वेषण, जांच या विचारण के विभिन्न चरणों में एक सह-अपराधी को क्षमादान देने का अधिकार देती है। ऐसे क्षमादान की मुख्य शर्त यह है कि सह-अपराधी अपराध और अन्य संबंधित व्यक्तियों से संबंधित सभी प्रासंगिक परिस्थितियों का पूर्ण और सही प्रकटीकरण करे।

धारा 306(4)

यह उपधारा उस सह-अपराधी के दायित्वों को रेखांकित करती है जो क्षमादान की प्रस्थापना स्वीकार करता है। उसे मजिस्ट्रेट के न्यायालय और बाद के विचारण में एक साक्षी के रूप में परीक्षित किया जाना चाहिए, और जब तक वह पहले से जमानत पर न हो, उसे विचारण समाप्त होने तक अभिरक्षा में रखा जाना चाहिए, ताकि उसकी उपलब्धता सुनिश्चित हो सके और छेड़छाड़ को रोका जा सके।

Landmark Judgements

लेफ्टिनेंट कमांडर पास्कल फर्नांडीज बनाम महाराष्ट्र राज्य (1968):

उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि क्षमादान देने की शक्ति विवेकाधीन है और इसका प्रयोग मजिस्ट्रेट के इस समाधान पर निर्भर करता है कि ऐसा क्षमादान सत्य साक्ष्य प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। क्षमादान की शर्तें, विशेषकर ‘पूर्ण और सही प्रकटीकरण’, सर्वोपरि हैं।

सरवन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1957):

इस ऐतिहासिक मामले ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि क्षमादान स्वीकार करने वाले सह-अपराधी (राजसाक्षी) का साक्ष्य न केवल अपराध के संबंध में बल्कि उस अभियुक्त के संबंध में भी, जिससे वह संबंधित है, तात्त्विक विशिष्टियों में संपोषित होना चाहिए, क्योंकि राजसाक्षी का साक्ष्य स्वाभाविक रूप से कमजोर होता है और उसमें हेरफेर की संभावना होती है।

बालकृष्ण सवलराम पुजारी बनाम मैसूर राज्य (1958):

उच्चतम न्यायालय ने राजसाक्षी के बयान के स्वतंत्र संपोषण की आवश्यकता को दोहराया और सत्य गवाही प्राप्त करने के लिए मजिस्ट्रेट की भूमिका को स्पष्ट किया कि क्षमादान निर्दिष्ट शर्तों के अधीन दिया गया है।

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