अध्याय 24

CrPC Section 326 in Hindi: एक मजिस्ट्रेट द्वारा भागतः और दूसरे द्वारा भागतः अभिलिखित साक्ष्य पर दोषसिद्धि या सुपुर्दगी

New Law Update (2024)

बीएनएसएस की धारा 367

TRIAL COURT

मजिस्ट्रेट और सेशन न्यायाधीश के न्यायालय

Punishment​

प्रक्रियात्मक – अन्वेषण/जांच

Cognizable?

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

(1) जब कभी कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, किसी जांच या विचारण में समस्त साक्ष्य या उसके किसी भाग को सुनने और अभिलिखित करने के पश्चात् उसमें अपनी अधिकारिता का प्रयोग करना बंद कर देता है और उसके स्थान पर कोई दूसरा न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट आता है जिसे ऐसी अधिकारिता प्राप्त है और जो उसका प्रयोग करता है, तब इस प्रकार पद पर आने वाला न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट अपने पूर्ववर्ती द्वारा अभिलिखित साक्ष्य पर या भागतः अपने पूर्ववर्ती द्वारा अभिलिखित और भागतः स्वयं अपने द्वारा अभिलिखित साक्ष्य पर कार्रवाई कर सकता है: परंतु यह तब जब कि यदि पद पर आने वाले न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की राय है कि उन साक्षियों में से किसी की अतिरिक्त परीक्षा, जिनके साक्ष्य पहले ही अभिलिखित किए जा चुके हैं, न्याय के हित में आवश्यक है, तो वह ऐसे किसी साक्षी को पुनः समन कर सकता है, और ऐसी अतिरिक्त परीक्षा, प्रतिपरीक्षा और पुनःपरीक्षा, यदि कोई हो, के पश्चात्, जिसकी वह अनुज्ञा दे, साक्षी को उन्मोचित कर दिया जाएगा।
(2) जब कोई मामला इस संहिता के उपबंधों के अधीन एक न्यायाधीश से दूसरे न्यायाधीश को या एक मजिस्ट्रेट से दूसरे मजिस्ट्रेट को अंतरित किया जाता है, तब पूर्ववर्ती का उसमें अपनी अधिकारिता का प्रयोग करना बंद कर देना समझा जाएगा और उत्तरवर्ती का उसके स्थान पर आना समझा जाएगा, उपधारा (1) के अर्थ में।
(3) इस धारा की कोई बात संक्षिप्त विचारणों को या ऐसे मामलों को जिनमें धारा 322 के अधीन कार्यवाहियां रोक दी गई हैं या जिनमें धारा 325 के अधीन कार्यवाहियां किसी वरिष्ठ मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत की गई हैं, लागू नहीं होती है।

Important Sub-Sections Explained

उपधारा (1) और परंतुक

यह महत्वपूर्ण भाग एक नए न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को, जो एक चल रहे मामले को संभाल रहा है, अपने पूर्ववर्ती द्वारा पहले से अभिलिखित साक्ष्य पर निर्भर रहने की अनुमति देता है। हालांकि, यह एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय भी प्रदान करता है: नया न्यायिक अधिकारी किसी भी साक्षी को पुनः बुला सकता है और उसकी पुनः परीक्षा कर सकता है यदि उसे न्याय के लिए आवश्यक लगता है।

उपधारा (3)

यह उपधारा धारा 326 की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करती है, यह बताते हुए कि इसके प्रावधान संक्षिप्त विचारणों या ऐसे मामलों पर लागू नहीं होते हैं जिन्हें दंड प्रक्रिया संहिता की अन्य विशिष्ट धाराओं के तहत रोक दिया गया है या किसी वरिष्ठ मजिस्ट्रेट को संदर्भित किया गया है, जिससे इसके दायरे पर स्पष्टता सुनिश्चित होती है।

Landmark Judgements

निर्मल सिंह बनाम पंजाब राज्य, (1984) 4 SCC 517:

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 326 एक सक्षमीकारी प्रावधान है, जो पद पर आने वाले न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को अपने पूर्ववर्ती द्वारा भागतः अभिलिखित साक्ष्य पर कार्रवाई करने की अनुमति देता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य नए सिरे से विचारणों से बचना और न्याय को शीघ्र करना है, जबकि परंतुक न्याय के हित की रक्षा करता है, यदि आवश्यक समझा जाए तो साक्षियों को पुनः समन करने की अनुमति देकर।

बाबूराव बनाम महाराष्ट्र राज्य, (1989) Supp. 2 SCC 404:

उच्चतम न्यायालय ने उपधारा (1) के परंतुक के तहत पद पर आने वाले न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट में निहित विवेकाधीन शक्ति को दोहराया। इसने इस बात पर बल दिया कि इस विवेक का प्रयोग न्यायिक रूप से किया जाना चाहिए, और साक्षियों को पुनः समन करना प्रत्येक मामले में अनिवार्य नहीं है, बल्कि केवल तभी जब न्याय के हित वास्तव में इसकी आवश्यकता महसूस करें, जैसे जब पिछली रिकॉर्डिंग के बारे में कोई संदेह हो या स्पष्टीकरण की आवश्यकता हो।

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