
संविधान (Constitution) का अर्थ
“संविधान” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के “कॉन्स्टीट्यूट” (Constitute) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है शासन की व्यवस्था या सिद्धांत। यह किसी राष्ट्र के प्रशासन को संचालित करने वाले नियमों, विधियों और सिद्धांतों का एक संकलन होता है।
संविधान को किसी भी संस्था या संगठन के लिए बनाया जा सकता है, लेकिन किसी राष्ट्र के संविधान का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह उसकी सर्वोच्च विधि होती है। यह एक लिखित दस्तावेज़ या नियमों का संकलन होता है, जिसमें देश की प्रशासनिक प्रणाली से संबंधित विधियाँ और नीतियाँ शामिल होती हैं। यह दस्तावेज़ राज्य के प्रमुख संस्थानों, उनके कार्यों और अधिकारों को निर्धारित करता है।
संविधान किसी भी देश की राजनीतिक संरचना को परिभाषित करता है और शासन के लिए आवश्यक मार्गदर्शक सिद्धांतों को निर्दिष्ट करता है। इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, अधिकार, कर्तव्य एवं आपसी संबंधों का उल्लेख किया जाता है। इसके अतिरिक्त, संविधान किसी देश के संस्थापकों के उद्देश्यों, मूल्यों और आदर्शों को भी प्रतिबिंबित करता है तथा नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाओं को व्यक्त करता है।
संविधान की आवश्यकता (Necessity of Constitution)
किसी भी राष्ट्र के लिए संविधान निम्नलिखित कारणों से आवश्यक होता है—
- शासन की शक्तियों को सीमित और नियंत्रित करने हेतु।
- निरंकुश राजतंत्र एवं कुलीन तंत्र के अनुभवों से मिले सबक के कारण।
- नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए।
- वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए।
संविधान का विकास (Development of Constitution)
संविधान के विकास में निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं—
- परंपराएँ एवं प्रथाएँ: किसी भी देश का संविधान ऐतिहासिक परंपराओं एवं स्थापित प्रथाओं से प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन का संविधान मुख्यतः परंपराओं पर आधारित है, जिसका प्रभाव भारत और अमेरिका जैसे देशों पर भी पड़ा है।
- न्यायिक निर्णय एवं विधियों की व्याख्या: न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णय एवं विधियों की व्याख्या संविधान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरणस्वरूप, अमेरिका और भारत के संविधानों में यह प्रभाव देखा जा सकता है। अमेरिका में यह कहा जाता है कि “संविधान वही है, जो न्यायाधीश उसे मानते हैं।”
- संविधान संशोधन प्रक्रिया: समय के साथ संविधान में संशोधन आवश्यक होता है, ताकि इसे प्रासंगिक बनाए रखा जा सके। विभिन्न देशों में संवैधानिक संशोधन के माध्यम से मौलिक अधिकारों का विस्तार किया जाता है।
संविधान का वर्गीकरण (Classification of Constitution)
संविधान को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है—
- उत्पत्ति के आधार पर: विकसित संविधान एवं निर्मित संविधान।
- प्रथाओं और विधियों के आधार पर: लिखित संविधान एवं अलिखित संविधान।
- संविधान संशोधन के आधार पर: कठोर संविधान एवं लचीला संविधान।
संविधान का वर्गीकरण उत्पत्ति के आधार पर (Based on Origin)
विकसित संविधान (Evolved Constitution)
विकसित संविधान किसी निश्चित समय पर संविधान सभा द्वारा निर्मित नहीं होता है, बल्कि यह प्रथाओं, परंपराओं एवं न्यायालयों के निर्णयों पर आधारित होता है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण ब्रिटेन का संविधान है, जहाँ शासन से संबंधित कोई नियम स्पष्ट रूप से लिखित रूप में उपलब्ध नहीं हैं।
निर्मित संविधान (Enacted Constitution)
निर्मित संविधान एक निश्चित समय पर संविधान सभा के माध्यम से तैयार किया जाता है। यह आमतौर पर लिखित और कठोर प्रकृति का होता है। अमेरिका का संविधान, जिसे 1787 में फिलाडेल्फिया सम्मेलन में निर्मित किया गया था, विश्व का पहला लिखित संविधान है। भारत और स्विट्ज़रलैंड का संविधान भी इसी श्रेणी में आते हैं।
संविधान का वर्गीकरण प्रथाओं और विधियों के आधार पर (Based on Usages and Laws)
लिखित संविधान (Written Constitution)
लिखित संविधान में शासन से संबंधित सभी प्रावधानों को विधिवत रूप से संकलित किया जाता है। उदाहरणस्वरूप, भारत, अमेरिका, फ्रांस और जापान के संविधान लिखित हैं।
अलिखित संविधान (Unwritten Constitution)
अलिखित संविधान में शासन संचालन हेतु कोई औपचारिक दस्तावेज़ नहीं होता है, बल्कि यह समय-समय पर विकसित हुई परंपराओं एवं न्यायिक व्याख्याओं पर आधारित होता है। ब्रिटेन का संविधान इसका प्रमुख उदाहरण है।
लिखित संविधान को व्यवस्थित और योजनाबद्ध रूप में तैयार किया जाता है, जबकि अलिखित संविधान अपेक्षाकृत अव्यवस्थित एवं लचीला होता है।
संविधान का वर्गीकरण संविधान संशोधन के आधार पर (Based on Constitutional Amendment)
कठोर संविधान (Rigid Constitution)
कठोर संविधान में संशोधन प्रक्रिया अत्यंत कठिन होती है। इसमें संवैधानिक विधि और सामान्य विधि के बीच स्पष्ट अंतर होता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका का संविधान कठोर प्रकृति का है, क्योंकि इसमें संशोधन करने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है।
लचीला संविधान (Flexible Constitution)
लचीला संविधान वह होता है, जिसमें संवैधानिक विधियों को सामान्य विधियों के समान ही संशोधित किया जा सकता है। गार्नर के अनुसार, “नम्य संविधान वह होता है, जिसे साधारण विधि की भाँति बदला जा सकता है।” ब्रिटेन का संविधान इस श्रेणी में आता है।
अमेरिका का संविधान कठोर होने के कारण उसमें बहुत कम संशोधन हुए हैं, जबकि भारत का संविधान न तो अत्यधिक कठोर है और न ही अत्यधिक लचीला। इसे संतुलित संविधान कहा जा सकता है।
भारत के संविधान का क्या महत्व है?
- संविधान यह सुनिश्चित करता है कि शासन का अधिकार किसके पास होगा और सरकार की संरचना कैसी होगी।
- यह कुछ मूलभूत सिद्धांत प्रदान करता है, जिससे समाज में समन्वय और आपसी विश्वास स्थापित होता है।
- संविधान नागरिकों पर लागू होने वाले कानूनों की सीमाएँ निर्धारित करता है।
- यह सरकार को ऐसी शक्तियाँ प्रदान करता है, जिससे नागरिकों की आकांक्षाओं की पूर्ति संभव हो सके।
संविधानवाद (Constitutionalism)
- सामान्यतः संविधान पर आधारित विचारधारा को संविधानवाद कहा जाता है। सामान्य रूप से यह धारणा व्यक्त की जाती है कि सरकार को संविधान की भावना के अनुरूप कार्य करना चाहिए। विस्तृत रूप में, यह आवश्यक है कि सरकार संविधान के अधीन हो, उसकी शक्तियाँ सीमित हों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप विधि और जनकल्याण आधारित हों।
- संविधानवाद उन आदर्शों, विश्वासों और नैतिक मूल्यों को अभिव्यक्त करता है, जिन्हें संविधान में सम्मिलित किया गया है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इन मूल्यों की रक्षा हो, राजनीतिक शक्ति पर प्रभावी नियंत्रण एवं प्रतिबंध लागू किए जाते हैं।
- यह एक आधुनिक राजनीतिक अवधारणा है, जो विधि द्वारा नियंत्रित शासन व्यवस्था की स्थापना को बल प्रदान करता है। संविधानवाद का शाब्दिक अर्थ है – किसी निकाय का गठन और उसकी संरचना। इसे एक राज्य एवं उसकी संस्थाओं के संगठन की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है।
- संविधान एक स्थिर और सम्माननीय दस्तावेज़ होता है, जिससे नागरिकों को यह अपेक्षा होती है कि सरकार व उसके अंग संविधान के अनुरूप कार्य करेंगे।
- जब सरकार संविधान के अनुरूप कार्य करती है, तो यही संविधानवाद कहलाता है। सामान्य शब्दों में, सरकार किसी एक व्यक्ति की इच्छा के अनुसार संचालित नहीं हो सकती।
संविधानवाद की अवधारणा (Concept of Constitutionalism)
वर्तमान में संविधानवाद की तीन प्रमुख अवधारणाएँ प्रचलित हैं:
- उदारवादी अवधारणा (Liberal Concept of Constitutionalism)
- यह अवधारणा लोकतांत्रिक पूँजीवादी देशों में प्रचलित है। इन देशों में संविधान का मूल उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना तथा सरकार की शक्तियों को सीमित करना है।
- इस विचारधारा में न तो व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता को मान्यता दी जाती है और न ही राज्य की निरंकुशता को स्वीकार किया जाता है।
- उदारवादी लोकतंत्र में व्यक्ति को साध्य और राज्य शक्ति को साधन माना जाता है, किंतु इस बात का ध्यान रखा जाता है कि साध्य पर साधन हावी न हो।
- इस विचारधारा के प्रमुख घटक हैं:
- सीमित व उत्तरदायी सरकार
- विधि का शासन
- मौलिक अधिकारों की सुरक्षा
- स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका
- शक्ति पृथक्करण और विभाजन
- नियमित निर्वाचन प्रणाली
- राजनीतिक दलों की उपस्थिति
- प्रेस की स्वतंत्रता
- सत्ता परिवर्तन के संवैधानिक उपाय
- आर्थिक समानता एवं सामाजिक न्याय
- साम्यवादी अवधारणा (Communist Concept of Constitutionalism)
- इसे मार्क्सवादी अवधारणा भी कहा जाता है। साम्यवादी संविधानवाद आर्थिक गतिविधियों पर केंद्रित होता है।
- इसके अनुसार उत्पादन प्रणाली दो पहलुओं पर आधारित होती है: उत्पादन के साधन और उत्पादन संबंध।
- राज्य की उत्पत्ति को शासक वर्ग द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए निर्मित माना जाता है।
- साम्यवादी संविधानवाद निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित होता है:
- वर्गविहीन एवं राज्यविहीन समाज की स्थापना
- उत्पादन के साधनों पर समाज का नियंत्रण
- संपत्ति के समान वितरण की व्यवस्था
- व्यक्ति को सामाजिक अलगाव से बचाने की नीति
- विकासशील लोकतांत्रिक अवधारणा (Evolutionary Democratic Concept of Constitutionalism)
- यह अवधारणा विकासशील देशों में पाई जाती है, जिसमें उपर्युक्त दोनों अवधारणाओं का मिश्रित रूप देखने को मिलता है।
- इन देशों में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याएँ होती हैं, जिनके समाधान के लिए कुछ देशों ने उदारवादी लोकतंत्र को अपनाया, कुछ ने साम्यवादी मॉडल को स्वीकार किया, जबकि कुछ देशों ने दोनों के मिश्रित स्वरूप को लागू किया।
संविधानवाद के मुख्य तत्त्व (Major Elements of Constitutionalism)
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Individual Freedom) – संविधान का प्रमुख उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। यह व्यक्ति को न केवल समाज व अन्य व्यक्तियों से होने वाले खतरे से बल्कि राज्य से उत्पन्न संभावित खतरों से भी सुरक्षा प्रदान करता है।
- सीमित सरकार (Limited Government) – संविधानवाद राजनीतिक शक्ति पर नियंत्रण रखता है। सरकार की शक्तियों की सीमाएँ निर्धारित की जाती हैं ताकि नागरिकों की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके। 1215 ई. का मेग्नाकार्टा और 1688 की गौरवमयी क्रांति इसी अवधारणा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
- शक्ति पृथक्करण और संतुलन (Separation of Powers & Checks and Balances) – मांटेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए शासन की तीनों शाखाओं (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) को पृथक रखा जाना चाहिए। शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए संतुलन व नियंत्रण के सिद्धांत को लागू किया गया।
- संवैधानिक साधनों द्वारा सत्ता परिवर्तन (Change through Constitutional Means) – संविधानवाद संवैधानिक विधियों द्वारा सत्ता परिवर्तन को प्राथमिकता देता है, जिसमें लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ एवं चुनाव शामिल होते हैं। यह सैनिक शासन और निरंकुश प्रवृत्तियों का विरोध करता है।
- संवैधानिक शासन (Constitutional Governance) – इसका अर्थ है कि शासन संविधान के प्रावधानों के अनुरूप संचालित हो। के.सी. व्हीयर के अनुसार संवैधानिक शासन का अर्थ किसी भी शासन प्रणाली के नियमों के अनुरूप कार्य करना है।
- उत्तरदायी सरकार (Responsible Government) – संविधानवाद उत्तरदायी सरकार में विश्वास करता है, क्योंकि यह नागरिकों को शोषण से मुक्त करता है एवं उनके अधिकारों की सुरक्षा करता है।
संविधान शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई?
“संविधान” शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के “कॉन्स्टीट्यूट” (Constitute) शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है शासन की व्यवस्था या सिद्धांत।
संविधान क्या होता है?
संविधान किसी राष्ट्र के प्रशासन को संचालित करने वाले नियमों, विधियों और सिद्धांतों का एक संकलन होता है। यह देश की प्रशासनिक प्रणाली से संबंधित विधियाँ और नीतियाँ निर्धारित करता है।
संविधान की आवश्यकता क्यों होती है?
संविधान की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से होती है:
शासन की शक्तियों को सीमित और नियंत्रित करने हेतु।
नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए।
निरंकुश राजतंत्र एवं कुलीन तंत्र के अनुभवों से मिले सबक के कारण।
वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए।
संविधान का वर्गीकरण कैसे किया जाता है?
संविधान को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है:
उत्पत्ति के आधार पर: विकसित संविधान एवं निर्मित संविधान।
प्रथाओं और विधियों के आधार पर: लिखित संविधान एवं अलिखित संविधान।
संविधान संशोधन के आधार पर: कठोर संविधान एवं लचीला संविधान।
संविधान संशोधन के आधार पर वर्गीकरण क्या है?
कठोर संविधान (Rigid Constitution): इसमें संशोधन प्रक्रिया अत्यंत कठिन होती है। उदाहरण: अमेरिका का संविधान।
लचीला संविधान (Flexible Constitution): इसमें संशोधन प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल होती है। उदाहरण: ब्रिटेन का संविधान।
संविधानवाद क्या होता है?
संविधानवाद एक विचारधारा है जो यह सुनिश्चित करती है कि सरकार संविधान के अनुसार चले, उसकी शक्तियाँ सीमित हों और वह लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन करे।
संविधान और संविधानवाद में क्या अंतर है?
संविधान: यह एक लिखित या अलिखित दस्तावेज़ होता है जो किसी राष्ट्र की शासन प्रणाली को निर्धारित करता है।
संविधानवाद: यह एक सिद्धांत है जो यह सुनिश्चित करता है कि सरकार संविधान के अनुसार कार्य करे और अधिनायकवाद की ओर न बढ़े।
संविधानवाद के मुख्य तत्व क्या हैं?
सरकार संविधान के अधीन होनी चाहिए।
नागरिकों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए।
सरकार की शक्तियों पर उचित नियंत्रण होना चाहिए।
लोकतांत्रिक मूल्यों और विधि शासन का पालन होना चाहिए।
संविधान की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
यह देश की राजनीतिक संरचना को परिभाषित करता है।
इसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका निर्धारित होती है।
नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख किया जाता है।
यह शासन की शक्तियों को सीमित और नियंत्रित करता है।
संविधानवाद का विरोध किससे होता है?
संविधानवाद निरंकुश शासन, निरंकुश राजतंत्र और अधिनायकवादी सरकारों का विरोध करता है।
भारत के संविधान का महत्व क्या है?
भारत का संविधान यह सुनिश्चित करता है कि शासन का अधिकार किसके पास होगा और सरकार की संरचना कैसी होगी। यह नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करता है और सरकार की शक्तियों को सीमित करता है।
संविधानवाद के जनक कौन थे?
संविधानवाद की अवधारणा का श्रेय ब्रिटिश विचारक जॉन लॉक (John Locke) को दिया जाता है।
संविधान की प्रस्तावना का क्या अर्थ है?
संविधान की प्रस्तावना उस राष्ट्र की शासन प्रणाली, उद्देश्यों और मूल्यों को स्पष्ट करती है, जिन पर संविधान आधारित होता है।