राजस्थान की जनजातियां

Table of Contents

प्रस्तावना

राजस्थान की सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत में यहाँ की जनजातियों (Tribes) का अतुलनीय योगदान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित ये समूह राज्य की जनसांख्यिकी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की कुल जनसंख्या राज्य की कुल आबादी का लगभग 13.48% है। ये समुदाय मुख्य रूप से अरावली पर्वतीय श्रृंखलाओं, दक्षिणी राजस्थान और हाड़ौती के पठारी क्षेत्रों में निवास करते हैं।

1. मीणा जनजाति (Meena Tribe)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं व्युत्पत्ति

‘मीणा’ जनजाति राजस्थान की सबसे प्राचीन और जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी जनजाति है।

  • शाब्दिक अर्थ: ‘मीणा’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘मीन’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ ‘मछली’ होता है। यह जनजाति स्वयं को भगवान विष्णु के ‘मत्स्य अवतार’ से संबंधित मानती है।
  • ऐतिहासिक महत्व: जयपुर (तत्कालीन आमेर) में कछवाहा राजवंश के शासन से पूर्व यहाँ मीणा शासकों का आधिपत्य था। आमेर के मीणा राजाओं का इतिहास में विशेष उल्लेख मिलता है।
  • प्रमुख ग्रंथ: जैन मुनि आचार्य मगन सागर द्वारा रचित ‘मीन पुराण’ (Meen Puran) इस जनजाति का सबसे प्रामाणिक और पवित्र ग्रंथ माना जाता है, जिसमें इनके इतिहास और गोत्रों का विस्तृत वर्णन है।

जनसांख्यिकीय वितरण

  • सर्वाधिक जनसंख्या: यह राजस्थान की सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है।
  • बाहुल्य क्षेत्र: मुख्य रूप से पूर्वी राजस्थान, विशेषकर जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली और अलवर जिलों में इनका संकेंद्रण है। उदयपुर और प्रतापगढ़ क्षेत्रों में भी इनकी उपस्थिति है।

सामाजिक स्तरीकरण (मीणा वर्ग)

मीणा समाज मुख्य रूप से दो और कुल मिलाकर कई उप-वर्गों में विभाजित है:

  1. चौकीदार मीणा: ऐतिहासिक रूप से इनका कार्य राजकोष और महलों की सुरक्षा करना था। यह वर्ग राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावशाली रहा है।
  2. जमींदार मीणा: यह वर्ग मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन के व्यवसाय में संलग्न है।
  3. चर्मकार मीणा: वे मीणा जो चमड़े से संबंधित व्यवसाय करते थे (वर्तमान में यह भेद कम हो गया है)।
  4. पड़िहार मीणा: यह वर्ग मुख्य रूप से टोंक, भीलवाड़ा और बूंदी क्षेत्र में निवास करता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार ये भैंसे के मांस का सेवन करते थे।
  5. रावत मीणा: इनका संबंध सवर्ण राजपूतों से माना जाता है और ये सामाजिक रूप से उच्च स्थिति रखते हैं।
  6. सुरतेवाला मीणा: अन्य जातियों के साथ वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न संतानों या वर्गों को इस श्रेणी में रखा जाता है।

सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन

  • कुल देवता: भूरिया बाबा (गोतमेश्वर) इनके आराध्य देव हैं। मीणा समुदाय के लोग भूरिया बाबा की झूठी कसम कभी नहीं खाते।
  • कुल देवी: जीणमाता (रेवासा ग्राम, सीकर) को मीणा अपनी कुल देवी के रूप में पूजते हैं। यहाँ नवरात्रों में भव्य मेला लगता है।
  • तीर्थ स्थल:
    • गोतमेश्वर मेला: अरणोद (प्रतापगढ़) में वैशाख पूर्णिमा को आयोजित होता है। इसे ‘मीणाओं का प्रयागराज’ भी कहा जा सकता है। सिरोही में भी भूरिया बाबा का मंदिर है।
    • जीणमाता मेला: सीकर में प्रतिवर्ष नवरात्र के दौरान विशाल मेला भरता है।

सामाजिक प्रथाएं एवं प्रशासन

  • पंचायत व्यवस्था: मीणा समाज की पंचायत व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ होती है। इनकी सबसे बड़ी पंचायत को ‘चौरासी पंचायत’ कहा जाता है।
  • ग्राम प्रमुख: गाँव के मुखिया को ‘पटेल’ कहा जाता है।
  • बुझ देवता: मीणा समाज में देवी-देवताओं और पितरों को ‘बुझ देवता’ कहकर संबोधित किया जाता है।
  • नाता (नतारा) प्रथा: यह एक विधवा या परित्यक्ता विवाह प्रथा है। इसके अंतर्गत कोई विवाहित स्त्री अपने पति और बच्चों को छोड़कर, सामाजिक सहमति से दूसरे पुरुष के साथ विवाह कर सकती है।
  • छेड़ा फाड़ना (तलाक): यह तलाक की एक सामाजिक विधि है। इसमें पुरुष अपनी पत्नी की ओढ़नी या साड़ी के पल्लू में रुपया बांधकर उसे चौड़ाई की तरफ से फाड़ देता है। इस प्रक्रिया के बाद स्त्री को समाज में ‘परित्यक्ता’ माना जाता है और वह पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र होती है।
  • झगड़ा राशि: यदि कोई पुरुष किसी विवाहित स्त्री को भगाकर ले जाता है, तो पूर्व पति को मुआवजे के रूप में जो राशि दी जाती है, उसे ‘झगड़ा राशि’ कहते हैं। इसका निर्धारण जातीय पंचायत करती है।

वर्तमान स्थिति

शैक्षणिक और आर्थिक दृष्टि से मीणा जनजाति राजस्थान की सबसे संपन्न और शिक्षित जनजाति है। प्रशासनिक सेवाओं और राजनीति में इनका प्रतिनिधित्व सर्वाधिक है।

2. भील जनजाति (Bhil Tribe)

परिचय एवं उत्पत्ति

  • स्थान: भील राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति मानी जाती है। जनगणना के अनुसार, मीणाओं के बाद यह राज्य की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है।
  • व्युत्पत्ति: ‘भील’ शब्द की उत्पत्ति द्रविड़ भाषा के ‘बील’ (Bil) शब्द से मानी जाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘कमान’ (धनुष) होता है। ये अपनी तीरंदाजी कौशल के लिए विख्यात हैं।
  • उपनाम/उपाधियाँ:
    • इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें ‘वनपुत्र’ (Sons of the Forest) की संज्ञा दी है।
    • इतिहासकार टॉलमी ने इन्हें ‘फिलाइट’ (तीरंदाज) कहा है।
    • महाकाव्यों में इन्हें निषाद या पुलिंद भी कहा गया है।
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भौगोलिक विस्तार

  • मुख्य निवास (भौमट): इनका मुख्य संकेंद्रण दक्षिणी राजस्थान, विशेषकर उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ जिलों में है। उदयपुर के अरावली पर्वतीय क्षेत्र को ‘भौमट’ कहा जाता है, जहाँ भील बाहुल्य है।
  • सांख्यिकीय तथ्य: संख्या की दृष्टि से सर्वाधिक भील बांसवाड़ा जिले में निवास करते हैं।

आवास एवं सामाजिक संरचना

  • घर (कू/टापरा): भीलों के घरों को स्थानीय भाषा में ‘कू’ या ‘टापरा’ कहा जाता है।
  • फला: भीलों की छोटी ढाणियों या झोपड़ियों के समूह को ‘फला’ कहते हैं।
  • पाल: भीलों के बड़े गाँव को ‘पाल’ कहा जाता है।
  • मुखिया: पाल के मुखिया को ‘पालवी’ या ‘गमेती’ कहा जाता है। एक गाँव के छोटे मुखिया को ‘तदवी’ भी कहते हैं।
  • गोत्र: भीलों के गोत्र को ‘अटक’ कहा जाता है।
  • रणघोष: युद्ध या संकट के समय भील ‘फाइरे-फाइरे’ का रणघोष करते हैं।

वेशभूषा

  1. ठेपाड़ा/ढेपाड़ा: भील पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली तंग धोती।
  2. खोयतू: भील पुरुषों की लंगोटी, जो कमर में बांधी जाती है।
  3. फालू: पुरुषों द्वारा शरीर को ढकने वाली साधारण धोती/अंगरखा।
  4. पोत्या: भील पुरुषों का सफेद रंग का साफा (पगड़ी)।
  5. पीरिया: विवाह के अवसर पर दुल्हन द्वारा पहनी जाने वाली पीले रंग की साड़ी
  6. सिंदूरी: लाल रंग की साड़ी, जिसे विवाहित महिलाएं पहनती हैं।
  7. कछावू: महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला घुटनों तक का लाल और काले रंग का घाघरा।

कृषि पद्धतियां

भील जनजाति द्वारा की जाने वाली स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) को दो भागों में बांटा गया है:

  1. चिमाता: पहाड़ी ढलानों पर वनों को जलाकर की जाने वाली कृषि।
  2. दजिया: मैदानी भागों में वनों को काटकर की जाने वाली कृषि।

विवाह के प्रकार

भील समाज में विवाह की विविध परंपराएं प्रचलित हैं:

  • हरण विवाह: लड़की को भगाकर किया जाने वाला विवाह।
  • परीक्षा विवाह: इसमें पुरुष को अपने साहस और शौर्य का प्रदर्शन करना होता है (जैसे गोल-गधेड़ो प्रथा)।
  • क्रय विवाह (दापा): वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को कन्या मूल्य (दापा) चुकाकर किया जाने वाला विवाह।
  • सेवा विवाह: शादी से पूर्व लड़का अपने भावी सास-ससुर के घर रहकर उनकी सेवा करता है।
  • हठ विवाह: लड़का-लड़की द्वारा भागकर या जबरदस्ती किया जाने वाला विवाह।
  • हाथी वेडो: यह एक विशेष प्रथा है जिसमें बांस, पीपल या सागवान के वृक्ष को साक्षी मानकर फेरे लिए जाते हैं। इसमें वर को ‘हरण’ और वधू को ‘लाड़ी’ कहा जाता है।

धर्म एवं मेले

  • कुल देवता: ‘टोटम देव’ इनके कुल देवता हैं, जो प्रायः वृक्षों या प्रकृति के रूप में पूजे जाते हैं।
  • कुल देवी: आमजा माता (केलवाड़ा, उदयपुर)।
  • बेणेश्वर मेला: डूंगरपुर के नवाटापरा में सोम, माही और जाखम नदियों के संगम पर माघ पूर्णिमा को आयोजित होता है। इसे ‘आदिवासियों का कुम्भ’ कहा जाता है।
  • घोटिया अम्बा मेला: बांसवाड़ा में चैत्र अमावस्या को आयोजित होता है। इसे ‘भीलों का कुम्भ’ कहा जाता है।
  • विशेष मान्यता: ये केसरिया नाथ जी (ऋषभदेव जी/काला जी) के मंदिर की केसर का पानी पीकर कभी झूठ नहीं बोलते।

कला एवं संस्कृति

  • नृत्य: गवरी (राई), गैर, द्विचकी (विवाह पर), हाथीमना (बैठकर किया जाने वाला नृत्य), घूमरा।
  • लोकगीत:
    • सुवंटिया: भील स्त्री द्वारा विरह में गाया जाने वाला गीत।
    • हमसीढ़ो: भील स्त्री और पुरुष द्वारा गाया जाने वाला युगल गीत।
  • भराड़ी: वैवाहिक अवसर पर भील दूल्हे के घर की दीवार पर जिस लोक देवी का भित्ति चित्र बनाया जाता है, उसे ‘भराड़ी’ कहते हैं। यह वैवाहिक भित्ति चित्रण की देवी मानी जाती है।

3. गरासिया जनजाति (Garasia Tribe)

परिचय एवं निवास

  • स्थान: यह जनजाति राजस्थान की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति है। मुख्य रूप से सिरोही जिले की आबू रोड और पिंडवाड़ा तहसीलों में निवास करती है। इसके अलावा उदयपुर की गोगुंदा और कोटड़ा तहसीलों में भी इनका विस्तार है। पाली जिले के बाली क्षेत्र में भी ये पाए जाते हैं।
  • सामाजिक दर्जा: गरासिया जनजाति चौहान राजपूतों के वंशज होने का दावा करती है।

आवास एवं सामाजिक इकाई

  • घेर: गरासियों के घर को ‘घेर’ कहा जाता है।
  • फालिया: इनके गाँवों या मोहल्लों को ‘फालिया’ कहते हैं।
  • सहलोत: गाँव का मुखिया ‘सहलोत’ या ‘पालवी’ कहलाता है।
  • सोहरी: अनाज को सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी से बनी कोठियां ‘सोहरी’ कहलाती हैं।
  • हेलरू: गरासिया जनजाति के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए कार्य करने वाली सहकारी संस्था को ‘हेलरू’ कहा जाता है।

सांस्कृतिक विशेषताएं

  • आदर्श पक्षी: गरासिया जनजाति मोर को अपना आदर्श पक्षी मानती है और इसे पवित्र समझती है।
  • स्मारक (हुरे): मृतक व्यक्ति की स्मृति में बनाए जाने वाले मिट्टी या पत्थर के स्मारक को ‘हुरे’ या ‘मोगी’ कहा जाता है।
  • अस्थि विसर्जन: ये अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन नक्की झील (माउंट आबू) में करते हैं, जिसे ये पवित्र मानते हैं (जैसे गंगा)।
  • कृषि: सामूहिक रूप से की जाने वाली कृषि को ‘हारी-भावरी’ कहते हैं।
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विवाह एवं परिवार

गरासिया समाज में प्रेम विवाह (Love Marriage) और लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in relationship) की परंपरा बहुत पुरानी है।

  • दापा प्रथा: वर पक्ष वधू पक्ष को मूल्य देता है।
  • बहुपत्नीत्व: संपन्नता के प्रतीक के रूप में एक से अधिक पत्नियां रखने का चलन है।
  • विवाह के प्रकार:
    1. मोर बांधिया: यह ब्रह्म विवाह की तरह है, जिसमें पूरे हिन्दू रीति-रिवाज से फेरे लिए जाते हैं।
    2. पहरावणा: नाममात्र के फेरे होते हैं, ब्राह्मण की आवश्यकता नहीं होती।
    3. ताणना: इसमें न सगाई होती है, न फेरे। वर पक्ष कन्या का मूल्य (दापा) चुकाकर उसे ले जाता है।
    4. मेलबो: विवाह में खर्च से बचने के लिए दुल्हन को दूल्हे के घर छोड़ दिया जाता है।

मेले एवं त्यौहार

  • गौर का मेला (सियावा का मेला): सिरोही के सियावा गाँव में वैशाख पूर्णिमा को भरता है। इसे ‘मनखां रो मेलो’ भी कहते हैं। इस मेले में युवक-युवतियां अपने जीवनसाथी का चुनाव करते हैं।
  • चित्र-विचित्र मेला: उदयपुर-गुजरात सीमा पर।

नृत्य

इनके नृत्य अत्यंत लयबद्ध होते हैं: वालर (बिना वाद्य यंत्र के), लूर, कूद, मांदल, जवारा, मोरिया, गौर।

4. सहरिया जनजाति (Saharia Tribe)

परिचय एवं विशिष्टता

  • स्थिति: यह राजस्थान की एकमात्र ऐसी जनजाति है जिसे भारत सरकार ने ‘आदिम जनजाति समूह’ (PVTG – Particularly Vulnerable Tribal Group) की सूची में शामिल किया है।
  • निवास: मुख्य रूप से बारां जिले की किशनगंज और शाहाबाद तहसीलों में निवास करती है।
  • स्वभाव: सहरिया अत्यधिक शर्मिले स्वभाव के होते हैं। इस जनजाति में भीख मांगना पूर्णतः वर्जित है, चाहे कितनी भी गरीबी हो।

आवास एवं प्रशासन

  • टापरी: मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और घास-फूस से बने इनके घरों को ‘टापरी’ कहते हैं।
  • सहराना: सहरियों की बस्ती को ‘सहराना’ कहा जाता है।
  • सहरोल: इनके गाँव को ‘सहरोल’ कहते हैं।
  • कोतवाल: सहरिया समाज के मुखिया को ‘कोतवाल’ कहा जाता है।
  • टोपा/गोपना/कोरुआ: घने जंगलों में पेड़ों या बल्लियों पर बनाई गई मचाननुमा झोपड़ी।
  • कुसिला: अनाज संग्रह के लिए मिट्टी की कोठियां।
  • भडेरी: आटा संग्रह करने का पात्र।

सामाजिक संगठन

इनकी पंचायत व्यवस्था तीन स्तरों पर होती है:

  1. पंचताई: पाँच गाँवों की पंचायत।
  2. एकादशिया: 11 गाँवों की पंचायत।
  3. चौरासिया: 84 गाँवों की सबसे बड़ी पंचायत। इसका आयोजन सीताबाड़ी (केमरी गाँव) में होता है, जहाँ समाज के बड़े फैसले लिए जाते हैं।

धर्म एवं संस्कृति

  • कुल देवता/गुरू: महर्षि वाल्मिकी इनके आदि गुरु हैं। तेजाजी को भी ये अपना लोक देवता मानते हैं।
  • कुल देवी: कोडिया देवी।
  • संस्कार: सहरिया जनजाति में लड़की का जन्म अत्यंत शुभ माना जाता है। श्राद्ध संस्कार नहीं किया जाता।

मेले

  1. सीताबाड़ी का मेला (बारां): केमरी गाँव में ज्येष्ठ (मई-जून) अमावस्या को भरता है। इसे ‘सहरिया जनजाति का कुम्भ’ और ‘हाड़ौती का सबसे बड़ा मेला’ कहा जाता है।
  2. कपिल धारा का मेला (बारां): कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित होता है।

वेशभूषा

  • सलुका: पुरुषों की अंगरखी।
  • खपटा: पुरुषों का साफा।
  • पंछा: पुरुषों की धोती (घुटनों तक)।

नृत्य

शिकारी नृत्य (प्रमुख), लहंगी, सांग, बिछुआ।

5. कंजर जनजाति (Kanjar Tribe)

परिचय

  • क्षेत्र: यह जनजाति मुख्य रूप से हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़) और कुछ हद तक सवाई माधोपुर, भीलवाड़ा, अलवर में निवास करती है।
  • व्युत्पत्ति: ‘कंजर’ शब्द संस्कृत के ‘काननचार’ (Kanan-Char) से बना है, जिसका अर्थ है- ‘जंगल में विचरण करने वाला’
  • प्रकृति: ऐतिहासिक रूप से यह जनजाति अपनी आपराधिक प्रवृत्तियों के लिए कुख्यात रही है, लेकिन वर्तमान में मुख्यधारा में शामिल हो रही है।

विशिष्ट प्रथाएं

  • पाती मांगना: कंजर लोग कोई भी अपराध (चोरी/डकैती) करने से पूर्व ईश्वर (विशेषकर हनुमान जी या चौथ माता) से आशीर्वाद मांगते हैं, जिसे ‘पाती मांगना’ कहा जाता है।
  • हाकम राजा का प्याला: कंजर जनजाति के लोग ‘हाकम राजा का प्याला’ (शराब) पीकर कभी झूठ नहीं बोलते।
  • मृत्यु संस्कार: ये मृतक के मुंह में गंगाजल के स्थान पर शराब की बूंदें डालते हैं। शव को जलाने के बजाय दफनाने की प्रथा अधिक है।
  • आवास: इनके घरों के मुख्य दरवाजे के पीछे या अन्यत्र खिड़कियां अवश्य रखी जाती हैं, ताकि पुलिस के आने पर पीछे से भागने में आसानी हो।

धर्म एवं कला

  • आराध्य देव: हनुमान जी।
  • कुल देवी: चौथ माता (चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर)। इसके अलावा रक्तदंतिका माता (संतूर, बूंदी) की भी पूजा करते हैं।
  • मेला: चौथ माता का मेला (माघ कृष्ण चतुर्थी) – इसे ‘कंजरों का कुम्भ’ कहा जाता है।
  • नृत्य: चकरी नृत्य (चक्करदार घाघरा पहनकर किया जाने वाला तेज गति का नृत्य) और धाकड़ नृत्य।

6. कथौड़ी जनजाति (Kathodi Tribe)

परिचय एवं आजीविका

  • मूल स्थान: यह जनजाति मूल रूप से महाराष्ट्र (खानदेश क्षेत्र) की है।
  • निवास: राजस्थान में मुख्यतः उदयपुर जिले की कोटड़ा, झाड़ोल और सराड़ा तहसीलों में सिमित है।
  • व्यवसाय: इनका पारंपरिक कार्य खैर (Acacia Catechu) के वृक्ष से ‘कत्था’ तैयार करना है, इसीलिए इनका नाम ‘कथौड़ी’ पड़ा।
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सामाजिक जीवन

  • विशेषता: यह जनजाति संकटग्रस्त स्थिति में है। ये दूध का सेवन नहीं करते हैं।
  • शराब सेवन: कथौड़ी जनजाति में स्त्री और पुरुष दोनों साथ बैठकर शराब पीते हैं। इनका पसंदीदा पेय महुआ की शराब है।
  • आहार: ये मांसाहारी होते हैं और परंपरागत रूप से बंदर का मांस खाना पसंद करते थे (अब यह प्रथा लगभग समाप्त है)।
  • वेशभूषा: महिलाएं महाराष्ट्रियन अंदाज में साड़ी पहनती हैं, जिसे ‘फड़का’ कहा जाता है।

कला

  • वाद्य यंत्र: तारपी, पावरी (सुषिर वाद्य)।
  • नृत्य: मावलिया (नवरात्र पर पुरुषों द्वारा) और होली नृत्य (महिलाओं द्वारा पिरामिड बनाकर)।

7. डामोर जनजाति (Damor Tribe)

परिचय

  • निवास: डामोर जनजाति मुख्य रूप से डूंगरपुर जिले की सीमलवाड़ा पंचायत समिति में निवास करती है (इसे ‘डामरिया क्षेत्र’ भी कहते हैं)। बांसवाड़ा में भी इनकी कुछ आबादी है।
  • उत्पत्ति: इनकी उत्पत्ति राजपूतों से मानी जाती है। इनका संबंध मूलतः गुजरात से है, इसलिए इनकी संस्कृति और भाषा पर गुजराती प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

सामाजिक संरचना

  • एकाकी परिवार: जनजातियों में डामोर एकमात्र ऐसी जनजाति है जो पूर्णतः एकल परिवार (Nuclear Family) में विश्वास रखती है। विवाह के तुरंत बाद लड़का अपने माता-पिता से अलग हो जाता है।
  • पंचायत: गाँव की पंचायत के मुखिया को ‘मुखी’ कहा जाता है।
  • वेशभूषा: इस जनजाति के पुरुष महिलाओं की भांति भारी आभूषण पहनने के शौकीन होते हैं।

मेले एवं उत्सव

  • ग्यारस की रेवाड़ी का मेला: डूंगरपुर में (सितंबर माह में) आयोजित होता है।
  • छेलावजी का मेला: पंचमहल (गुजरात) में भरता है, जो इनका प्रमुख मेला है।
  • चाड़िया: होली के अवसर पर आयोजित विशेष उत्सव को ‘चाड़िया’ कहा जाता है।

8. सांसी जनजाति (Sansi Tribe)

परिचय

  • श्रेणी: यद्यपि इन्हें अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में भी रखा जाता है, परंतु इनकी जीवनशैली जनजातीय है।
  • निवास: ये खानाबदोश जीवन जीते हैं और मुख्य रूप से भरतपुर और अजमेर जिलों में निवास करते हैं।
  • उत्पत्ति: इनकी उत्पत्ति ‘सांसमल’ नामक व्यक्ति से मानी जाती है।

सामाजिक विभाजन

सांसी समाज दो उप-वर्गों में विभाजित है:

  1. बीजा: यह धनाढ्य और संपन्न वर्ग है।
  2. माला: यह अपेक्षाकृत गरीब वर्ग है।

सामाजिक रीतियां

  • कूकड़ी की रस्म: विवाह के समय चरित्र की परीक्षा लेने की एक प्रथा, जिसमें नवविवाहिता को अपने सतीत्व की परीक्षा देनी होती थी (अब यह कुप्रथा समाप्त हो रही है)।
  • विवाह: विधवा विवाह का प्रचलन नहीं है।
  • न्याय व्यवस्था: इनके समाज में किसी भी विवाद का निपटारा करने के लिए हरिजन (वाल्मीकि समाज) के व्यक्ति को आमंत्रित किया जाता है, जिसका निर्णय सर्वमान्य होता है।
  • शपथ: ये भाखर बावजी की कसम खाकर झूठ नहीं बोलते।

महत्वपूर्ण शब्दावली एवं विविध तथ्य (Key Terminology & Miscellaneous Facts)

  1. लोकाई/कांधिया: आदिवासियों में मृत्युभोज की प्रथा को ‘लोकाई’, ‘कांधिया’ या ‘मौसर’ कहा जाता है।
  2. मौताणा (Mautana): उदयपुर संभाग में प्रचलित एक प्रथा, जिसके तहत यदि किसी व्यक्ति की संदिग्ध मृत्यु हो जाती है, तो आरोपी पक्ष से जुर्माने के रूप में राशि वसूली जाती है। इसे ‘खून का बदला खून’ या मुआवजा माना जा सकता है। वसूली गई राशि ‘वढ़ोतरा’ कहलाती है।
  3. चढ़ोतरा: मौताणा राशि को ‘चढ़ोतरा’ भी कहते हैं।
  4. हलमा/हांडा/हीड़ा: यह आदिवासियों की सामुदायिक सहयोग की एक अद्भुत परंपरा है। जब किसी व्यक्ति को कृषि या घर बनाने में मदद की आवश्यकता होती है, तो पूरा गाँव निस्वार्थ भाव से उसकी सहायता करता है।
  5. हमेलो: यह एक जनजातीय सांस्कृतिक उत्सव है, जिसका आयोजन ‘माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध संस्थान’ (उदयपुर) द्वारा आदिवासियों की संस्कृति को संरक्षित करने के लिए किया जाता है।
  6. पाखरिया: यदि कोई भील किसी सैनिक के घोड़े को मार देता था या घुड़सवार को गिरा देता था, तो उसे समाज में ‘पाखरिया’ की उपाधि दी जाती थी, जो शौर्य का प्रतीक है।
  7. कीकमारी: संकट या विपत्ति के समय जोर-जोर से चिल्लाकर मदद के लिए बुलाने की आवाज।
  8. लीला-मोरिया संस्कार: इसका संबंध विवाह संस्कार से है।
  9. बपौरी: दिन के (दोपहर) विश्राम के समय को ‘बपौरी’ कहा जाता है।
  10. मावड़िया: यह आदिवासियों में प्रचलित बंधुआ मजदूरी प्रथा थी (अब अवैध)। अन्य नाम ‘सागड़ी’ या ‘हाली’ प्रथा।
  11. हुंडेल: जब दो या अधिक परिवार मिलकर साझे में खेती या कार्य करते हैं।

शोध संस्थान

माणिक्य लाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (MLV-TRI): यह उदयपुर में स्थित है। इसका कार्य जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर शोध करना और उनके विकास की योजनाएं बनाना है।


राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति कौन सी है?

राजस्थान की सबसे बड़ी जनजाति मीणा है, जो राज्य की कुल ST आबादी का 53.5% है, और इसके बाद भील जनजाति दूसरे स्थान पर है, जो कुल ST आबादी का लगभग 39% है; ये दोनों मिलकर कुल जनजातीय आबादी का 93% बनाते हैं। 

राजस्थान की जनजातियां
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राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) और राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSMSSB) द्वारा आयोजित परीक्षाओं में, राज्य के इतिहास, भूगोल, कला और संस्कृति से संबंधित प्रश्नों का भारांक (Weightage) सर्वाधिक होता है। इस खंड की उपेक्षा करना एक ऐसी रणनीतिक भूल है जो कोई भी गंभीर अभ्यर्थी नहीं कर सकता। StudyHub पर, हम केवल सूचना प्रदान नहीं करते; हम व्यापक परीक्षा रणनीतियाँ प्रदान करते हैं। हमारी अध्ययन सामग्री राजस्थान परीक्षा पाठ्यक्रम 2025 के बदलते रुझानों के अनुरूप प्रतिदिन अद्यतन (Update) की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि आपकी तैयारी अग्रिम और प्रासंगिक बनी रहे।

Comprehensive Coverage for All Rajasthan Government Exams

सभी राजस्थान सरकारी परीक्षाओं के लिए विस्तृत कवरेज

Our digital library is structured to address the specific requirements of various competitive exams. We cover the entire spectrum of recruitment tests in Rajasthan with precision and academic depth. हमारी डिजिटल लाइब्रेरी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संरचित की गई है। हम राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं के संपूर्ण स्पेक्ट्रम को सटीकता और शैक्षणिक गहराई के साथ कवर करते हैं।

RPSC RAS (Prelims & Mains) – Administrative Services

RPSC RAS (प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा) – प्रशासनिक सेवाएँ

For Civil Services aspirants, we offer an in-depth analysis of the curriculum. From the glorious Mewar, Marwar, and Kachwaha Dynasties to the vibrant Folk Culture of Rajasthan, our notes encompass the detailed syllabus of RAS General Studies. We emphasize high-scoring topics such as the Peasant Movements in Rajasthan and Integration of Rajasthan, which are frequently prioritized by examiners. सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए, हम पाठ्यक्रम का गहन विश्लेषण प्रदान करते हैं। गौरवशाली मेवाड़, मारवाड़ और कछवाहा राजवंशों से लेकर राजस्थान की जीवंत लोक संस्कृति तक, हमारे नोट्स RAS सामान्य अध्ययन के विस्तृत पाठ्यक्रम को समाहित करते हैं। हम राजस्थान के किसान आंदोलन और राजस्थान का एकीकरण जैसे उच्च अंकदायी विषयों पर विशेष बल देते हैं, जिन्हें परीक्षकों द्वारा अक्सर प्राथमिकता दी जाती है।

Rajasthan Police Constable & SI – Law Enforcement

राजस्थान पुलिस कांस्टेबल और SI – कानून प्रवर्तन

If your ambition is to wear the uniform, our resources for Rajasthan Police Constable GK and Rajasthan Sub-Inspector (SI) are unparalleled. We simplify complex data into concise, memorable facts. Topics such as Crime Against Women & Children, Police Administration, and Awards/Honours are covered extensively to assist you in securing maximum marks in the General Knowledge section. यदि आपकी महत्वाकांक्षा वर्दी धारण करने की है, तो राजस्थान पुलिस कांस्टेबल GK और राजस्थान सब-इंस्पेक्टर (SI) के लिए हमारे संसाधन अद्वितीय हैं। हम जटिल आंकड़ों को संक्षिप्त और स्मरणीय तथ्यों में सरलीकृत करते हैं। सामान्य ज्ञान खंड में अधिकतम अंक सुरक्षित करने में आपकी सहायता के लिए महिला एवं बाल अपराध, पुलिस प्रशासन, और पुरस्कार/सम्मान जैसे विषयों को विस्तार से कवर किया गया है।

Rajasthan Patwari, VDO & REET Exams

राजस्थान पटवारी, VDO और REET परीक्षाएँ

The Patwari and VDO Examinations demand specialized knowledge of Geography and Local Self-Government. Our dedicated articles explain the Panchayati Raj System, land measurement units, and major irrigation projects. Additionally, we cover teaching exams like REET (Level 1 & 2) and Senior Teacher (Grade II) with a focus on Rajasthan’s cultural heritage. पटवारी और VDO परीक्षाओं में भूगोल और स्थानीय स्वशासन के विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है। हमारे समर्पित लेख पंचायती राज व्यवस्था, भूमि मापन इकाइयों और प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं की व्याख्या करते हैं। इसके अतिरिक्त, हम REET (लेवल 1 और 2) और वरिष्ठ अध्यापक (ग्रेड II) जैसी शिक्षण परीक्षाओं को भी कवर करते हैं, जिसमें राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

Topic-Wise Mastery: A Deep Dive into the Royal State

विषय-वार महारत: शाही राज्य का गहन अध्ययन

To optimize your study routine, we have categorized our vast database into logical segments. This structured approach facilitates the creation of a comprehensive mental map of the state. आपकी अध्ययन दिनचर्या को अनुकूलित करने के लिए, हमने अपने विशाल डेटाबेस को तार्किक खंडों में वर्गीकृत किया है। यह संरचित दृष्टिकोण राज्य का एक व्यापक मानसिक मानचित्र बनाने में सहायक है।

Geography of Rajasthan (Rajasthan Bhugol)

राजस्थान का भूगोल (Rajasthan Bhugol)

Geography is traditionally the highest-scoring section. Access detailed maps and analytical notes on: भूगोल पारंपरिक रूप से सर्वाधिक अंकदायी खंड है। इन विषयों पर विस्तृत मानचित्र और विश्लेषणात्मक नोट्स प्राप्त करें:

  • Physical Divisions: The Aravalli Range, The Great Thar Desert, and the Eastern Plains. (भौतिक विभाग: अरावली पर्वतमाला, थार का विशाल मरुस्थल और पूर्वी मैदान।)

  • Drainage System: The inland drainage (Luni, Ghaggar) and perennial rivers like Chambal and Mahi. (अपवाह तंत्र: अंतःप्रवाह (लूनी, घग्घर) और चंबल एवं माही जैसी बारहमासी नदियाँ।)

  • Biodiversity: Ranthambore & Sariska Tiger Reserves, and Keoladeo Ghana Bird Sanctuary (UNESCO site). (जैव विविधता: रणथंभौर और सरिस्का टाइगर रिजर्व, और केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य (यूनेस्को स्थल)।)

History & Culture (Rajasthan Itihas aur Sanskriti)

इतिहास और संस्कृति (Rajasthan Itihas aur Sanskriti)

From the ancient civilization of Kalibangan to the valorous saga of Maharana Pratap, we cover the historical timeline comprehensively. कालीबंगा की प्राचीन सभ्यता से लेकर महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा तक, हम ऐतिहासिक कालक्रम को व्यापक रूप से कवर करते हैं।

  • Major Dynasties: The Guhil-Sisodia (Mewar), Rathores (Marwar/Bikaner), and Chauhans (Ajmer/Ranthambore). (प्रमुख राजवंश: गुहिल-सिसोदिया (मेवाड़), राठौड़ (मारवाड़/बीकानेर), और चौहान (अजमेर/रणथंभौर)।)

  • Art & Architecture: Hill Forts of Rajasthan (Chittorgarh, Kumbhalgarh), Haveli architecture, and Schools of Painting (Marwar, Kishangarh styles). (कला और वास्तुकला: राजस्थान के पहाड़ी किले (चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़), हवेली वास्तुकला, और चित्रकला शैलियाँ (मारवाड़, किशनगढ़ शैली)।)

  • Folk Culture: Lok Devta (Ramdevji, Tejaji), Folk Dances (Ghoomar, Kalbeliya), and Fairs. (लोक संस्कृति: लोक देवता (रामदेवजी, तेजाजी), लोक नृत्य (घूमर, कालबेलिया), और मेले।)

Polity & Economy (Rajvyavastha aur Arthvyavastha)

राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था (Rajvyavastha aur Arthvyavastha)

Stay aligned with the administrative and economic dynamics of the state. राज्य की प्रशासनिक और आर्थिक गतिशीलता के साथ संरेखित रहें।

  • Administrative Structure: Role of RPSC, State Human Rights Commission, and Vidhan Sabha analysis. (प्रशासनिक संरचना: RPSC, राज्य मानवाधिकार आयोग की भूमिका और विधानसभा विश्लेषण।)

  • Welfare Schemes: Flagship initiatives like Chiranjeevi Yojana (Health), Indira Gandhi Urban Employment Scheme, and Social Security Pensions. (कल्याणकारी योजनाएं: चिरंजीवी योजना (स्वास्थ्य), इंदिरा गांधी शहरी रोजगार योजना, और सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसी प्रमुख पहल।)

  • Economic Resources: Mineral wealth (Zinc, Copper, Silver), Solar Energy potential, and Tourism economy. (आर्थिक संसाधन: खनिज संपदा (जस्ता, तांबा, चांदी), सौर ऊर्जा क्षमता और पर्यटन अर्थव्यवस्था।)

Evaluate Your Proficiency: Quizzes & Mock Tests

अपनी दक्षता का मूल्यांकन करें: क्विज़ और मॉक टेस्ट

Reading notes alone is insufficient; verifying your retention is essential. Passive reading often leads to the erosion of crucial facts during the examination. Therefore, we integrate Rajasthan GK Quizzes directly into our learning modules to ensure long-term memory retention. केवल नोट्स पढ़ना ही पर्याप्त नहीं है; अपनी स्मरण शक्ति का सत्यापन करना भी अनिवार्य है। निष्क्रिय पठन अक्सर परीक्षा के दौरान महत्वपूर्ण तथ्यों के विस्मरण का कारण बनता है। इसलिए, हम दीर्घकालिक स्मृति सुनिश्चित करने के लिए अपने शिक्षण मॉड्यूल में सीधे Rajasthan GK क्विज़ को एकीकृत करते हैं।

  • Daily Live Quizzes: Challenge your intellect with fresh Multiple Choice Questions (MCQs) daily. (दैनिक लाइव क्विज़: प्रतिदिन नए बहुविकल्पीय प्रश्नों (MCQs) के साथ अपनी बौद्धिकता को चुनौती दें।)

  • Topic-Wise Assessment: Completed the “Lakes of Rajasthan” chapter? Attempt a specific test to consolidate your knowledge. (विषय-वार मूल्यांकन: क्या “राजस्थान की झीलें” अध्याय पूरा कर लिया? अपने ज्ञान को सुदृढ़ करने के लिए एक विशिष्ट परीक्षण का प्रयास करें।)

  • Previous Year Papers (PYQ): Solve authentic questions from RAS Pre, Constable, and Patwari archives. (विगत वर्षों के प्रश्न पत्र (PYQ): RAS प्री, कांस्टेबल और पटवारी अभिलेखागार से प्रमाणिक प्रश्नों को हल करें।)


Why High-Achievers Choose StudyHub?

मेधावी छात्र StudyHub का चयन क्यों करते हैं?

We prioritize quality, accuracy, and relevance above all. Our content stands out because: हम गुणवत्ता, सटीकता और प्रासंगिकता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। हमारी सामग्री विशिष्ट है क्योंकि:

  1. Bilingual Excellence: Ideal for aspirants comfortable with both Hindi and English terminology. (द्विभाषी उत्कृष्टता: हिंदी और अंग्रेजी दोनों शब्दावली में सहज अभ्यर्थियों के लिए आदर्श।)

  2. Premium Resources at No Cost: Access and download Rajasthan GK PDF Notes, Maps, and Fact Sheets freely. (निशुल्क प्रीमियम संसाधन: Rajasthan GK PDF नोट्स, मानचित्र और फैक्ट शीट्स तक मुफ्त में पहुंचें और डाउनलोड करें।)

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सफलता की ओर अपनी यात्रा आरंभ करें

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