राजस्थान की पशु सम्पदा

Table of Contents

1. प्रस्तावना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कृषि और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। भारतीय संदर्भ में, पशुधन न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण परिवहन और सामाजिक प्रतिष्ठा का भी प्रतीक है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: देश में पशुधन गणना की परंपरा अत्यंत पुरानी है। भारत में पशुधन गणना (Livestock Census) का प्रारंभ ब्रिटिश काल में वर्ष 1919-1920 से हुआ था। तब से लेकर आज तक, यह प्रक्रिया अनवरत रूप से जारी है।

  • प्रथम गणना: 1919-20 में आयोजित की गई।
  • स्वतंत्र भारत की प्रथम गणना: स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, वर्ष 1951 में पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर पशु गणना की गई, जिसने नियोजित विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
  • आवृत्ति: यह गणना प्रत्येक 5 वर्ष के अंतराल पर ‘मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय’ (भारत सरकार) द्वारा आयोजित की जाती है।

2. 20वीं पशुधन गणना (2019): एक आधुनिक दृष्टिकोण

20वीं पशुधन गणना, जो 2019 में संपन्न हुई, तकनीक और सटीकता के मामले में ऐतिहासिक रही है। इस गणना ने नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण डेटा प्रदान किया है।

2.1 गणना की पद्धति एवं नवाचार

20वीं पशुधन गणना में सभी भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सक्रिय भागीदारी रही। यह गणना ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से आयोजित की गई।

  • कवरेज: इसमें पालतू जानवरों की सभी प्रमुख प्रजातियों (मवेशी, भैंस, मिथुन, याक, भेड़, बकरी, सुअर, घोड़ा, टट्टू, खच्चर, गधा, ऊंट, कुत्ता, खरगोश और हाथी) को शामिल किया गया। साथ ही, पोल्ट्री पक्षियों (मुर्गी, बतख, एमु, टर्की, बटेर आदि) की गणना भी घरों, घरेलू उद्यमों और संस्थागत स्तर पर की गई।
  • डिजिटलीकरण (Digitalization): 20वीं पशुधन गणना को एक ‘अनूठा प्रयास’ माना जाता है क्योंकि यह पहली बार पूरी तरह से डिजिटल थी। इसमें कागजी कार्रवाई के बजाय टैबलेट कंप्यूटरों का उपयोग किया गया।
  • डेटा संग्रह: मैदानी स्तर से डेटा का ऑनलाइन संप्रेषण (Online Transmission) किया गया, जिससे त्रुटियों की संभावना कम हुई और विश्लेषण अधिक सटीक हुआ। इस गणना में 27 करोड़ से अधिक घरेलू और गैर-घरेलू मवेशियों का डेटाबेस तैयार किया गया।

2.2 राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख निष्कर्ष (भारत)

अक्टूबर 2019 में जारी अनंतिम परिणामों के अनुसार:

  • कुल पशुधन आबादी: भारत में कुल पशुधन आबादी 535.78 मिलियन (53.57 करोड़) दर्ज की गई।
  • वृद्धि दर: 2012 की गणना (19वीं गणना) की तुलना में इसमें 4.6 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई है, जो पशुपालन क्षेत्र में विकास का सूचक है।

3. राजस्थान में पशुधन परिदृश्य: 20वीं पशुधन गणना का विश्लेषण

राजस्थान, अपनी भौगोलिक विषमताओं और शुष्क जलवायु के बावजूद, पशुधन संपदा में देश का एक अग्रणी राज्य है। राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का योगदान कृषि से भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, विशेषकर अकाल और सूखे की स्थितियों में।

3.1 तुलनात्मक सांख्यिकी (2012 बनाम 2019)

20वीं पशुगणना के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान की स्थिति का विस्तृत विश्लेषण निम्न प्रकार है:

  • कुल पशुधन: राज्य में कुल पशुधन की संख्या 56.8 मिलियन (5.68 करोड़) है।
  • गिरावट का विश्लेषण: 2012 में यह संख्या 57.7 मिलियन (5.77 करोड़) थी। अतः 2019 में कुल पशुओं की संख्या में 1.66 प्रतिशत की ऋणात्मक वृद्धि (कमी) दर्ज की गई है। इस कमी का मुख्य कारण ऊंटों, गधों और भेड़ों की संख्या में भारी गिरावट माना जा सकता है।
  • राष्ट्रीय रैंकिंग: 56.8 मिलियन पशुओं के साथ राजस्थान, उत्तर प्रदेश (प्रथम स्थान) के बाद देश में दूसरे स्थान पर है।

3.2 प्रजाति-वार विश्लेषण एवं रैंकिंग

पशु प्रजातिसंख्या (2019)2012 से तुलना (वृद्धि/कमी)राष्ट्रीय रैंकिंगविवरण
बकरी (Goat)20.84 मिलियन(-) 3.81% कमीप्रथमराजस्थान ‘गरीब की गाय’ कही जाने वाली बकरी के पालन में देश में शीर्ष पर है।
गोवंश (Cattle)13.9 मिलियन(+) 4.41% वृद्धिछठागोवंश की संख्या में वृद्धि राज्य में डेयरी विकास के प्रयासों का परिणाम है। (2012: 13.3 मिलियन)।
भैंस (Buffalo)13.7 मिलियन(+) 5.53% वृद्धिदूसराभैंसों की संख्या में वृद्धि दुग्ध उत्पादन में राज्य की प्रगति को दर्शाती है। (2012: 13.0 मिलियन)।
भेड़ (Sheep)7.9 मिलियन(-) 12.95% कमीचौथाऊन उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद भेड़ों की संख्या घटी है। (2012: 9.1 मिलियन)।
ऊंट (Camel)2.13 लाख(-) 34.69% कमीप्रथम‘राज्य पशु’ होने के बावजूद ऊंटों की संख्या में चिंताजनक गिरावट आई है। (2012: 3.26 लाख)।
घोड़े/टट्टू0.34 लाख(-) 10.85% कमीतीसरापरिवहन के साधनों में मशीनीकरण के कारण कमी। (2012: 0.38 लाख)।
गधे (Donkey)0.23 लाख(-) 71.31% कमीप्रथमसर्वाधिक भारी गिरावट गधों की संख्या में देखी गई है। (2012: 0.81 लाख)।

3.3 जिला-वार वितरण (सर्वाधिक एवं न्यूनतम)

राज्य के भीतर पशुधन का वितरण भौगोलिक और जलवायवीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है:

  • बकरी: सर्वाधिक बाड़मेर में, न्यूनतम धौलपुर में।
  • गोवंश: सर्वाधिक उदयपुर (बीकानेर में भी अच्छी संख्या), न्यूनतम धौलपुर में। पश्चिम बंगाल देश में गोवंश में प्रथम है।
  • भैंस: सर्वाधिक जयपुर (डेयरी हब होने के कारण), न्यूनतम जैसलमेर में। उत्तर प्रदेश देश में प्रथम है।
  • भेड़: सर्वाधिक बाड़मेर, न्यूनतम बांसवाड़ा में। तेलंगाना देश में भेड़ों के मामले में प्रथम है।
  • ऊंट: सर्वाधिक जैसलमेर, न्यूनतम प्रतापगढ़ में।
  • घोड़े: सर्वाधिक बीकानेर, न्यूनतम डूंगरपुर में।
  • गधे: सर्वाधिक बाड़मेर, न्यूनतम टोंक में।
  • सुअर: सर्वाधिक भरतपुर, न्यूनतम डूंगरपुर में। असम देश में सुअर पालन में अग्रणी है।
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4. प्रमुख पशु नस्लें: वैज्ञानिक एवं भौगोलिक विश्लेषण

पशुओं की नस्लों (Breeds) का अध्ययन पशुपालन विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है। राजस्थान में पाई जाने वाली नस्लें अपनी प्रतिरोधक क्षमता और उत्पादकता के लिए प्रसिद्ध हैं।

4.1 बकरियां (Goats) – “चलता-फिरता फ्रिज”

राजस्थान में बकरियों की संख्या सर्वाधिक है (कुल पशुधन का 36.69%)। देश की कुल बकरियों (148.88 मिलियन) का लगभग 13.99% राजस्थान में है।

  • अनुसंधान केंद्र: केन्द्रीय बकरी अनुसंधान केन्द्र, अविकानगर (टोंक) में स्थित है।

प्रमुख नस्लें:

  1. जमनापारी: यह ‘द्वि-प्रयोजनीय’ नस्ल है। यह सर्वाधिक दूध देने वाली भारतीय बकरी है। इसका मूल स्थान चम्बल के बीहड़ हैं। (क्षेत्र: कोटा, बूंदी, झालावाड़)।
  2. लोही: यह अपने उच्च गुणवत्ता वाले मांस के लिए प्रसिद्ध है।
  3. जखराना: यह दूध और मांस दोनों के लिए श्रेष्ठ नस्ल मानी जाती है। इसका मूल स्थान बहरोड़ (अलवर) का जखराना गाँव है। (क्षेत्र: अलवर एवं आस-पास)।
  4. बरबरी: इसे ‘सुंदर बकरी’ या ‘सिटी गोट’ (City Goat) भी कहा जाता है क्योंकि यह घर के अंदर पालने के लिए उपयुक्त है। (क्षेत्र: भरतपुर, सवाई माधोपुर)।
  5. शेखावाटी: यह बिना सींग वाली नस्ल है, जिसे काजरी वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया है।
  6. अन्य: परबतसरी (नागौर), सिरोही (पीठ में झोल), मारवाड़ी (सर्वाधिक संख्या)।

4.2 गोवंश (Cattle) – श्वेत क्रांति का आधार

देश की समस्त गायों का 6.98% और राज्य की कुल पशु सम्पदा का 24.47% हिस्सा गोवंश है।

प्रमुख नस्लें:

  1. गिर (Gir):
    • उद्गम: गिर वन (गुजरात)।
    • विशेषता: लटकते हुए लंबे कान और उभरा हुआ माथा।
    • उपनाम: रैण्डा, अजमेरी, काठियावाड़ी, देसान।
    • क्षेत्र: अजमेर, भीलवाड़ा, पाली, चित्तौड़गढ़ (मध्य राजस्थान)।
  2. राठी (Rathi):
    • विशेषता: यह लाल सिंधी और साहिवाल की मिश्रित नस्ल है। इसे ‘राजस्थान की कामधेनु’ कहा जाता है क्योंकि यह राज्य में सर्वाधिक दूध देने वाली देशी नस्ल है।
    • क्षेत्र: बीकानेर, श्रीगंगानगर, जैसलमेर (उत्तर-पश्चिमी भाग)।
  3. थारपारकर (Tharparkar):
    • उद्गम: बाड़मेर का मालाणी प्रदेश (मूलत: सिंध, पाकिस्तान का थारपारकर जिला)।
    • विशेषता: यह पूर्णतः रेगिस्तानी परिस्थितियों के अनुकूल है। इसे स्थानीय भाषा में “मालाणी नस्ल” कहते हैं। यह दूसरी सर्वाधिक दूध देने वाली गाय है।
    • क्षेत्र: सीमावर्ती जिले (जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर)।
  4. नागौरी (Nagauri):
    • उद्गम: नागौर का सुहालक प्रदेश।
    • विशेषता: यह ‘भारवाहक नस्ल’ (Draft Breed) है। इसके बैल अपनी फुर्ती और मजबूत कद-काठी के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध हैं। खेती के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं।
    • क्षेत्र: नागौर, जोधपुर, नोखा (बीकानेर)।
  5. कांकरेज (Kankrej):
    • उद्गम: कच्छ का रण (गुजरात)।
    • विशेषता: यह भारतीय गायों में सबसे भारी नस्ल है। इसके बैल अच्छे भारवाहक होते हैं, इसलिए इसे “द्वि-प्रयोजनीय नस्ल” (दूध और खेती दोनों के लिए) कहते हैं। इसके सींग बड़े और अर्धचंद्राकार होते हैं।
    • क्षेत्र: जालोर, सिरोही, बाड़मेर (दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान)।
  6. अन्य क्षेत्रीय नस्लें:
    • सांचौरी: जालोर (सांचौर), सिरोही।
    • मेवाती (कोठी): मेवात क्षेत्र (अलवर, भरतपुर)।
    • मालवी: मालवा पठार से सटे जिले (झालावाड़, बारां, कोटा, चित्तौड़गढ़)। ये छोटे कद के मजबूत जानवर होते हैं।
    • हरियाणवी: हरियाणा सीमावर्ती जिले (सीकर, झुंझुनूं, हनुमानगढ़, भरतपुर)। माथे पर हड्डी का उभार इसकी पहचान है।
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4.3 भैंस (Buffalo) – दुग्ध उत्पादन का मुख्य स्रोत

भारत विश्व में भैंसों की संख्या में प्रथम है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर है। भारत की कुल भैंसों का 12.47% राजस्थान में है।

प्रमुख नस्लें:

  1. मुर्रा (Murrah):
    • उपनाम: खुंडी (मुड़े हुए सींगों के कारण), काली।
    • महत्व: यह विश्व में सर्वाधिक दूध देने वाली भैंस की नस्ल है। इसे ‘ब्लैक डायमंड’ भी कहा जाता है।
    • क्षेत्र: जयपुर, अलवर, उदयपुर, गंगानगर।
  2. बदावरी (Bhadawari):
    • विशेषता: इसके दूध में सर्वाधिक वसा (Fat) की मात्रा (लगभग 13%) पाई जाती है। शरीर का रंग तांबे जैसा होता है।
    • क्षेत्र: पूर्वी राजस्थान (भरतपुर, धौलपुर, अलवर)।
  3. जाफाराबादी: यह सबसे भारी-भरकम और शक्तिशाली नस्ल है। (क्षेत्र: कोटा, झालावाड़)।
  4. सूरती: इसका मूल स्थान सूरत (गुजरात) है। (क्षेत्र: उदयपुर, डूंगरपुर)।
  5. अन्य: मेहसाना (मुर्रा और सुरती का मिश्रण), नागपुरी।

4.4 भेड़ (Sheep) – ऊन उद्योग का आधार

राजस्थान ऊन उत्पादन में देश में प्रथम स्थान पर है (देश के कुल ऊन उत्पादन का 40% से अधिक)। यहाँ की भेड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अद्भुत है।

प्रमुख नस्लें:

  1. चोकला (Chokla):
    • विशेषता: इसे ‘भारत की मेरिनो’ (Merino of India) कहा जाता है क्योंकि इससे प्राप्त ऊन सर्वश्रेष्ठ किस्म की होती है।
    • क्षेत्र: शेखावाटी क्षेत्र (चूरू, सीकर, झुंझुनूं)।
  2. जैसलमेरी: यह सर्वाधिक ऊन देने वाली नस्ल है, लेकिन ऊन के रेशे लंबे होते हैं। (क्षेत्र: जैसलमेर, जोधपुर)।
  3. नाली (Nali): घग्घर नदी (नाली) के बहाव क्षेत्र में पाई जाती है। इसकी ऊन का रेशा लंबा होता है, जिसका उपयोग कालीन (Carpet) बनाने में होता है। (क्षेत्र: हनुमानगढ़, गंगानगर, बीकानेर)।
  4. मगरा: इसे ‘बीकानेरी चोकला’ भी कहते हैं। यह सर्वाधिक मांस देने वाली नस्ल है। इसकी ऊन गलीचे बनाने के लिए सर्वोत्तम है। (क्षेत्र: बीकानेर, नागौर)।
  5. मारवाड़ी: राजस्थान में सर्वाधिक भेड़ें (लगभग 45%) इसी नस्ल की हैं। इसमें सर्वाधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है और यह लंबी दूरी तय कर सकती है।
  6. सोनाड़ी (चनोथर): इसके कान बहुत लंबे होते हैं जो चरते समय जमीन को छूते हैं। (क्षेत्र: उदयपुर, डूंगरपुर – वागड़ क्षेत्र)।
  7. पूगल: बीकानेर की तहसील पूगल इसका उत्पत्ति स्थल है।
  8. मालपुरी (अविका नगरी): इसे देशी नस्ल कहते हैं। इसकी ऊन मोटी होती है, जो नमदे बनाने के काम आती है। (क्षेत्र: टोंक, जयपुर)।
  9. खेरी: यह सफेद ऊन के लिए प्रसिद्ध है, जो मुख्यत: घुमक्कड़ रेवड़ों (जोधपुर, पाली) में मिलती है।

महत्वपूर्ण तथ्य (भेड़ एवं ऊन):

  • एशिया की सबसे बड़ी ऊन मंडी: बीकानेर।
  • केन्द्रीय ऊन विकास बोर्ड: जोधपुर (स्थापना: 1987)।
  • केन्द्रीय ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला: बीकानेर (ऊन की गुणवत्ता जांचने हेतु)।
  • आयातित नस्लें: रूसी मेरिनो, कोरिडेल और डोरसेट का उपयोग नस्ल सुधार में किया जा रहा है।

4.5 ऊंट (Camel) – राज्य पशु (पालतू श्रेणी)

ऊंट को रेगिस्तान की विषम परिस्थितियों में अनुकूलन के लिए ‘रेगिस्तान का जहाज’ कहा जाता है।

  • संवैधानिक दर्जा: राजस्थान सरकार ने 30 जून 2014 को ऊंट को ‘राज्य पशु’ (पालतू श्रेणी) का दर्जा दिया, जिसकी अधिसूचना 19 सितंबर 2014 को जारी की गई।
  • भारत के लगभग 85% ऊंट केवल राजस्थान में पाए जाते हैं।

प्रमुख नस्लें:

  1. नाचना (जैसलमेर): यह सबसे सुंदर और तेज दौड़ने वाला ऊंट है। बीएसएफ (BSF) के जवान सीमा गश्त के लिए इसी का उपयोग करते हैं।
  2. गोमठ (जोधपुर): यह ‘भारवाहक’ (Draft) क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। सवारी के लिए उत्तम।
  3. बीकानेरी: यह सबसे भारी नस्ल है। कृषि कार्यों और बोझा ढोने के लिए प्रसिद्ध। इसके माथे पर ‘स्टॉप’ (गड्ढा) होता है। देश के लगभग 50% ऊंट इसी नस्ल के हैं।
  4. जैसलमेरी: इसे ‘सवारी के लिए’ अच्छा माना जाता है। यह अपनी ‘मतवाली चाल’ के लिए प्रसिद्ध है।
  5. मेवाड़ी: यह ऊंटनी दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यह पहाड़ी क्षेत्रों में चलने में सक्षम है।

सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक तथ्य:

  • ऊंट पालक जाति: रेबारी या रायका।
  • ऊंटों के देवता: पाबूजी राठौड़ (लोकदेवता)।
  • कला: ऊंट की खाल पर की जाने वाली स्वर्ण मीनाकारी को ‘उस्ता कला’ (बीकानेर) कहते हैं। खाल से बने ठंडे पानी के पात्रों को ‘कॉपी’ कहते हैं।
  • आभूषण: गोरबंद (गले का आभूषण), गिरबाण (नाक में लकड़ी का कील)।
  • सेना: महाराजा गंगासिंह ने ‘गंगा रिसाला’ (Ganga Risala) नामक ऊंट सेना बनाई थी, जिसने विश्वयुद्धों में भाग लिया। अब यह BSF का हिस्सा है।
  • रोग: ‘सर्रा’ (Trypanosomiasis) ऊंटों में पाया जाने वाला प्रमुख रोग है।
  • दूध: ऊंटनी के दूध में विटामिन-C और इंसुलिन की मात्रा अधिक होती है, जो मधुमेह (Diabetes) के रोगियों के लिए लाभदायक है। उरमूल डेयरी (बीकानेर) भारत की एकमात्र ऊंटनी के दूध की डेयरी है।
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4.6 अन्य पशुधन (घोड़े, गधे, सुअर, कुक्कुट)

  • घोड़े:
    • मालाणी (काठियावाड़ी मिश्रित): बाड़मेर का गुढ़ामानी क्षेत्र। यह नस्ल घुड़सवारी और खेल के लिए प्रसिद्ध है।
    • मारवाड़ी: अपनी स्वामिभक्ति और कद-काठी के लिए प्रसिद्ध।
    • अश्व विकास कार्यक्रम: मालाणी नस्ल सुधार हेतु संचालित।
  • कुक्कुट (Poultry):
    • सर्वाधिक मुर्गियां अजमेर (अण्डों की टोकरी) में हैं। देशी मुर्गियां बांसवाड़ा में अधिक हैं।
    • कड़कनाथ योजना: बांसवाड़ा में आदिवासियों के लिए संचालित (काले मांस वाला मुर्गा)।
    • रोग: रानीखेत (न्यूकैसल डिजीज) और बर्ड फ्लू।

5. पशु मेले (Animal Fairs): सांस्कृतिक एवं आर्थिक संगम

राजस्थान में पशु मेले न केवल पशुओं के क्रय-विक्रय का केंद्र हैं, बल्कि ये राज्य की लोक संस्कृति का भी प्रदर्शन करते हैं। इनका आयोजन मुख्यत: पशुपालन विभाग द्वारा किया जाता है।

  • सर्वाधिक मेले: नागौर (3), झालावाड़ (2)।
पशु मेलास्थान/जिलाविशेष विवरण
वीर तेजाजी पशु मेलापरबतसर (नागौर)श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या। आय की दृष्टि से पहले यह सबसे बड़ा मेला था।
श्री रामदेव पशु मेलामानासर (नागौर)नागौरी बैलों के लिए प्रसिद्ध। (माघ माह)।
बलदेव पशु मेलामेड़ता सिटी (नागौर)किसान नेता बलदेव राम मिर्धा की स्मृति में। (चैत्र माह)।
मल्लीनाथ पशु मेलातिलवाड़ा (बाड़मेर)यह राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला है। यहाँ थारपारकर और कांकरेज नस्ल का व्यापार होता है। लूणी नदी के किनारे।
कार्तिक पशु मेलापुष्कर (अजमेर)यह मेला ऊंटों की बिक्री और विदेशी पर्यटकों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। (गिर नस्ल)।
चन्द्रभागा पशु मेलाझालरापाटन (झालावाड़)मालवी नस्ल के लिए प्रसिद्ध। (कार्तिक पूर्णिमा)।
गोमती सागर मेलाझालरापाटन (झालावाड़)हाड़ौती क्षेत्र का प्रमुख मेला।
गोगामेड़ी पशु मेलानोहर (हनुमानगढ़)हरियाणवी नस्ल का व्यापार। राजस्थान का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला मेला।
महाशिवरात्रि पशु मेलाकरौलीहरियाणवी नस्ल हेतु।
जसवंत प्रदर्शनी/मेलाभरतपुरहरियाणवी नस्ल।
बजरंग पशु मेलासिणधरी (बाड़मेर)

6. संस्थागत ढांचा: अनुसंधान एवं प्रजनन केंद्र

पशुधन के वैज्ञानिक प्रबंधन और नस्ल सुधार के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने कई विशिष्ट संस्थान स्थापित किए हैं।

केन्द्रीय संस्थान (ICAR के अंतर्गत):

  1. केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (CSWRI): अविकानगर (टोंक)। (स्थापना: 1962)।
  2. केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (शाखा): अविकानगर (टोंक)। (मुख्यालय मखदूम, मथुरा में है)।
  3. केन्द्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र (NRCC): जोड़बीड़, बीकानेर। (स्थापना: 5 जुलाई 1984)।
  4. केन्द्रीय अश्व (घोड़ा) उत्पादन परिसर: बीकानेर (जोड़बीड़) और विलड़ा (जोधपुर)। यहाँ चेतक वंशज तैयार किए जा रहे हैं।

राज्य स्तरीय एवं अन्य केंद्र:

  • भैंस प्रजनन केंद्र: वल्लभनगर (उदयपुर)।
  • बकरी विकास एवं चारा उत्पादन केंद्र: रामसर (अजमेर) – स्विट्जरलैंड के सहयोग से।
  • सुअर फार्म: अलवर।
  • राजकीय कुक्कुट शाला: जयपुर।
  • फ्रोजन सीमन बैंक (कृत्रिम गर्भाधान): बस्सी (जयपुर) और मंडोर (जोधपुर)।
  • राज्य भेड़ प्रजनन केंद्र: चित्तौड़गढ़, जयपुर, फतेहपुर (सीकर), बांकलिया (नागौर)।
  • राज्य गौवंश प्रजनन केंद्र: बस्सी (जयपुर), कुम्हेर (भरतपुर), डग (झालावाड़), नोहर (हनुमानगढ़), चांदन (जैसलमेर), नागौर।

7. राजस्थान में डेयरी विकास (Dairy Development)

राजस्थान में डेयरी विकास कार्यक्रम सहकारिता (Co-operative) के सिद्धांत पर आधारित है, जो गुजरात के ‘अमूल’ मॉडल का अनुसरण करता है।

त्रि-स्तरीय ढांचा:

  1. शीर्ष स्तर (राज्य): राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) – जयपुर। (स्थापना: 1977)।
  2. मध्यम स्तर (जिला): जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (वर्तमान में 24 संघ, मूलत: 21)।
  3. निचला स्तर (ग्राम): प्राथमिक दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियां (17,000+ से अधिक)।

प्रमुख तथ्य:

  • पद्मा डेयरी: राज्य की सबसे पुरानी डेयरी (अजमेर), स्थापना 1938 में हुई थी (स्वतंत्रता पूर्व)।
  • प्रमुख डेयरियां: गंगमूल (हनुमानगढ़), उरमूल (बीकानेर), वरमूल (जोधपुर)।
  • रानीवाड़ा डेयरी (जालोर): यह राज्य की सबसे बड़ी डेयरी मानी जाती है।
  • टेट्रापैक संयंत्र: जयपुर डेयरी द्वारा सेना के लिए 90 दिनों तक खराब न होने वाला दूध तैयार किया जाता है।
  • दुग्ध उत्पादन: अद्यतन आंकड़ों (BAHS 2023) के अनुसार, राजस्थान दुग्ध उत्पादन में देश में प्रथम/द्वितीय स्थान (उत्तर प्रदेश के साथ प्रतिस्पर्धा) पर रहता है।

8. पशु चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं कल्याणकारी योजनाएं

पशुधन के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए सरकार द्वारा निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

संस्थान एवं अवसंरचना:

  • पशुपालन विभाग: स्थापना 1957 में जयपुर में हुई।
  • पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय: ‘राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय’ (RAJUVAS), बीकानेर। (स्थापना: 13 मई 2010)। यह राज्य का एकमात्र वेटनरी विश्वविद्यालय है। जोबनेर (जयपुर) में दूसरा प्रस्तावित है।
  • अपोलो कॉलेज ऑफ वेटनरी मेडिसिन (जयपुर): देश का पहला पीपीपी (PPP) मॉडल पर आधारित वेटनरी कॉलेज।

प्रमुख योजनाएं एवं पहल:

  1. मुख्यमंत्री पशुधन निःशुल्क दवा योजना:
    • शुभारंभ: 15 अगस्त 2012।
    • उद्देश्य: पशुओं के लिए आवश्यक जेनरिक दवाइयां और सर्जिकल उपभोग्य वस्तुएं निःशुल्क उपलब्ध कराना।
  2. मुख्यमंत्री पशुधन आरोग्य चल इकाई (Mobile Veterinary Unit):
    • शुभारंभ: 15 सितंबर 2013।
    • उद्देश्य: दूरदराज के क्षेत्रों में घर बैठे चिकित्सा सुविधा।
  3. एडवांस मिल्क टेस्टिंग लैब: मानसरोवर (जयपुर) में 7 अक्टूबर 2014 को शुरू। मिलावट (यूरिया, डिटर्जेंट) की जांच हेतु।
  4. लम्पी स्किन डिजीज (Lumpy Skin Disease) प्रबंधन: 2022-23 में इस महामारी ने गोवंश को भारी क्षति पहुंचाई। सरकार ने टीकाकरण और राहत के लिए विशेष अभियान चलाए।
  5. कामधेनु पशु बीमा योजना: नवीनतम योजना, जिसके तहत दुधारू पशुओं का बीमा कवर प्रदान किया जाता है (महंगाई राहत कैंप का हिस्सा)।

9. निष्कर्ष

राजस्थान की अर्थव्यवस्था में पशु सम्पदा का योगदान अमूल्य है। हालांकि, 20वीं पशुधन गणना में ऊंटों और गधों की संख्या में भारी गिरावट चिंता का विषय है। मशीनीकरण ने भारवाहक पशुओं की उपयोगिता कम की है, लेकिन दुधारू पशुओं (भैंस, गाय) की संख्या में वृद्धि एक सकारात्मक संकेत है। राज्य को ऊन प्रसंस्करण, मांस निर्यात और डेयरी उत्पादों के मूल्य संवर्धन (Value Addition) पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है ताकि पशुपालकों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

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