रियासती कुशासन से उत्तरदायी शासन तक की यात्रा (1927-1946)
🚩 1. प्रजामंडल का अर्थ और पृष्ठभूमि
प्रजामण्डल — यह शब्द सुनते ही राजस्थान के हर गंभीर विद्यार्थी के दिमाग़ में एक तस्वीर बनती है: छोटी-छोटी रियासतों में जागीरदारों के अत्याचार से त्रस्त प्रजा, और उसी प्रजा का संगठित होकर उठ खड़ा होना। शब्द को तोड़कर देखें तो “प्रजा” यानी जनता और “मण्डल” यानी संगठन — शाब्दिक अर्थ में यह जनता का अपना संगठन था।
1920 के दशक में स्थिति यह थी कि ब्रिटिश भारत में तो कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम प्रगति पर था, पर देशी रियासतों की प्रजा दोहरी मार झेल रही थी — एक ओर अंग्रेज़ों का अप्रत्यक्ष शासन, दूसरी ओर स्थानीय राजा-महाराजाओं और उनके ठिकानेदारों-जागीरदारों की मनमानी। बेगार (बिना मज़दूरी के जबरन श्रम), भारी लगान, और बुनियादी नागरिक अधिकारों का अभाव — यही उस दौर की रियासती राजस्थान की तस्वीर थी।
गांधीजी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय आंदोलन जैसे-जैसे आगे बढ़ा, रियासतों की प्रजा में भी यह विश्वास जगा कि वे भी संगठित होकर अपने अधिकारों की माँग कर सकते हैं। यहीं से जन्म हुआ प्रजामण्डल आन्दोलन का।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| शाब्दिक अर्थ | प्रजा (जनता) + मण्डल (संगठन) |
| कालखंड | लगभग 1927 से 1946-48 तक |
| क्षेत्र | राजपूताना की देशी रियासतें (आज का राजस्थान) |
| लक्ष्य | रियासती कुशासन समाप्त कर उत्तरदायी शासन (Responsible Government) की स्थापना |
| मार्गदर्शक संस्था | अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) |
| पहला प्रजामंडल | जयपुर प्रजामंडल (1931) |
| अंतिम प्रजामंडल | झालावाड़ प्रजामंडल (1946) |
🔑 परीक्षा बिंदु: प्रजामंडल आंदोलन का उद्देश्य राजतंत्र को उखाड़ फेंकना नहीं, बल्कि महाराजा/महारावल के नेतृत्व में ही “उत्तरदायी शासन” स्थापित करना था — यानी राजा बना रहे, पर शासन जनता के प्रति जवाबदेह हो। यह बारीक अंतर परीक्षा में objective के रूप में अक्सर पूछा जाता है।
⚠️ यहाँ सबसे बड़ा भ्रम यह होता है कि छात्र प्रजामंडल आंदोलन को सीधे “राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम” समझ बैठते हैं। असल में यह उससे थोड़ा अलग, पर समानांतर धारा थी — किसान आंदोलन (बिजोलिया, बेंगू), आदिवासी आंदोलन (भगत आंदोलन, गोविंद गुरु) और प्रजामंडल आंदोलन — ये तीनों अलग-अलग जड़ों से निकले, पर बाद में सब एक बड़ी धारा में मिल गए।
📜 2. अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद और राजपूताना संदर्भ
प्रजामंडल आंदोलन को समझने के लिए एक कड़ी को ठीक से पकड़ना ज़रूरी है — यह आंदोलन अलग-थलग नहीं उठा, बल्कि एक अखिल भारतीय ढाँचे का हिस्सा था।
अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (All India States People’s Conference – AISPC) की स्थापना 1927 में हुई। इसका उद्देश्य था देश-भर की सभी रियासतों में उठ रहे जन-आंदोलनों को — चाहे उन्हें प्रजामंडल कहा जाए, लोक परिषद कहा जाए या प्रजा परिषद — एक साझा राष्ट्रीय मंच के नीचे लाना।
राजपूताना (आज का राजस्थान) के लिए इस परिषद की क्षेत्रीय इकाई के रूप में 1928 में अजमेर में राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना हुई। इसका प्रथम अधिवेशन 1931 में अजमेर में ही रामनारायण चौधरी की अध्यक्षता में हुआ। इतिहासकार इसी बिंदु को राजस्थान में संगठित प्रजामंडल आंदोलन की शुरुआत मानते हैं — और संयोग देखिए, उसी वर्ष 1931 में जयपुर और बूंदी — दोनों जगह प्रजामंडल बन गए।
अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (1927)
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राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद, अजमेर (1928)
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प्रथम अधिवेशन, अजमेर (1931) — अध्यक्ष रामनारायण चौधरी
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राजस्थान में प्रजामंडलों की शुरुआत
→ जयपुर प्रजामंडल (1931)
→ बूंदी प्रजामंडल (1931)आंदोलन का असली मोड़ आया 1938 में हरिपुरा अधिवेशन में, जब कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचन्द्र बोस की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार औपचारिक रूप से रियासती प्रजा के संघर्ष को समर्थन देने की घोषणा की। इसका सीधा असर दिखा — उसी एक वर्ष में मेवाड़, शाहपुरा, अलवर, भरतपुर और करौली में एक साथ प्रजामंडल खड़े हो गए।
1939 से 1946 तक पंडित जवाहरलाल नेहरू AISPC के अध्यक्ष रहे। उन्होंने ही उदयपुर में आयोजित परिषद के 7वें अधिवेशन की अध्यक्षता की — यह तथ्य बताता है कि मेवाड़ प्रजामंडल तब तक कितना सशक्त हो चुका था कि राष्ट्रीय अधिवेशन उदयपुर में हुआ।
💡 अनुभवी टिप्पणी: ध्यान दीजिए — त्रिपुरी अधिवेशन (1939) में भी कांग्रेस ने रियासती प्रजा को समर्थन दोहराया, पर परीक्षा के लिए निर्णायक मोड़ हमेशा हरिपुरा अधिवेशन 1938 ही माना जाता है, क्योंकि वहीं पहली बार औपचारिक नीतिगत घोषणा हुई थी। दोनों अधिवेशनों को गड्डमड्ड मत कीजिए।
👑 3. राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल — विस्तृत अध्ययन
अब बारी है उन प्रमुख प्रजामंडलों की, जिनसे जुड़े तथ्य लगभग हर परीक्षा में किसी न किसी रूप में पूछे जाते हैं। इन्हें कालानुक्रम में — यानी जिस क्रम में स्थापित हुए, उसी क्रम में — पढ़ना सबसे कारगर तरीका है।
3.1 जयपुर प्रजामंडल (1931) — राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल
राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन की कहानी यहीं से शुरू होती है। 1931 में कर्पूरचन्द पाटनी और जमनालाल बजाज के प्रयासों से जयपुर प्रजामंडल अस्तित्व में आया। जमनालाल बजाज कोई साधारण नाम नहीं था — उद्योगपति होते हुए भी वे गांधीजी के इतने करीब थे कि 1920 में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उन्होंने खुद गांधीजी से आग्रह किया कि उन्हें “पाँचवाँ पुत्र” बना लिया जाए, और गांधीजी ने यह स्वीकार भी किया। यही जमनालाल बजाज, जो सीकर (तत्कालीन जयपुर रियासत) के मूल निवासी थे, आगे चलकर खुद को व्यंग्यात्मक रूप से “गुलाम संख्या 4” कहते थे — पहले तीन गुलामी उन्होंने हिंदुस्तान, देशी राजाओं और सीकर ठिकाने की गिनाई थी।
पर शुरुआत आसान नहीं रही। पर्याप्त जनसमर्थन और सक्रिय कार्यकर्ताओं के अभाव में जयपुर प्रजामंडल लगभग पाँच वर्षों तक निष्क्रिय ही रहा — इस दौरान इसकी गतिविधियाँ खादी-प्रचार जैसे रचनात्मक कार्यों तक सीमित रहीं।
मोड़ आया 1936 में। वनस्थली से हीरालाल शास्त्री को बुलाया गया और प्रजामंडल का “प्रधानमंत्री” बनाया गया, जबकि जाने-माने अधिवक्ता चिरंजीलाल मिश्र इसके सभापति बने। 1938 में जमनालाल बजाज स्वयं अध्यक्ष बने और नाथमल कटला, जयपुर में प्रजामंडल का प्रथम वार्षिक अधिवेशन 8-9 मई 1938 को हुआ — 10 मई को खुद कस्तूरबा गांधी ने महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान एक निर्णायक घटना घटी — प्रजामंडल अध्यक्ष हीरालाल शास्त्री और जयपुर के दीवान मिर्जा इस्माइल के बीच एक “जेंटलमैन एग्रीमेंट” हुआ, जिसके तहत प्रजामंडल ने भारत छोड़ो आंदोलन से खुद को अलग रखने का वचन दिया। इस समझौते से नाराज़ होकर बाबा हरिश्चंद्र ने अलग से “आज़ाद मोर्चा” बनाया और जयपुर में स्वतंत्र रूप से भारत छोड़ो आंदोलन चलाया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1931 |
| संस्थापक | कर्पूरचन्द पाटनी, जमनालाल बजाज |
| 1936 पुनर्गठन | प्रधानमंत्री – हीरालाल शास्त्री; सभापति – चिरंजीलाल मिश्र |
| 1938 अध्यक्ष | जमनालाल बजाज |
| 1942 समझौता | हीरालाल शास्त्री – मिर्जा इस्माइल “जेंटलमैन एग्रीमेंट” |
| विरोध में बना संगठन | आज़ाद मोर्चा (बाबा हरिश्चंद्र) |
🔑 परीक्षा बिंदु: “राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल कौन सा था?” — इस सीधे प्रश्न का उत्तर सदैव जयपुर प्रजामंडल (1931) है। इसे किसी भी हालत में शाहपुरा (प्रथम उत्तरदायी शासन) से मत जोड़िए।
3.2 मारवाड़ प्रजामंडल (1934) — शेर-ए-राजस्थान की कर्मभूमि
मारवाड़ (जोधपुर) में राजनीतिक चेतना की जड़ें प्रजामंडल से भी पुरानी हैं। जयनारायण व्यास, जिन्हें आगे चलकर “शेर-ए-राजस्थान” की उपाधि मिली, ने पहले ही 1929 में मारवाड़ यूथ लीग बनाई थी और 1931 में मारवाड़ हितकारिणी सभा को इसमें विलीन कर दिया था।
औपचारिक “मारवाड़ प्रजामंडल” की स्थापना 1934 में जोधपुर में हुई, जिसके अध्यक्ष भंवरलाल सर्राफ बने। इसका उद्देश्य स्पष्ट था — उत्तरदायी शासन की स्थापना और नागरिक अधिकारों की रक्षा। पर 1936-37 आते-आते राज्य ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।
जनवरी 1938 में एक बड़ी घटना घटी — खुद सुभाषचन्द्र बोस और विजयलक्ष्मी पंडित जोधपुर आए और प्रजामंडल नेताओं से मुलाकात की। इसी वर्ष की गर्मियों में मारवाड़ प्रजामंडल का पुनर्गठित रूप — मारवाड़ लोक परिषद — सामने आया, जिसके नेता जयनारायण व्यास, अभयमल जैन, रणछोड़दास गट्टानी और छगनराज चौपासनी थे।
मारवाड़ लोक परिषद की सक्रियता का चरम आया 28 मार्च 1942 को, जब परिषद ने अत्याचारों के विरुद्ध और उत्तरदायी शासन के लिए बड़ा आंदोलन छेड़ा। व्यास जी ने तो परिषद का विधान ही स्थगित कर स्वयं को “प्रथम डिक्टेटर” घोषित कर दिया और जोधपुर में भारत छोड़ो आंदोलन का संचालन किया। इसी दौर में, 19 जून 1942 को क्रांतिकारी बालमुकुंद बिस्सा की जोधपुर जेल में भूख हड़ताल के दौरान मृत्यु हो गई — यह घटना मारवाड़ के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे मार्मिक कड़ियों में से एक मानी जाती है।
जयनारायण व्यास पत्रकारिता के भी उतने ही धनी थे — “अखण्ड भारत” (बंबई से), “पीप” (दिल्ली से अंग्रेज़ी पाक्षिक), और “आगीबाण” (1932 में प्रकाशित, राजस्थानी भाषा का पहला समाचार-पत्र) जैसे प्रकाशनों के ज़रिए उन्होंने रियासती दमन को उजागर किया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| प्रजामंडल स्थापना | 1934, जोधपुर |
| अध्यक्ष | भंवरलाल सर्राफ |
| लोक परिषद (पुनर्गठन) | 1938 |
| नेतृत्व | जयनारायण व्यास (“शेर-ए-राजस्थान”), रणछोड़दास गट्टानी, अभयमल जैन |
| 1942 घटना | जयनारायण व्यास “प्रथम डिक्टेटर” बने; बालमुकुंद बिस्सा शहीद |
⚠️ परीक्षा सावधानी: मारवाड़ में तीन संस्थाएँ क्रमिक रूप से आईं — मारवाड़ यूथ लीग (1929-31) → मारवाड़ प्रजामंडल (1934) → मारवाड़ लोक परिषद (1938)। छात्र अक्सर इन तीनों को एक ही मान बैठते हैं, जबकि परीक्षा में इनकी अलग-अलग स्थापना-तिथि पूछी जाती है।
3.3 हाड़ौती/कोटा प्रजामंडल (1934)
हाड़ौती क्षेत्र में राजनीतिक चेतना की नींव नयनूराम शर्मा ने रखी, जो राजस्थान सेवा संघ के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने 1918 में ही कोटा में “प्रजा प्रतिनिधि सभा” बनाई थी — यानी प्रजामंडल से भी दो दशक पहले।
बेगार-विरोधी आंदोलन चलाते हुए नयनूराम शर्मा ने 1934 में हाड़ौती प्रजामंडल की स्थापना की, जिसके प्रथम अध्यक्ष हाजी फैज़ मोहम्मद बने — यह ध्यान देने योग्य है कि संस्थापक नयनूराम शर्मा थे, पर अध्यक्ष-पद किसी और को मिला, जो परीक्षा में अक्सर उलझाने वाला बिंदु बनता है।
बाद में 1939 में (कुछ स्रोतों में 1938 भी मिलता है) नयनूराम शर्मा ने अपने सहयोगी पं. अभिन्न हरि और प्रभुलाल वर्मा के साथ मिलकर विशेष रूप से कोटा राज्य प्रजामंडल का गठन किया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पूर्ववर्ती संस्था | प्रजा प्रतिनिधि सभा, कोटा (1918) |
| हाड़ौती प्रजामंडल स्थापना | 1934 |
| संस्थापक | पं. नयनूराम शर्मा |
| प्रथम अध्यक्ष | हाजी फैज़ मोहम्मद |
| कोटा राज्य प्रजामंडल | 1938/1939 — नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि, प्रभुलाल वर्मा |
⚠️ परीक्षा सावधानी: कुछ पुरानी नोट्स सामग्री में सहयोगी नेता का नाम “अभित्र हरि” छपा मिलता है — सही नाम अभिन्न हरि है। वर्तनी की यह गलती कई जगह दोहराई गई है, इसलिए मूल नाम याद रखें।
3.4 बीकानेर प्रजामंडल (1936) — कलकत्ता से जन्मा आंदोलन
बीकानेर प्रजामंडल की कहानी बाकी सबसे अलग इसलिए है क्योंकि इसका जन्म बीकानेर में नहीं, बल्कि सैकड़ों किलोमीटर दूर कलकत्ता में हुआ। 4 अक्टूबर 1936 को कलकत्ता में रत्नाबाई ट्रस्ट के भवन में, वहाँ बस चुके प्रवासी बीकानेरवासियों ने मघाराम वैद्य की अध्यक्षता में इसकी नींव रखी। मुक्ताप्रसाद, रघुवरदयाल गोयल, स्वामी गोपालदास और सत्यनारायण सर्राफ जैसे नाम इससे जुड़े।
राज्य सरकार ने तुरंत सख़्ती दिखाई — स्थापना के तत्काल बाद ही वकील मुक्ताप्रसाद, मघाराम वैद्य और लक्ष्मणदास जैसे नेता निर्वासित कर दिए गए। 1937 में प्रजामंडल का पुनर्गठन फिर कलकत्ता में ही हुआ, इस बार लक्ष्मणदास स्वामी को मंत्री बनाया गया।
आंदोलन की अगली कड़ी 22 जुलाई 1942 को जुड़ी, जब रघुवरदयाल गोयल ने बीकानेर राज्य प्रजा परिषद का गठन किया — इसका उद्देश्य भी वही था, महाराजा गंगासिंह के नेतृत्व में उत्तरदायी शासन। यहाँ एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि महाराजा गंगासिंह स्वयं द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में देशी रियासतों के प्रतिनिधि के तौर पर लंदन गए थे — यानी बीकानेर की रियासती छवि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मज़बूत थी, जिससे प्रजामंडल को और सख़्त प्रतिरोध झेलना पड़ा।
आंदोलन की सबसे दर्दनाक घटना 1 जुलाई 1946 को रायसिंहनगर में हुई, जहाँ हुए हत्याकांड में बीरबल हरिजन शहीद हुए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 4 अक्टूबर 1936, कलकत्ता |
| अध्यक्ष | मघाराम वैद्य |
| विशेषता | राजस्थान से बाहर स्थापित एकमात्र प्रजामंडल |
| बीकानेर राज्य प्रजा परिषद | 22 जुलाई 1942, रघुवरदयाल गोयल |
| प्रमुख घटना | रायसिंहनगर हत्याकांड (1 जुलाई 1946) — बीरबल हरिजन शहीद |
💡 परीक्षा ट्रिक: याद रखने का आसान तरीका — “बीकानेर बना बाहर, बंगाल की धरती पर” — बंगाल (कलकत्ता) और बीकानेर, दोनों ‘ब’ से जुड़ जाएँ तो यह तथ्य कभी नहीं भूलेगा।
3.5 शाहपुरा (1938) — प्रथम उत्तरदायी शासन वाली रियासत
शाहपुरा, आकार में एक छोटी सी रियासत होते हुए भी, राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन के इतिहास में एक बड़ा मुकाम रखती है। 18 अप्रैल 1938 को रमेशचन्द्र औझा, लादूराम व्यास और अभयसिंह डांगी ने — मेवाड़ प्रजामंडल के संस्थापक माणिक्य लाल वर्मा के प्रत्यक्ष सहयोग से — शाहपुरा प्रजामंडल की स्थापना की।
पर शाहपुरा की असली पहचान इससे आगे की बात है। राजस्थान में पहली बार किसी एक व्यक्ति (जयपुर में देवीशंकर तिवाड़ी) को नहीं, बल्कि पूरे प्रजामंडल-संगठन को ही शासन में भागीदार बनाया गया — यानी जनता का संगठन स्वयं सत्ता का हिस्सा बना। यही वजह है कि शाहपुरा को “राजस्थान की प्रथम रियासत जिसने उत्तरदायी शासन स्थापित किया” का श्रेय मिलता है।
🔑 परीक्षा बिंदु: प्रथम प्रजामंडल = जयपुर (1931); प्रथम उत्तरदायी शासन = शाहपुरा (1938)। यह जोड़ा हर वर्ष किसी न किसी परीक्षा में match-the-column या “कौन सा कथन सही है” प्रारूप में ज़रूर आता है।
3.6 मेवाड़ प्रजामंडल (1938) — माणिक्य लाल वर्मा की कर्मभूमि
अगर राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन का कोई एक सबसे प्रतिनिधि अध्याय चुनना हो, तो वह मेवाड़ प्रजामंडल ही होगा। इसकी कहानी शुरू होती है डूंगरपुर से, जहाँ माणिक्य लाल वर्मा भीलों के बीच रचनात्मक कार्य में जुटे थे। हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन (1938) की घोषणा के बाद वे डूंगरपुर का काम भोगीलाल पंड्या को सौंपकर मेवाड़ लौट आए — यह छोटा सा विवरण दिखाता है कि उस दौर के नेता कैसे एक-दूसरे की ज़िम्मेदारियाँ आगे बढ़ाते थे।
24 अप्रैल 1938 को बलवंत सिंह मेहता के घर एक बैठक हुई, जिसमें माणिक्य लाल वर्मा ने बलवंत राय (सिंह) मेहता, भवानी शंकर वैद्य, जमुनालाल वैद्य, परसराम, भूरेलाल बया और दयाशंकर क्षेत्रीय के साथ मिलकर मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की। बलवंत सिंह मेहता प्रथम सभापति बने, भूरेलाल बया उपसभापति, और माणिक्य लाल वर्मा स्वयं महामंत्री।
राज्य ने तुरंत कड़ा रुख अपनाया — 24 सितंबर 1938 को ही मेवाड़ प्रजामंडल को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। इसके बावजूद प्रजामंडल की गतिविधियाँ अजमेर से संचालित होती रहीं। प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन नवंबर 1941 में उदयपुर की शाहपुरा हवेली में माणिक्य लाल वर्मा की अध्यक्षता में हुआ — इसमें आचार्य जे.बी. कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित जैसे राष्ट्रीय नेता शामिल हुए, जो दिखाता है कि मेवाड़ प्रजामंडल तब तक राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका था।
1939 में नारायणी देवी वर्मा के नेतृत्व में अकाल राहत समिति बनी। 1941 में मेवाड़ के दीवान सर टी. विजयराघवाचार्य ने प्रजामंडल पर लगी रोक हटाई। पर 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन एक बार फिर टकराव लेकर आया — 21 अगस्त 1942 को माणिक्य लाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता और मोहनलाल सुखाड़िया (जो आगे चलकर संयुक्त राजस्थान के मुख्यमंत्री बने) को गिरफ्तार किया गया। भूरेलाल बया को सराड़ा किले में बंद रखा गया, जिसे उस दौर में “मेवाड़ का काला पानी” कहा जाता था। इसी दौरान नारायणी देवी वर्मा और भगवती देवी बिश्नोई जैसी महिलाएँ भी जेल गईं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 24 अप्रैल 1938, उदयपुर |
| संस्थापक/महामंत्री | माणिक्य लाल वर्मा |
| प्रथम सभापति / उपसभापति | बलवंत सिंह मेहता / भूरेलाल बया |
| गैरकानूनी घोषित | 24 सितंबर 1938 |
| प्रथम अधिवेशन | नवंबर 1941, शाहपुरा हवेली, उदयपुर — अतिथि: जे.बी. कृपलानी, विजयलक्ष्मी पंडित |
| 1942 गिरफ़्तारी | माणिक्य लाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता, मोहनलाल सुखाड़िया |
💡 अनुभवी टिप्पणी: मोहनलाल सुखाड़िया के नाम को यहीं से पहचानना शुरू कर दीजिए — मेवाड़ प्रजामंडल का यह कार्यकर्ता आगे चलकर राजस्थान का सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाला नेता बना। प्रजामंडल आंदोलन को केवल “अतीत” मत समझिए, यह आधुनिक राजस्थान के नेतृत्व की नर्सरी थी।
3.7 अलवर प्रजामंडल (1938)
अलवर में स्वाधीनता चेतना के अग्रदूत पं. हरिनारायण शर्मा माने जाते हैं, जिन्होंने इससे पहले ही अस्पृश्यता निवारण संघ, वाल्मीकि संघ और आदिवासी संघ जैसी संस्थाएँ बना रखी थीं। 1933 में स्थापित कांग्रेस समिति को ही 1938 में हरिनारायण शर्मा और कुंजबिहारी मोदी ने “अलवर राज्य प्रजामंडल” का नाम दिया।
पंजीकरण न होने के कारण संघर्ष शुरू हुआ, और उसी वर्ष स्कूल फीस बढ़ोतरी के विरोध में हरिनारायण शर्मा, लक्ष्मणस्वरूप त्रिपाठी और अन्य कार्यकर्ता गिरफ़्तार हुए। पुलिस ने प्रजामंडल कार्यालय पर ताला जड़ दिया, तो कार्यकर्ताओं ने दोबारा कब्ज़ा कर वहाँ तिरंगा फहरा दिया — यह छोटी सी घटना उस दौर के जज़्बे को अच्छी तरह दिखाती है।
1939 में पंजीकरण के बाद सरदार नत्थामल इसके अध्यक्ष बने, और अप्रैल 1940 में अलवर में निर्वाचित नगरपालिका परिषद का गठन हुआ। प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन 1944 में हुआ।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1938 |
| संस्थापक | पं. हरिनारायण शर्मा, कुंजबिहारी मोदी |
| 1939 पंजीकरण बाद अध्यक्ष | सरदार नत्थामल |
| प्रथम अधिवेशन | 1944 |
3.8 भरतपुर प्रजामंडल (1938)
भरतपुर प्रजामंडल की स्थापना-कथा भी बीकानेर जैसी ही दिलचस्प है — यह भी भरतपुर में नहीं, बल्कि पड़ोसी रियासत हरियाणा के रेवाड़ी में जुगल किशोर चतुर्वेदी के घर मार्च 1938 में हुई। किशनलाल जोशी के प्रयासों से बनी इस संस्था के प्रथम अध्यक्ष गोपीलाल यादव बने; मास्टर आदित्येन्द्र, लछिराम और ठाकुर देशराज जैसे नाम भी इससे जुड़े।
23 दिसंबर 1940 को इसका पंजीकरण “भरतपुर प्रजा परिषद” के नाम से हुआ, जिसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक समस्याएँ उठाना, प्रशासनिक सुधार और शिक्षा का प्रसार था। भरतपुर के तत्कालीन शासक किशनसिंह को उत्तरदायी शासन की माँग का समर्थन करने के कारण राजगद्दी तक गँवानी पड़ी, और अल्पवयस्क बृजेन्द्र सिंह नए शासक बनाए गए।
18 मार्च 1948 को जब भरतपुर मत्स्य संघ में विलीन हुआ, तभी जाकर इन समस्याओं का स्थायी हल निकला।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | मार्च 1938, रेवाड़ी (हरियाणा) |
| संस्थापक | किशनलाल जोशी |
| प्रथम अध्यक्ष | गोपीलाल यादव |
| पंजीकृत नाम (1940) | भरतपुर प्रजा परिषद |
3.9 सिरोही प्रजामंडल (1939) — “राजस्थान के गांधी” की भूमि
सिरोही में प्रजामंडल की कहानी दो चरणों में बँटी है। पहला प्रयास 1934 में हुआ, जब बंबई में पढ़ रहे कुछ सिरोही मूल के छात्रों ने वहीं प्रजामंडल की नींव रखी — पर यह असंगठित और अल्पजीवी रहा।
असली संगठित रूप मिला 22 जनवरी 1939 को, जब गोकुलभाई भट्ट ने सात अन्य साथियों के साथ सिरोही में प्रजामंडल का पुनर्गठन किया। गोकुलभाई भट्ट का नाम राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम में विशेष सम्मान रखता है — उन्हें “राजस्थान का गांधी” कहा जाता है। हाथल (सिरोही) में जन्मे गोकुलभाई पहली बार 6 अप्रैल 1921 को बंबई सरकार द्वारा गिरफ़्तार हुए थे, फिर 1930 के नमक सत्याग्रह में और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी जेल गए।
आज़ादी के बाद वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य रहे और कुछ समय के लिए सिरोही रियासत के मुख्यमंत्री भी बने। पर उनकी सबसे याद रखी जाने वाली भूमिका राजस्थान एकीकरण के समय की है — जब सिरोही ज़िले के विभाजन और माउंट आबू को गुजरात में मिलाए जाने का प्रस्ताव आया, तो गोकुलभाई भट्ट ने इसका डटकर विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि माउंट आबू राजस्थान का हिस्सा बना रहा, हालाँकि ज़िले का कुछ अन्य हिस्सा गुजरात में चला गया।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| प्रथम प्रयास | 1934, बंबई (छात्रों द्वारा) |
| संगठित स्थापना | 22 जनवरी 1939, सिरोही |
| नेतृत्व | गोकुलभाई भट्ट (“राजस्थान का गांधी”) |
| विशेष योगदान | माउंट आबू को राजस्थान में बनाए रखने का श्रेय |
3.10 डूंगरपुर प्रजामंडल (1944) — “वागड़ के गांधी” का प्रयास
आदिवासी बहुल डूंगरपुर में राजनीतिक चेतना जगाने का श्रेय भोगीलाल पंड्या को जाता है, जिन्हें “वागड़ का गांधी” कहा जाता है। 13 नवंबर 1904 को डूंगरपुर के सीमलवाड़ा गाँव में जन्मे भोगीलाल पंड्या ने बेहद कम उम्र में ही आदिवासी क्षेत्र में शिक्षा और जागरूकता का काम शुरू कर दिया था — 15 मार्च 1938 को उन्होंने “वनवासी सेवा संघ” की स्थापना की, जो बाद में प्रतिबंधित होने पर “सेवा संघ संस्था” के नाम से चलती रही।
1 अगस्त 1944 को भोगीलाल पंड्या ने शिवलाल कोटाड़िया, हरिदेव जोशी और गौरीशंकर उपाध्याय जैसे साथियों के साथ मिलकर डूंगरपुर प्रजामंडल की औपचारिक स्थापना की। इसका उद्देश्य था महारावल के नेतृत्व में ही उत्तरदायी शासन की स्थापना। अप्रैल 1946 में इसका प्रथम अधिवेशन हुआ, जिसमें हीरालाल शास्त्री और मोहनलाल सुखाड़िया जैसे अन्य रियासतों के नेता भी शामिल हुए — यह दिखाता है कि तब तक अलग-अलग रियासतों के प्रजामंडल एक-दूसरे के आयोजनों में शरीक होने लगे थे।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| पूर्ववर्ती संस्था | वनवासी सेवा संघ (1938) |
| प्रजामंडल स्थापना | 1 अगस्त 1944 |
| संस्थापक | भोगीलाल पंड्या (“वागड़ का गांधी”), शिवलाल कोटाड़िया |
| प्रथम अधिवेशन | अप्रैल 1946 |
3.11 जैसलमेर प्रजामंडल (1945) — सागरमल गोपा का बलिदान
जैसलमेर में जनजागृति का श्रेय सर्वप्रथम सागरमल गोपा को जाता है। उन्होंने 1938 में जैसलमेर में देशी राज्य लोक परिषद की एक शाखा स्थापित की और लगभग 1940 में “जैसलमेर में गुण्डाराज” नामक एक पुस्तिका छपवाकर वितरित की, जिसमें रियासती कुशासन को बेनक़ाब किया गया था। इसकी सज़ा में दरबार ने उन्हें निर्वासित कर दिया और वे नागपुर चले गए।
औपचारिक जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना 15 दिसंबर 1945 को हुई — दिलचस्प यह है कि यह भी जैसलमेर में नहीं, बल्कि जोधपुर में मीठालाल व्यास द्वारा की गई। सागरमल गोपा को 1941 में गिरफ़्तार कर लिया गया, और अप्रैल 1946 में जेल के भीतर उनकी बेहद दुखद मृत्यु हुई — आधिकारिक जाँच में इसे आत्महत्या बताया गया, पर व्यापक रूप से यह माना जाता है कि उन्हें जेल में जलाकर मार डाला गया। सागरमल गोपा का बलिदान जैसलमेर ही नहीं, समूचे राजस्थान के स्वाधीनता संग्राम की सबसे मार्मिक घटनाओं में गिना जाता है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जनजागृति का श्रेय | सागरमल गोपा |
| प्रजामंडल स्थापना | 15 दिसंबर 1945, जोधपुर (जैसलमेर में नहीं) |
| संस्थापक | मीठालाल व्यास |
| सागरमल गोपा बलिदान | अप्रैल 1946, जेल में |
⚠️ परीक्षा सावधानी: जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना का स्थान बार-बार गलत लिखा जाता है। ठीक से याद रखें — इसकी स्थापना जोधपुर में हुई थी, जैसलमेर में नहीं, ठीक वैसे ही जैसे बीकानेर प्रजामंडल कलकत्ता में और भरतपुर प्रजामंडल रेवाड़ी में स्थापित हुआ था।
🗺️ 4. शेष प्रजामंडल — संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण विवरण
बचे हुए प्रजामंडल आकार में भले छोटी रियासतों के हों, पर परीक्षा में इनसे जुड़े संस्थापक-नाम और तिथियाँ उतनी ही बारीकी से पूछी जाती हैं। इन्हें तालिका के ज़रिए एक नज़र में समेटना सबसे प्रभावी तरीका है।
| प्रजामंडल | स्थापना | संस्थापक/प्रमुख नेता | विशेष तथ्य |
|---|---|---|---|
| बूंदी प्रजामंडल | 1931 | श्री कांतिलाल | 1937 में अध्यक्ष ऋषिदत्त मेहता गिरफ़्तार होकर अजमेर भेजे गए; ब्रजसुंदर शर्मा ने नेतृत्व संभाला |
| बूंदी राज्य लोक परिषद | 1944 | ऋषिदत्त मेहता | बूंदी प्रजामंडल का ही उन्नत रूप |
| धौलपुर प्रजामंडल | 1936 | कृष्णदत्त पालीवाल, ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु | 1947 में राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में राजनीतिक सम्मेलन; “तासीमों कांड” की जाँच का आश्वासन मिला |
| करौली प्रजामंडल | 1938 (कुछ स्रोतों में अप्रैल 1939) | त्रिलोकचंद माथुर | चिरंजीलाल शर्मा, कुंवर मदनसिंह सहयोगी |
| किशनगढ़ प्रजामंडल | 1939 | कांतिलाल चौथानी | जमालशाह प्रथम अध्यक्ष |
| कुशलगढ़ प्रजामंडल | अप्रैल 1942 | भंवरलाल निगम | कन्हैयालाल सेठिया सहयोगी; बांसवाड़ा प्रजामंडल से अलग इकाई |
| बांसवाड़ा प्रजामंडल | 1943 | भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी | धूलजीभाई भावसर, मणिशंकर नागर सहयोगी |
| प्रतापगढ़ प्रजामंडल | 1945 | चुन्नीलाल, अमृतलाल | ठक्कर बापा की प्रेरणा से गठित |
| झालावाड़ प्रजामंडल | 25 नवंबर 1946 | मांगीलाल भव्य | कन्हैयालाल मित्तल, मकबूल आलम सहयोगी; राजस्थान का अंतिम प्रजामंडल; अपवादस्वरूप राजघराने का समर्थन प्राप्त था |
🔑 परीक्षा बिंदु: झालावाड़ प्रजामंडल (1946) राजस्थान का अंतिम प्रजामंडल था — यह जयपुर (प्रथम, 1931) का ठीक विपरीत छोर है। दोनों तथ्य साथ-साथ याद करें।
💡 अनुभवी टिप्पणी: झालावाड़ की एक बात अपवाद जैसी है — जहाँ बाकी रियासतों में राजपरिवार प्रजामंडल का दमन करता था, वहीं झालावाड़ में प्रजामंडल को राजघराने का काफी हद तक समर्थन प्राप्त था। यह विशिष्टता झालावाड़ को याद रखने का एक और सूत्र बन जाती है।
⚖️ 5. प्रजामंडल आंदोलन का महत्व, प्रभाव और एकीकरण में भूमिका
प्रजामंडल आंदोलन को केवल एक “विरोध आंदोलन” के रूप में देखना उसके साथ अन्याय होगा। असल में इसने आज़ाद भारत के राजस्थान को उसका पहला प्रशासनिक नेतृत्व दिया।
ज़रा गौर कीजिए — हीरालाल शास्त्री (जयपुर प्रजामंडल), माणिक्य लाल वर्मा (मेवाड़ प्रजामंडल), जयनारायण व्यास (मारवाड़ लोक परिषद), मोहनलाल सुखाड़िया (मेवाड़ प्रजामंडल का युवा कार्यकर्ता), भोगीलाल पंड्या (डूंगरपुर प्रजामंडल), गोकुलभाई भट्ट (सिरोही प्रजामंडल) — इनमें से लगभग हर नाम आज़ादी के बाद एकीकृत राजस्थान की किसी न किसी सरकार में मुख्यमंत्री, मंत्री या संविधान सभा सदस्य के रूप में दिखाई देता है। प्रजामंडल आंदोलन इसीलिए राजस्थान के आधुनिक राजनीतिक नेतृत्व की पहली पाठशाला मानी जाती है।
दूसरा बड़ा प्रभाव पड़ा एकीकरण की प्रक्रिया पर। जिन रियासतों में प्रजामंडल जितना मज़बूत था, वहाँ जनता उतनी ही तैयार खड़ी मिली जब एकीकरण की बात आई:
प्रजामंडल आंदोलन (1931-1946)
↓ (राजनीतिक चेतना व संगठित नेतृत्व तैयार)
मत्स्य संघ (18 मार्च 1948)
→ अलवर + भरतपुर + धौलपुर + करौली
→ राजधानी: अलवर | प्रधानमंत्री: शोभाराम कुमावत
↓
संयुक्त वृहद राजस्थान (15 मई 1949)
→ मत्स्य संघ + 18 रियासतें + 3 ठिकाने
→ प्रधानमंत्री: माणिक्य लाल वर्मा (मेवाड़ प्रजामंडल के संस्थापक)
↓
राजस्थान का पूर्ण एकीकरण (1956 तक चरणबद्ध)स्वतंत्रता के समय राजस्थान 19 रियासतों, 3 ठिकानों और 1 केंद्रशासित क्षेत्र (अजमेर-मेरवाड़ा) में बँटा था। पंडित जवाहरलाल नेहरू की सिफारिश पर संयुक्त वृहद राजस्थान के पहले प्रधानमंत्री बनाए गए माणिक्य लाल वर्मा — यही व्यक्ति जो कभी मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना के लिए राज्य से निर्वासन झेल चुका था। यह एक तरह से पूरे आंदोलन का प्रतीकात्मक समापन-बिंदु है: जिस संगठन को कभी “गैरकानूनी” घोषित किया गया था, उसी के संस्थापक को कुछ ही वर्षों बाद राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया गया।
🔑 परीक्षा बिंदु: RAS Mains जैसी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है — “प्रजामंडल आंदोलन ने राजस्थान के एकीकरण को कैसे सुगम बनाया?” उत्तर में इन तीन बिंदुओं को ज़रूर शामिल करें: (1) प्रशिक्षित राजनीतिक नेतृत्व तैयार करना, (2) जनता में राजनीतिक जागरूकता, (3) AISPC के ज़रिए राष्ट्रीय आंदोलन से सीधा जुड़ाव।
⚠️ 6. महत्वपूर्ण तुलनाएँ और सामान्य भ्रम
नीचे दी गई तुलना-सारणी उन तथ्यों को एक साथ रखती है, जिन्हें परीक्षा में जानबूझकर आपस में उलझाने के लिए पूछा जाता है।
| श्रेणी | उत्तर | ग़लत समझा जाने वाला विकल्प |
|---|---|---|
| प्रथम प्रजामंडल | जयपुर (1931) | शाहपुरा (यह प्रथम उत्तरदायी शासन है, प्रथम प्रजामंडल नहीं) |
| प्रथम उत्तरदायी शासन | शाहपुरा (1938) | जयपुर (यहाँ केवल एक व्यक्ति मंत्री बना, पूरा प्रजामंडल नहीं) |
| अंतिम प्रजामंडल | झालावाड़ (1946) | डूंगरपुर या जैसलमेर (ये 1944-45 के हैं, अंतिम नहीं) |
| राजस्थान से बाहर स्थापित | बीकानेर (कलकत्ता, 1936) | भरतपुर भी रेवाड़ी में बना, पर मानक उत्तर बीकानेर ही है |
| जोधपुर में बना पर नाम किसी और रियासत का | जैसलमेर प्रजामंडल | — |
| राजस्थान सेवा से जुड़े पर प्रजामंडल से नहीं | गोविंद गुरु (भगत/जनजातीय आंदोलन के नेता) | प्रजामंडल से जोड़ने की भूल आम है |
| कोटा में संस्थापक vs अध्यक्ष अलग | संस्थापक – नयनूराम शर्मा; अध्यक्ष – हाजी फैज़ मोहम्मद | दोनों को एक व्यक्ति समझ लिया जाता है |
⚠️ छात्र अक्सर एक और भूल करते हैं — वे मानते हैं कि हर प्रजामंडल की स्थापना उसी रियासत की धरती पर हुई होगी। जैसा हमने ऊपर देखा, कम से कम तीन प्रजामंडल (बीकानेर – कलकत्ता, भरतपुर – रेवाड़ी, जैसलमेर – जोधपुर) अपनी मूल रियासत से बाहर स्थापित हुए थे। यही बारीकी परीक्षा को कठिन बनाती है, और यही बारीकी याद रखने पर आपको बाकी छात्रों से आगे रखती है।
❓ PYQ — परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
RPSC RAS Pre — पैटर्न आधारित
Q. निम्नलिखित प्रजामंडलों को उनकी स्थापना के कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए: a. जयपुर प्रजामंडल b. मारवाड़ प्रजामंडल c. बीकानेर प्रजामंडल d. कोटा (हाड़ौती) प्रजामंडल
- (A) a, b, d, c
- (B) a, b, c, d ✓
- (C) b, a, c, d
- (D) a, d, b, c
व्याख्या: जयपुर (1931) → मारवाड़/हाड़ौती दोनों (1934, पर मारवाड़ पहले गिना जाता है) → बीकानेर (1936)। सही क्रम a, b, d, c भी माना जा सकता है क्योंकि मारवाड़ और हाड़ौती दोनों 1934 के हैं — प्रश्न में महीने की जानकारी न हो तो सामान्यतः पाठ्यक्रम में दिया क्रम ही मानक उत्तर होता है।
Rajasthan SI / Sub-Inspector पैटर्न
Q. मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना किस तिथि को हुई?
- (A) 17 अप्रैल 1946
- (B) 24 अप्रैल 1934
- (C) 24 अप्रैल 1938 ✓
- (D) 24 अप्रैल 1942
व्याख्या: मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को बलवंत सिंह मेहता के घर हुई थी। तारीख का “24 अप्रैल” हिस्सा सही है, इसलिए साल पर विशेष ध्यान दें — यह गलत विकल्प चुनवाने की क्लासिक तकनीक है।
Patwari / CET पैटर्न — Match the Column
सूची-I (प्रजामंडल) | सूची-II (संस्थापक)
(A) मेवाड़ प्रजामंडल | (1) भोगीलाल पंड्या
(B) डूंगरपुर प्रजामंडल | (2) गोकुलभाई भट्ट
(C) सिरोही प्रजामंडल | (3) मघाराम वैद्य
(D) बीकानेर प्रजामंडल | (4) माणिक्य लाल वर्मा
उत्तर: A-4, B-1, C-2, D-3REET / Forest Guard पैटर्न
Q. बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना किस स्थान पर हुई थी?
- (A) बीकानेर
- (B) जयपुर
- (C) कलकत्ता ✓
- (D) दिल्ली
व्याख्या: 4 अक्टूबर 1936 को कलकत्ता में रत्नाबाई ट्रस्ट भवन में मघाराम वैद्य की अध्यक्षता में इसकी स्थापना हुई थी।
RPSC School Lecturer / LDC पैटर्न
Q. “राजस्थान का गांधी” किसे कहा जाता है और उनका संबंध किस प्रजामंडल से था?
- (A) माणिक्य लाल वर्मा — मेवाड़
- (B) गोकुलभाई भट्ट — सिरोही ✓
- (C) भोगीलाल पंड्या — डूंगरपुर
- (D) जयनारायण व्यास — मारवाड़
Gram Sevak / Junior Accountant पैटर्न
Q. निम्नलिखित में से कौन सा युग्म सुमेलित नहीं है?
- (A) हाड़ौती प्रजामंडल – नयनूराम शर्मा
- (B) करौली प्रजामंडल – त्रिलोकचंद माथुर
- (C) बांसवाड़ा प्रजामंडल – भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी
- (D) झालावाड़ प्रजामंडल – माणिक्य लाल वर्मा ✓ (गलत युग्म — सही नाम मांगीलाल भव्य है)
🔑 परीक्षा बिंदु: ऐसे “कौन सा गलत है” वाले प्रश्नों में परीक्षक जानबूझकर किसी बड़े नाम (जैसे माणिक्य लाल वर्मा) को किसी छोटे प्रजामंडल के साथ चिपका देते हैं। नाम बड़ा होने का मतलब यह नहीं कि जोड़ी सही ही होगी — हमेशा तिथि व मूल रियासत से मिलान करें।
🗝️ स्मरणीय संकेत (Memory Tricks)
| विषय | ट्रिक |
|---|---|
| 1931 में बने प्रजामंडल | “जय-बूं” = जयपुर + बूंदी (दोनों 1931 के जुड़वाँ) |
| 1934 में बने प्रजामंडल | “मार-हाड़” = मारवाड़ + हाड़ौती |
| 1936 में बने प्रजामंडल | “बी-धौ” = बीकानेर + धौलपुर |
| 1938 का बड़ा झुंड | “मे-शा-अ-भ-क” = मेवाड़ + शाहपुरा + अलवर + भरतपुर + करौली (हरिपुरा अधिवेशन के बाद एक साथ बने पाँच) |
| बाहर स्थापित प्रजामंडल | “बी-भ-जै” = बीकानेर (कलकत्ता) + भरतपुर (रेवाड़ी) + जैसलमेर (जोधपुर) — “तीनों घर से बाहर जन्मे” |
| प्रथम व अंतिम का जोड़ा | “जय शुरू, झाला खत्म” = जयपुर पहला (1931), झालावाड़ आखिरी (1946) |
| तीनों गांधी उपाधि | गोकुलभाई भट्ट = राजस्थान का गांधी; भोगीलाल पंड्या = वागड़ का गांधी; जयनारायण व्यास = शेर-ए-राजस्थान (गांधी नहीं, पर साथ याद रखें) |
| कोटा में संस्थापक ≠ अध्यक्ष | “शर्मा जी ने बनाया, फैज़ साहब ने संभाला” — नयनूराम शर्मा संस्थापक, हाजी फैज़ मोहम्मद अध्यक्ष |
📚 Quick Revision Box
प्रजामंडल आंदोलन: 1927 (AISPC) से 1946 (झालावाड़) तक
उद्देश्य: राजा बना रहे, पर शासन उत्तरदायी हो
पृष्ठभूमि:
→ AISPC स्थापना: 1927
→ राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद, अजमेर: 1928
→ प्रथम अधिवेशन अजमेर: 1931 (अध्यक्ष रामनारायण चौधरी)
→ हरिपुरा अधिवेशन (सुभाषचंद्र बोस): 1938 — निर्णायक मोड़
स्थापना वर्षवार:
1931 → जयपुर (कर्पूरचन्द पाटनी+जमनालाल बजाज) | बूंदी (कांतिलाल)
1934 → मारवाड़ (भंवरलाल सर्राफ) | हाड़ौती (नयनूराम शर्मा)
1936 → बीकानेर (मघाराम वैद्य, कलकत्ता) | धौलपुर (कृष्णदत्त पालीवाल)
1938 → शाहपुरा | मेवाड़ (माणिक्य लाल वर्मा) | अलवर | भरतपुर | करौली
1939 → सिरोही (गोकुलभाई भट्ट) | किशनगढ़ (कांतिलाल चौथानी)
1942 → कुशलगढ़ (भंवरलाल निगम)
1943 → बांसवाड़ा (भूपेंद्रनाथ त्रिवेदी)
1944 → डूंगरपुर (भोगीलाल पंड्या)
1945 → जैसलमेर (मीठालाल व्यास, जोधपुर में) | प्रतापगढ़
1946 → झालावाड़ (मांगीलाल भव्य) — अंतिम प्रजामंडल
महत्वपूर्ण "प्रथम/अंतिम/एकमात्र":
→ प्रथम प्रजामंडल: जयपुर (1931)
→ प्रथम उत्तरदायी शासन: शाहपुरा (1938)
→ अंतिम प्रजामंडल: झालावाड़ (1946)
→ राज्य से बाहर स्थापित: बीकानेर-कलकत्ता, भरतपुर-रेवाड़ी, जैसलमेर-जोधपुर
→ राजघराने के समर्थन वाला अपवाद: झालावाड़
एकीकरण से जुड़ाव:
→ मत्स्य संघ: 18 मार्च 1948 (अलवर+भरतपुर+धौलपुर+करौली)
→ संयुक्त वृहद राजस्थान: 15 मई 1949
→ प्रथम प्रधानमंत्री: माणिक्य लाल वर्मा (मेवाड़ प्रजामंडल संस्थापक)
गांधी की उपाधि पाने वाले:
→ गोकुलभाई भट्ट = राजस्थान का गांधी (सिरोही)
→ भोगीलाल पंड्या = वागड़ का गांधी (डूंगरपुर)
बलिदान:
→ सागरमल गोपा (जैसलमेर) — 1946, जेल में शहादत
→ बालमुकुंद बिस्सा (मारवाड़) — 1942, भूख हड़ताल में मृत्यु
→ बीरबल हरिजन (बीकानेर) — रायसिंहनगर हत्याकांड, 1946प्रजामंडल आंदोलन क्या था और इसका मुख्य उद्देश्य क्या था?
प्रजामंडल का शाब्दिक अर्थ है ‘प्रजा का मंडल’ यानी जनता का संगठन। यह राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) की देशी रियासतों में 1920 से 1946 के बीच चला एक जन-आंदोलन था, जो ठिकानेदारों-जागीरदारों के अत्याचार और रियासती कुशासन के विरुद्ध खड़ा हुआ। इसका उद्देश्य था महाराजा या महारावल के नेतृत्व में ही सही, एक उत्तरदायी शासन (Responsible Government) स्थापित करना जो प्रजा के प्रति जवाबदेह हो। यह आंदोलन गांधीजी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की समानांतर धारा थी और अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) के मार्गदर्शन में संगठित हुआ। राजस्थान में यह आंदोलन 1931 में जयपुर प्रजामंडल की स्थापना से शुरू होकर 1946 तक चला, जिसमें लगभग हर प्रमुख रियासत में प्रजामंडल बना।
राजस्थान का पहला प्रजामंडल कौन सा था?
राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल जयपुर प्रजामंडल था, जिसकी स्थापना 1931 में कर्पूरचन्द पाटनी और जमनालाल बजाज (गांधीजी के पांचवें पुत्र कहे जाने वाले) के प्रयासों से हुई। शुरुआती वर्षों में जनसमर्थन की कमी और सरकारी अड़चनों के कारण यह लगभग 5 वर्ष तक निष्क्रिय रहा। 1936 में इसका पुनर्गठन हुआ — वनस्थली से हीरालाल शास्त्री को बुलाकर प्रधानमंत्री बनाया गया और चिरंजीलाल मिश्र सभापति बने। 1938 में जमनालाल बजाज अध्यक्ष बने और नाथमल कटला, जयपुर में इसका प्रथम अधिवेशन हुआ। 1942 में हीरालाल शास्त्री और दीवान मिर्जा इस्माइल के बीच हुए ‘जेंटलमैन एग्रीमेंट’ के विरोध में बाबा हरिश्चंद्र ने आज़ाद मोर्चा बनाया। परीक्षा में ‘राजस्थान का प्रथम प्रजामंडल’ पूछे जाने पर उत्तर सदैव जयपुर प्रजामंडल (1931) ही होता है।
मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना कब और किसने की?
मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना 24 अप्रैल 1938 को उदयपुर में हुई। इसकी योजना माणिक्य लाल वर्मा ने बनाई, जो पहले डूंगरपुर में भीलों के बीच रचनात्मक कार्य कर रहे थे। बलवंत सिंह मेहता के घर हुई इस स्थापना-बैठक में बलवंत सिंह मेहता प्रथम सभापति, भूरेलाल बया उपसभापति और स्वयं माणिक्य लाल वर्मा महामंत्री बनाए गए। इसका प्रथम अधिवेशन नवंबर 1941 में उदयपुर की शाहपुरा हवेली में माणिक्य लाल वर्मा की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें आचार्य जे.बी. कृपलानी और विजयलक्ष्मी पंडित शामिल हुए। 24 सितंबर 1938 को मेवाड़ राज्य ने प्रजामंडल को गैरकानूनी घोषित कर दिया था और 21 अगस्त 1942 को माणिक्य लाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता व मोहनलाल सुखाड़िया को गिरफ्तार किया गया। यह RAS परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य है।
बीकानेर प्रजामंडल राजस्थान के बाकी प्रजामंडलों से किस प्रकार अलग था?
बीकानेर प्रजामंडल राजस्थान का एकमात्र ऐसा प्रजामंडल था जिसकी स्थापना राज्य की सीमा से बाहर हुई — 4 अक्टूबर 1936 को कलकत्ता में रत्नाबाई ट्रस्ट भवन में, वहां रह रहे प्रवासी बीकानेरवासियों द्वारा। मघाराम वैद्य इसके अध्यक्ष बने, साथ में मुक्ताप्रसाद, रघुवरदयाल गोयल, स्वामी गोपालदास और सत्यनारायण सर्राफ जैसे नेता जुड़े। स्थापना के तुरंत बाद ही प्रमुख नेताओं को निर्वासित कर दिया गया। बाद में 22 जुलाई 1942 को रघुवरदयाल गोयल ने बीकानेर राज्य प्रजा परिषद का गठन किया, जिसका उद्देश्य महाराजा गंगासिंह के नेतृत्व में ही उत्तरदायी शासन स्थापित करना था। 1 जुलाई 1946 के रायसिंहनगर हत्याकांड में बीरबल हरिजन शहीद हुए। ध्यान रहे, भरतपुर प्रजामंडल भी रेवाड़ी (हरियाणा) में बना था, पर परीक्षा में मानक उत्तर ‘बीकानेर’ ही माना जाता है।
राजस्थान में सबसे पहले किस रियासत ने उत्तरदायी शासन स्थापित किया?
शाहपुरा राजस्थान की वह पहली रियासत थी जिसने उत्तरदायी शासन की स्थापना की। 18 अप्रैल 1938 को रमेशचंद्र औझा, लादूराम व्यास और अभयसिंह डांगी ने मेवाड़ प्रजामंडल के संस्थापक माणिक्य लाल वर्मा के सहयोग से शाहपुरा प्रजामंडल बनाया। खास बात यह है कि जयपुर में केवल एक व्यक्ति (देवीशंकर तिवाड़ी) को मंत्री बनाया गया था, जबकि शाहपुरा में पूरे प्रजामंडल को ही सत्ता सौंपी गई — यानी जनता का संगठन स्वयं शासन का हिस्सा बना। इसी कारण शाहपुरा को ‘प्रथम उत्तरदायी शासन वाली रियासत’ का दर्जा मिलता है, जबकि ‘प्रथम प्रजामंडल’ का दर्जा जयपुर (1931) को जाता है। परीक्षा में इन दोनों तथ्यों — प्रथम प्रजामंडल बनाम प्रथम उत्तरदायी शासन — को अक्सर आपस में उलझा दिया जाता है, इसलिए इन्हें अलग-अलग याद रखना चाहिए।
अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद का प्रजामंडल आंदोलन से क्या संबंध था?
अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (AISPC) की स्थापना 1927 में हुई, जिसका उद्देश्य देश की सभी रियासतों के प्रजामंडलों-लोक परिषदों को एक मंच पर संगठित करना था। राजपूताना क्षेत्र की इकाई — राजपूताना देशी राज्य लोक परिषद — 1928 में अजमेर में बनी, जिसका प्रथम अधिवेशन 1931 में अजमेर में रामनारायण चौधरी की अध्यक्षता में हुआ; इसी समय से राजस्थान में प्रजामंडल आंदोलनों का प्रारंभ माना जाता है। 1938 में सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन ने प्रजामंडलों को औपचारिक समर्थन दिया, जिसके बाद एक साथ कई रियासतों में प्रजामंडल बने। 1939 से 1946 तक पंडित जवाहरलाल नेहरू AISPC के अध्यक्ष रहे, और उदयपुर में हुए इसके 7वें अधिवेशन की अध्यक्षता भी उन्होंने ही की।
सिरोही में गोकुलभाई भट्ट और प्रजामंडल की क्या भूमिका रही?
गोकुलभाई भट्ट, जिन्हें ‘राजस्थान का गांधी’ कहा जाता है, का जन्म 19 फरवरी 1898 को सिरोही के हाथल गांव में हुआ था। सिरोही में प्रजामंडल का पहला प्रयास 1934 में बंबई में कुछ छात्रों ने किया था, पर वास्तविक संगठित रूप 22 जनवरी 1939 को मिला, जब गोकुलभाई भट्ट ने सात साथियों के साथ सिरोही प्रजामंडल की स्थापना की। वे 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय रहे और कई बार गिरफ्तार हुए। आज़ादी के बाद वे भारतीय संविधान सभा के सदस्य रहे और थोड़े समय के लिए सिरोही रियासत के मुख्यमंत्री भी बने। राजस्थान के एकीकरण के समय उन्होंने माउंट आबू को गुजरात में मिलाए जाने का प्रबल विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप माउंट आबू आज भी राजस्थान का हिस्सा है — यह उनकी सबसे स्मरणीय उपलब्धियों में से एक है।
प्रजामंडल आंदोलन का राजस्थान के एकीकरण में क्या योगदान रहा?
प्रजामंडल आंदोलन ने रियासती जनता में जो राजनीतिक चेतना और संगठन-क्षमता पैदा की, वही आगे चलकर राजस्थान के एकीकरण (1948-1956) की नींव बनी। जिन नेताओं ने प्रजामंडलों का नेतृत्व किया — हीरालाल शास्त्री, माणिक्य लाल वर्मा, जयनारायण व्यास, मोहनलाल सुखाड़िया, भोगीलाल पंड्या — वही आज़ादी के बाद एकीकृत राजस्थान की सरकारों में मुख्यमंत्री और मंत्री बने। 18 मार्च 1948 को अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर मत्स्य संघ बना, जो एकीकरण का प्रथम चरण था। 15 मई 1949 को मत्स्य संघ के विलय से संयुक्त वृहद राजस्थान बना। पंडित जवाहरलाल नेहरू की सिफारिश पर माणिक्य लाल वर्मा — जो मेवाड़ प्रजामंडल के संस्थापक रह चुके थे — संयुक्त राजस्थान के प्रधानमंत्री बनाए गए। इस तरह प्रजामंडल आंदोलन एक विरोध-आंदोलन के साथ-साथ आधुनिक राजस्थान के प्रशासनिक नेतृत्व की पाठशाला भी साबित हुआ।









