राजस्थान की संस्कृति में ‘लोक देवताओं’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये वे महापुरुष हैं जिन्होंने अपने अलौकिक कार्यों, गौ-रक्षा, समाज सुधार, और वचन-पालन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। ऐतिहासिक दृष्टि से, इन महापुरुषों का उदय मध्यकाल (विशेषकर 13वीं से 16वीं शताब्दी) के दौरान हुआ, जब विदेशी आक्रांताओं और स्थानीय सामंतों से सामान्य जनजीवन और पशुधन की रक्षा की आवश्यकता थी।
राजस्थान में लोक देवताओं को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में देखा जाता है:
- पीर (Pir): वे लोक देवता जिन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों समान श्रद्धा से पूजते हैं। (उदाहरण: रामदेव जी, गोगा जी)।
- जुझार/लोक देवता: वे योद्धा जिन्होंने धर्म, गायों या महिलाओं की रक्षा हेतु प्राण त्यागे।
भाग 1: मारवाड़ के पंच पीर (The Five Pirs of Marwar)
राजस्थान की लोक संस्कृति में पाँच ऐसे विशिष्ट लोक देवता हैं जिन्हें ‘पंच पीर’ कहा जाता है। इनके लिए एक प्रसिद्ध दोहा प्रचलित है:
“पाबू, हड़बू, रामदे, मांगलिया मेहा। पांचू पीर पधारजो, गोगाजी जेहा।।”
अर्थात्: पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और गोगाजी – ये मारवाड़ के पांच पीर माने जाते हैं। (नोट: तेजाजी पंच पीरों में शामिल नहीं हैं, यद्यपि वे अत्यंत लोकप्रिय हैं)।
1. बाबा रामदेव जी (Baba Ramdev Ji)
बाबा रामदेव जी को साम्प्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा देवता माना जाता है। वे मात्र एक योद्धा नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक भी थे।
- वंशावली एवं जन्म:
- जन्म: इनका जन्म बाड़मेर जिले की शिव तहसील के उण्डू-काश्मीर (Undu-Kashmir) गाँव में हुआ।
- तिथि: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (जिसे ‘बाबे री बीज’ कहा जाता है)।
- वंश: तंवर वंशीय राजपूत। इन्हें अर्जुन का वंशज माना जाता है।
- माता-पिता: पिता अजमल जी तंवर और माता मैणादे।
- पत्नी: नेतल दे (अमरकोट के दलै सिंह सोढा की पुत्री)।
- गुरु: योगी बालीनाथ जी (इनकी गुफा मसूरिया पहाड़ी, जोधपुर में स्थित है)।
- अवतार: हिन्दू इन्हें श्री कृष्ण (विष्णु) का अवतार मानते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय इन्हें ‘रामसा पीर’ के रूप में पूजता है।
- प्रमुख उपलब्धियाँ एवं सामाजिक सुधार:
- कामिड़या पंथ: रामदेव जी ने जातिगत छुआछूत को मिटाने के लिए ‘कामड़िया पंथ’ की स्थापना की।
- शुद्धि आंदोलन/जम्मा जागरण: समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने के लिए उन्होंने रात्रि जागरण (जम्मा) की परंपरा शुरू की।
- बहन: इन्होंने मेघवाल जाति की कन्या ‘डाली बाई’ को अपनी धर्म-बहन बनाया, जो सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
- कवि रूप: रामदेव जी एकमात्र ऐसे लोक देवता थे जो कवि भी थे। उनकी प्रसिद्ध रचना “चौबीस बाणियां” (24 Baniyan) है, जिसमें उनके उपदेश संग्रहित हैं।
- शब्दावली (Terminology):
- नेजा (Neja): रामदेव जी की पचरंगी या सफेद ध्वजा।
- पगल्ये (Paglya): इनके पद-चिन्ह, जिनकी मंदिरों में मूर्ति के स्थान पर पूजा की जाती है।
- रिखिया (Rikhia): मेघवाल जाति के भक्त।
- ब्यावले (Byavle): रामदेव जी के यशोगान में गाए जाने वाले लंबे लोकगीत (यह राजस्थानी लोक साहित्य का सबसे लंबा गीत माना जाता है)।
- जातरू (Jataru): रामदेवरा जाने वाले पैदल यात्री।
- प्रमुख मंदिर एवं मेले:
- मुख्य मंदिर: रामदेवरा (रुणीचा), पोकरण तहसील, जिला जैसलमेर।
- मेला: भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक। इसे ‘मारवाड़ का कुंभ’ कहा जाता है।
- अन्य मंदिर:
- छोटा रामदेवरा (गुजरात)।
- सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़)।
- बिराठिया (पाली/ब्यावर सीमा क्षेत्र)।
- मसूरिया पहाड़ी (जोधपुर)।
- तेरहताली नृत्य (Terah Tali Dance):
- यह नृत्य कामड़ जाति की महिलाओं द्वारा रामदेव जी के मेले में किया जाता है।
- यह एकमात्र ऐसा नृत्य है जो बैठकर किया जाता है। इसमें शरीर पर 13 मंजीरे बांधे जाते हैं।
- प्रसिद्ध नृत्यांगना: मांगी बाई (पादरला गाँव, पाली/उदयपुर)। यह एक व्यावसायिक श्रेणी का नृत्य है।
- विशेष तथ्य: इनका घोड़ा ‘लीला’ (Blue Horse) नाम से प्रसिद्ध है।
2. गोगा जी (Goga Ji)
गोगा जी को ‘सांपों के देवता’ और गौ-रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
- जन्म एवं वंशावली:
- जन्म: ददरेवा (जेवरग्राम), राजगढ़ तहसील, जिला चूरू।
- पिता: जेवर सिंह चौहान।
- माता: बाछल दे।
- गुरु: गोरखनाथ जी।
- ऐतिहासिक संदर्भ:
- गोगा जी ने अपने मौसेरे भाइयों (अर्जन और सर्जन) के साथ भूमि विवाद और महमूद गजनवी के आक्रमण के खिलाफ युद्ध किया।
- गायों की रक्षा करते हुए गजनवी से हुए युद्ध में इनके रण-कौशल को देखकर गजनवी ने इन्हें “जाहरपीर” (साक्षात देवता/Zinda Pir) की उपाधि दी।
- धार्मिक स्थल एवं वास्तुकला:
- शीर्ष मेड़ी (Sheesh Medhi): ददरेवा (चूरू), जहाँ युद्ध करते समय इनका शीष गिरा।
- धुर मेड़ी (Dhur Medhi) / गोगामेड़ी: नोहर तहसील, जिला हनुमानगढ़। यहाँ इनका धड़ गिरा था।
- निर्माण: इसका प्रारंभिक निर्माण फिरोजशाह तुगलक ने ‘मकबरेनुमा’ शैली में करवाया था। इसके मुख्य द्वार पर ‘बिस्मिल्लाह’ अंकित है।
- पुनर्निर्माण: वर्तमान स्वरूप बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने दिया (हिन्दू शैली में)।
- गोगा जी की ओल्डी: यह एक कच्चा मंदिर/झोपड़ी है जो सांचौर (पूर्व में जालौर जिले में, अब सांचौर जिला) के ‘किलोरियों की ढाणी’ में स्थित है।
- मेला एवं संस्कृति:
- मेला: भाद्रपद कृष्ण नवमी (गोगा नवमी)।
- पुजारी: यहाँ एक महीना हिन्दू पुजारी और 11 महीने मुस्लिम पुजारी (चायल वंश के) पूजा करते हैं।
- पशु मेला: गोगामेड़ी में राज्य का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला पशु मेला भरता है, जहाँ हरियाणवी नस्ल का व्यापार होता है।
- लोक मान्यता:
- “गाँव-गाँव खेजड़ी, गाँव-गाँव गोगो” – इनके थान (पूजा स्थल) खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते हैं।
- किसान हल जोतते समय हल और हाली (किसान) दोनों को ‘गोगा राखड़ी’ (नौ गांठों वाली राखी) बांधते हैं।
- वाद्य यंत्र: इनके गीतों में ‘डेरू’ और ‘मादल’ वाद्य यंत्र का प्रयोग होता है।
- सवारी: नीली घोड़ी (जिसे ‘गोगा बापा’ भी कहते हैं)।
3. पाबूजी (Pabu Ji)
पाबूजी राठौड़ को ‘ऊंटों के देवता’ और ‘प्लेग रक्षक’ के रूप में जाना जाता है।
- जन्म एवं परिचय:
- जन्म: कोलू/कोलू मण्ड (Kolu Mand)। वर्तमान में यह फलोदी जिले (पूर्व में जोधपुर) में आता है। समय: 1239 ई. (13वीं शताब्दी)।
- वंश: राठौड़ (राव सीहा के वंशज, धांधल जी राठौड़ के पुत्र)।
- माता: कमला दे।
- पत्नी: फूलमदे (सुप्यार दे), जो अमरकोट के सूरजमल सोढा की पुत्री थीं।
- प्रमुख घटना (बलिदान):
- पाबूजी का विवाह हो रहा था। फेरों के बीच में ही उन्हें सूचना मिली कि उनके बहनोई जिन्दराव खींची (जायल, नागौर) ने देवल चारणी की गायों का अपहरण कर लिया है।
- पाबूजी ने वचन निभाने के लिए विवाह को बीच में ही छोड़ दिया (साढ़े तीन फेरे ही लिए) और देचू गाँव (जोधपुर/फलोदी) में युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- सांस्कृतिक महत्व:
- ऊंट रक्षक: मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊंट (सांड) लाने का श्रेय पाबूजी को जाता है। ऊंट के बीमार होने पर पाबूजी की पूजा की जाती है।
- रेबारी/रायका जाति: ये पाबूजी को अपना आराध्य देव मानते हैं।
- पाबूजी की फड़ (Phad): यह राजस्थान की सबसे लोकप्रिय फड़ है। इसका वाचन नायक/आयड़ जाति के भोपे ‘रावणहत्था’ वाद्य यंत्र के साथ करते हैं।
- पाबूजी के पवाड़े (Pawade): ये पाबूजी के वीरगाथा गीत हैं, जिन्हें ‘माठ’ वाद्य यंत्र के साथ गाया जाता है।
- ग्रंथ: “पाबू प्रकाश” (रचयिता: आशिया मोड़जी)।
- प्रतीक चिन्ह: हाथ में भाला लिए हुए अश्वारोही और बाईं ओर झुकी हुई पाग।
- घोड़ी: केसर कालमी (यह घोड़ी देवल चारणी ने दी थी)।
- मेला: चैत्र अमावस्या को कोलू मण्ड (फलोदी) में।
4. हड़बू जी (Harbu Ji/Hadbu Ji)
हड़बू जी शकुन शास्त्र (Omenology) के ज्ञाता और भविष्यदृष्टा माने जाते हैं।
- परिचय:
- जन्म: भुण्डेल (नागौर)।
- वंश: सांखला राजपूत।
- संबंध: ये बाबा रामदेव जी के मौसेरे भाई थे और उन्हीं की प्रेरणा से बालीनाथ जी को गुरु बनाया।
- ऐतिहासिक महत्व: इन्होंने जोधपुर के संस्थापक राव जोधा को मंडोर विजय के लिए आशीर्वाद स्वरूप एक कटार और ‘फेंटा’ (पगड़ी) दिया था। मंडोर विजय के बाद जोधा ने इन्हें बेंगुटी (Bengti) गाँव प्रदान किया।
- मंदिर एवं पूजा:
- स्थान: बेंगुटी गाँव (वर्तमान में फलोदी जिला, पूर्व में जोधपुर)।
- विशिष्टता: इनके मंदिर में किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि उस ‘बैलगाड़ी’ (Wooden Cart) की पूजा होती है, जिससे वे पंगु (अपंग) गायों के लिए चारा लाया करते थे।
- पुजारी: सांखला राजपूत।
- वाहन: सियार (Jackal)।
5. मेहाजी मांगलिया (Meha Ji Mangaliya)
- परिचय: ये मांगलिया राजपूतों के इष्ट देव हैं। यद्यपि इनका जन्म पंवार वंश में हुआ था, लेकिन ननिहाल (मांगलिया गोत्र) में पालन-पोषण होने के कारण ये मेहाजी मांगलिया कहलाए।
- बलिदान: जैसलमेर के राव राणगदेव भाटी से गायों की रक्षा करते हुए युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
- मुख्य मंदिर: बापणी (Bapini) – वर्तमान में फलोदी जिला (पूर्व में जोधपुर)।
- घोड़ा: किरण काबरा (Kirad Kabra)।
- मेला: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी के दिन)।
- विशेष मान्यता: ऐसी मान्यता है कि इनके भोपो (पुजारियों) की वंश वृद्धि नहीं होती, वे गोद लेकर वंश चलाते हैं।
भाग 2: अन्य महत्वपूर्ण शूरवीर लोक देवता
6. वीर तेजा जी (Veer Teja Ji)
तेजाजी पंच पीरों में शामिल नहीं हैं, लेकिन राजस्थान के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय ‘जाट लोक देवता’ हैं।
- जन्म एवं जीवन:
- जन्म: 1073 ई. (माघ शुक्ल चतुर्दशी)।
- स्थान: खरनाल (नागौर)।
- वंश: धौलिया गोत्र के जाट।
- माता-पिता: ताहड़ जी और रामकुंवरी।
- पत्नी: पेमल दे (पनेर, अजमेर के रामचंद्र जाट की पुत्री)।
- बलिदान की गाथा:
- तेजाजी ने लाछां गूजरी (Lachha Gujari) की गायों को मेर (मीणा) लुटेरों से छुड़ाने के लिए भीषण युद्ध किया।
- वचनबद्धता के कारण, युद्ध के बाद वे वापस सांप (बांसक नाग) के पास आए जिसने उन्हें डसने का वचन लिया था।
- सेंदरिया (ब्यावर/अजमेर): यहाँ नाग ने तेजाजी को जीभ पर डसा।
- सुरसुरा (किशनगढ़, अजमेर): यहाँ तेजाजी वीरगति को प्राप्त हुए।
- उपनाम:
- काला और बाला के देवता (Deity of Snake and Guinea worm)।
- कृषि कार्यों के उपकारक देवता।
- गायों के मुक्तिदाता।
- धौलिया वीर।
- मुख्य स्थल एवं मेले:
- परबतसर (डीडवाना-कुचामन जिला/नागौर): यहाँ भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी) को राज्य स्तरीय पशु मेला भरता है। यह आय की दृष्टि से (पूर्व में) राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला रहा है।
- अन्य स्थल: ब्यावर, भावन्ता, सुरसुरा (सभी अजमेर/ब्यावर क्षेत्र में)।
- प्रतीक:
- हाथ में तलवार लिए अश्वारोही, जिसकी जीभ पर सांप डस रहा है।
- घोड़ी: लीलण (सिंगारी)।
- पुजारी: ‘घोडला’ (जो सांप के जहर को चूसकर बाहर निकालता है)।
- क्षेत्र: मुख्य कार्यक्षेत्र हाड़ौती और अजमेर रहा है।
7. देवनारायण जी (Devnarayan Ji)
ये गुर्जर जाति के आराध्य देव हैं और भगवान विष्णु का अवतार माने जाते हैं।
- परिचय:
- जन्म: आसिंद (भीलवाड़ा)।
- मूल नाम: उदय सिंह।
- माता-पिता: सवाई भोज और सेडू खटाणी।
- पत्नी: पीपल दे (धार, म.प्र. के शासक जयसिंह की पुत्री)।
- सांस्कृतिक महत्व:
- औषधि देवता: इन्होंने गोबर और नीम का औषधीय महत्व बताया। इनके मंदिर में ईंटों की पूजा होती है और नीम की पत्तियां चढ़ाई जाती हैं।
- देवनारायण जी की फड़: यह राजस्थान की सबसे लंबी, सबसे छोटी (चित्रों के आकार में) और सर्वाधिक प्राचीन फड़ है।
- डाक टिकट: 2 सितंबर 1992 को इनकी फड़ पर 5 रुपये का डाक टिकट जारी हुआ। (स्वयं देवनारायण जी पर 2011 में टिकट जारी हुआ)।
- वाद्य यंत्र: जंतर (Jantar)।
- प्रमुख मंदिर:
- सवाई भोज मंदिर – आसिंद (भीलवाड़ा)। (खारी नदी के तट पर)।
- देवधाम जोधपुरिया – निवाई (टोंक)।
- देवमाली – ब्यावर (अजमेर)।
- मेला: भाद्रपद शुक्ल सप्तमी।
- घोड़ा: लीलागर।
8. वीर कल्ला जी राठौड़ (Veer Kalla Ji)
- उपनाम: ‘चार हाथों वाले देवता’ (Four-armed Deity), शेषनाग का अवतार।
- इतिहास: 1567-68 ई. में अकबर के चित्तौड़ आक्रमण (तीसरा साका) के समय, कल्ला जी ने अपने ताऊ ‘जयमल राठौड़’ को अपने कंधों पर बैठाकर युद्ध किया था। मुगलों को लगा कि कोई चार हाथों वाला देवता युद्ध कर रहा है।
- गुरु: योगी भैरवनाथ।
- सिद्धि: ये योग और जड़ी-बूटियों के ज्ञाता थे।
- प्रमुख पीठ: रनेला (सलूम्बर/उदयपुर)। इनकी छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में भैरव पोल पर स्थित है।
- भुआ: प्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीरां बाई इनकी बुआ थीं।
9. मल्लिनाथ जी (Mallinath Ji)
- क्षेत्र: इन्होंने बाड़मेर क्षेत्र में राठौड़ साम्राज्य को सुदृढ़ किया। इन्हीं के नाम पर बाड़मेर के क्षेत्र को ‘मालाणी’ (Malani) कहा जाता है।
- प्रमुख मंदिर: तिलवाड़ा (बालोतरा जिला, पूर्व में बाड़मेर)। यह लूनी नदी के किनारे स्थित है।
- मेला: मल्लिनाथ पशु मेला (चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी)।
- यह राजस्थान का सबसे प्राचीन पशु मेला माना जाता है।
- यहाँ ‘थारपारकर’ और ‘कांकरेज’ नस्ल के पशुओं का क्रय-विक्रय होता है।
- पत्नी: रूपादे (इनका मंदिर भी पास में ही मालाजाल गाँव में है)। कुंडा पंथ की स्थापना मल्लिनाथ जी ने की थी।
10. अन्य लोक देवता
- तल्लीनाथ जी:
- मूल नाम: गागदेव राठौड़।
- स्थान: पांचोटा गाँव (जालौर)। यहाँ पंचमुखी पहाड़ी पर इनकी मूर्ति है।
- इन्हें ‘ओरण का देवता’ (Deity of Oran/Sacred Grove) कहा जाता है। इनके नाम पर छोड़े गए वनों (ओरण) से लकड़ी काटना वर्जित है।
- इन्होंने शेरगढ़ (जोधपुर) पर शासन किया। गुरु: जालंधरनाथ।
- डूंगजी – जवाहर जी (Dungji – Jawahar Ji):
- ये शेखावाटी (सीकर-झुंझुनूं) के लोक देवता हैं।
- रिश्ते में काका-भतीजा थे।
- ये 1857 की क्रांति के समय के स्वतंत्रता सेनानी माने जाते हैं। ये अमीरों और अंग्रेजों (नसीराबाद छावनी) को लूटकर धन गरीबों में बांटते थे (Robin Hood of Rajasthan)।
- मामादेव:
- इन्हें ‘बरसात का देवता’ (Rain God) कहा जाता है।
- इनका कोई मंदिर नहीं होता, बल्कि गाँव के बाहर लकड़ी का एक कलात्मक ‘तोरण’ (Toran) होता है।
- इन्हें खुश करने के लिए भैंसे की बलि दी जाती है।
- इलोजी:
- इन्हें ‘छेड़छाड़ के देवता’ कहा जाता है।
- होली के अवसर पर बाड़मेर/जैसलमेर में इनकी सवारी निकाली जाती है। ये होलिका के होने वाले पति माने जाते हैं।
- वीर बिग्गा जी:
- जन्म: रिड़ी (बीकानेर)।
- जाखड़ समाज के कुलदेवता।
- मुस्लिम लुटेरों से गायों की रक्षा करते हुए शहीद हुए।
- पनराज जी:
- जैसलमेर के काठौड़ी गाँव के ब्राह्मणों की गायें बचाते हुए वीरगति पाई।
- मंदिर: पनराजसर (जैसलमेर)।
- भोमिया जी:
- हर गाँव में भूमि रक्षक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। (उदाहरण: नाहर सिंह भोमिया – जयपुर)।
- देव बाबा:
- नगला जहाज (भरतपुर)।
- ग्वालों के देवता/पशु चिकित्सक देवता।
- मेला: भाद्रपद शुक्ल पंचमी और चैत्र शुक्ल पंचमी।
भाग 3: परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य और प्रश्नोत्तर (Key Academic Facts & Q&A)
नीचे दी गई सूची में तथ्यों को अद्यतन (updated) और वन-लाइनर (One-liner) प्रारूप में प्रस्तुत किया गया है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं:
- जन्म और कर्म स्थली (नागौर): नागौर जिला राजस्थान के लोक देवताओं और संतों का केंद्र रहा है। तेजाजी, हड़बूजी, कल्ला जी, जाम्भोजी, दरियाव जी, और मीरां बाई का संबंध नागौर से है। इसे भक्ति और शक्ति का संगम स्थल कहते हैं।
- राज्य क्रांति के जनक: देवनारायण जी को लोक देवताओं में राज्य क्रांति का जनक माना जाता है।
- सांपों के देवता:
- गोगा जी और तेजाजी (मुख्य रूप से)।
- हरिराम जी (झोरड़ा, नागौर) – इनके मंदिर में सांप की बांबी (बिल) की पूजा होती है।
- केसरिया कुंवर जी (गोगा जी के पुत्र) – इनके थान पर सफेद ध्वजा फहराई जाती है।
- पुस्तकें/साहित्य:
- चौबीस बाणियां: बाबा रामदेव जी।
- पाबू प्रकाश: आशिया मोड़जी।
- जालंधर नाध: तल्लीनाथ जी के गुरु।
- संत संप्रदाय तथ्य:
- संत रैदास: रामानन्द जी के शिष्य और मीरां बाई के आध्यात्मिक गुरु। इनकी छतरी चित्तौड़गढ़ दुर्ग में है।
- संत पीपा: गागरोन (झालावाड़) के शासक थे। दर्जी समुदाय के आराध्य देव। गुफा: टोडा (टोंक), मंदिर: समदड़ी (बालोतरा)।
- दादू दयाल: ‘राजस्थान का कबीर’। मुख्य पीठ: नरेना (जयपुर ग्रामीण)।
- जांभोजी (विश्नोई संप्रदाय): जन्म पीपासर (नागौर)। मुख्य धाम: मुकाम-तालवा (नोखा, बीकानेर)। इन्होंने पर्यावरण रक्षा हेतु 29 नियम दिए।
- जसनाथ जी: कतरियासर (बीकानेर)। अग्नि नृत्य (Fire Dance) इनके सिद्ध भक्तों द्वारा किया जाता है। 36 नियम।
- आलम जी: बाड़मेर (अब बालोतरा क्षेत्र) के धोरीमन्ना क्षेत्र में आलम जी का धोरा स्थित है, जिसे ‘घोड़ों का तीर्थ स्थल’ कहते हैं।
- मांगलिया मेहाजी का घोड़ा: किरड़ काबरा।
- देवनारायण जी का घोड़ा: लीलागर।
- तेजाजी की घोड़ी: लीलण।
- पाबूजी की घोड़ी: केसर कालमी।
- गोगाजी की घोड़ी: नीली घोड़ी (गोगा बापा)।
- रामदेव जी का घोड़ा: लीला घोड़ा (Revat)।
अद्यतन जिले (Updated District Mappings for Exams):
- गोगा जी की ओल्डी: सांचौर (पहले जालौर)।
- पाबूजी का जन्म (कोलू): फलोदी (पहले जोधपुर)।
- हड़बूजी का मंदिर (बेंगुटी): फलोदी (पहले जोधपुर)।
- मल्लीनाथ जी (तिलवाड़ा): बालोतरा (पहले बाड़मेर)।
- तेजाजी (परबतसर): डीडवाना-कुचामन (पहले नागौर) – नोट: प्रशासनिक सीमाओं के अंतिम निर्धारण तक इसे नागौर/डीडवाना दोनों संदर्भ में देखें।
निष्कर्ष: राजस्थान के लोक देवता केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे त्याग, बलिदान, पर्यावरण संरक्षण, नारी सम्मान और सामाजिक समरसता के ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। अकादमिक दृष्टि से, इनका अध्ययन राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास और समाजशास्त्र को समझने के लिए अनिवार्य है।
