राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय / राजपूत युग

Table of Contents

राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय

हर्षवर्धन की मृत्यु (648 ई.) के पश्चात से लेकर मुहम्मद गौरी द्वारा भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206 ई.) तक की समयावधि भारतीय इतिहास में राजपूत काल के रूप में विख्यात है। इस महत्वपूर्ण कालखंड में, राजस्थान के भू-भाग पर अनेक राजपूत वंशों ने अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की, जिनमें गुर्जर-प्रतिहार, चौहान, गुहिल, परमार, चालुक्य तथा राठौड़ प्रमुख थे। इन राजपूत वंशों की उत्पत्ति का विषय आज भी इतिहासकारों के मध्य विवाद का एक मौलिक बिंदु बना हुआ है। इनकी उत्पत्ति से संबंधित विभिन्न मतों को मुख्य रूप से पौराणिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोणों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

राजपूतों की उत्पत्ति

राजस्थान में राजपूत युग (7वीं-12वीं शताब्दी) हर्षवर्धन के पतन के बाद शुरू हुआ, जिसमें गुहिल (मेवाड़), राठौड़ (मारवाड़), चौहान (अजमेर/शाकम्भरी), कछवाहा (आमेर/जयपुर), और प्रतिहार जैसे प्रमुख वंशों का उदय हुआ, जिन्होंने सामंतवादी व्यवस्था में आपस में लड़ते हुए किलों, महलों और समृद्ध कला-संस्कृति का निर्माण किया, हालाँकि इस युग को कुछ इतिहासकार महिलाओं की दयनीय स्थिति और बहुविवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के कारण "अंधकार युग" भी कहते हैं
राजस्थान में राजपूत वंशों का उदय / राजपूत युग

राजपूताना के वृहद इतिहास के परिप्रेक्ष्य में, राजपूतों की उत्पत्ति से जुड़े विविध सिद्धांतों का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अग्निकुण्ड से उत्पत्ति:

राजपूतों के विशुद्ध वंश से उद्भव होने के मत को सशक्त करने हेतु उन्हें अग्निवंशीय होने का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। इस अवधारणा का प्राथमिक और प्रथम स्रोत चन्दबरदाई के विख्यात ग्रन्थ ‘पृथ्वीराजरासो’ में मिलता है। इसके कथानक के अनुसार, राजपूतों के चार प्रमुख वंश—प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान—की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ कुण्ड से असुरों का विनाश करने के उद्देश्य से हुई थी। इस आख्यान का प्रचार-प्रसार 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य भाटों द्वारा व्यापक रूप से किया गया। मुहणोत नैणसी तथा सूर्यमल्ल मिश्रण ने इसी आधार को ग्रहण कर इसे और अधिक विस्तार के साथ प्रस्तुत किया। यद्यपि, ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना तार्किक प्रतीत नहीं होता, क्योंकि यह सम्पूर्ण कथानक काल्पनिक एवं अव्यावहारिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई, ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति के माध्यम से यह अभिव्यक्त करना चाहते थे कि जब विदेशी शक्तियों से संघर्ष की आवश्यकता उत्पन्न हुई, तो इन चार वंशों के राजपूतों ने शत्रुओं का सामना करने के लिए स्वयं को संगठित एवं तत्पर किया। गौरीशंकर हीराचंद ओझा, सी.वी. वैद्य, दशरथ शर्मा तथा ईश्वरी प्रसाद जैसे उल्लेखनीय इतिहासकारों ने इस मत को पूर्णतः निराधार माना है।

प्राचीन क्षत्रियों से उत्पत्ति:

पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा राजपूतों को प्राचीन सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय क्षत्रियों का वंशज मानते हैं। अपने मत की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए उन्होंने अनेक शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों से साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, जिनके आधार पर उनकी यह मौलिक मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों की ही संतानें हैं। राजपूतों की उत्पत्ति से संबंधित यह मत वर्तमान में सर्वाधिक स्वीकृत और लोकप्रिय है।

READ ALSO  राजस्थान के लोकदेवता: वीर तेजाजी

विदेशी उत्पत्ति सिद्धान्त:

राजपूताना के प्रख्यात इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन वंश का बताया है। इस सिद्धान्त के प्रमाणस्वरूप उन्होंने उन अनेक प्रचलित रीति-रिवाजों का उल्लेख किया है, जो शक जाति की परंपराओं से समानता दर्शाते थे। इन रिवाजों में सूर्योपासना, सती प्रथा का प्रचलन, अश्वमेध यज्ञ का आयोजन, मद्यपान, तथा शस्त्रों एवं अश्वों की पूजा आदि प्रमुख हैं। टॉड की कृति के संपादक, विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया है। तथापि, इस विदेशी वंश के सिद्धान्त का गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने तार्किक रूप से खंडन किया है। ओझा का तर्क है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रस्म-रिवाजों में जो समानता कर्नल टॉड ने इंगित की है, वह राजपूतों द्वारा विदेशियों से ग्रहण नहीं की गई है, अपितु उनकी जड़ें वैदिक तथा पौराणिक समाज एवं संस्कृति में खोजी जा सकती हैं। अतः, उनका यह मानना है कि शक, कुषाण या हूणों के जिन-जिन रीति-रिवाजों व परंपराओं का उल्लेख समानता दर्शाने हेतु जेम्स टॉड ने किया है, वे भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही विद्यमान थीं। उनका संबंध इन विदेशी जातियों से स्थापित करना तर्कसंगत नहीं है।

डॉ. डी. आर. भंडारकर राजपूतों को गुर्जर मानकर उनका संबंध श्वेत-हूणों से स्थापित करते हैं, जिससे विदेशी वंशीय उत्पत्ति के सिद्धान्त को और अधिक बल मिलता है। इसकी पुष्टि में वे तर्क देते हैं कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशी जातियों के संदर्भ में किया गया है। इसी आधार पर उनका मानना है कि अग्निवंशीय प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान भी मूलतः गुर्जर थे, क्योंकि राजोर अभिलेख में प्रतिहारों के लिए ‘गुर्जर’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त, भंडारकर ने बिजौलिया शिलालेख को आधार बनाकर कुछ राजपूत वंशों की उत्पत्ति ब्राह्मणों से मानी है। वे चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों का उद्भव नागर ब्राह्मणों से मानते हैं। डॉ. ओझा एवं वैद्य ने भंडारकर की मान्यताओं को अस्वीकृत करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना उनकी जाति का सूचक नहीं, बल्कि गुजरात प्रदेश पर उनके शासन के कारण है। जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी साक्ष्य-रहित है, क्योंकि इस मत के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्य केवल कुछ शब्दों के राजपूतों के साथ प्रयोग होने तक ही सीमित हैं।

READ ALSO  राजस्थान के मेले एवं उत्सव

मिश्रित वंश का सिद्धान्त:

आधुनिक इतिहासकार एक महत्वपूर्ण मिश्रित वंश के सिद्धान्त को भी मान्यता देते हैं। इस मत के अनुसार, राजपूत न तो पूर्ण रूप से प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं और न ही पूर्ण रूप से विदेशी। यह माना जाता है कि राजपूत वर्ग का निर्माण एक सामाजिक प्रक्रिया के तहत हुआ, जिसमें प्राचीन क्षत्रिय कुलों के साथ-साथ विदेशी आक्रांता (जैसे शक, हूण, कुषाण) और कुछ स्थानीय भारतीय जनजातियाँ भी शामिल हुईं, जिन्होंने समय के साथ हिन्दू धर्म अपनाकर और क्षत्रिय परंपराओं का पालन कर स्वयं को राजपूत वर्ग में स्थापित कर लिया। यह सिद्धान्त विभिन्न मतों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है।

इस प्रकार, राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में उपर्युक्त मतों में सर्वसम्मति का अभाव है। फिर भी, डॉ. ओझा के प्राचीन क्षत्रिय वंशज वाले मत को सामान्यतः सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। निःसंदेह, राजपूतों को मूलतः भारतीय मानना ही सर्वाधिक युक्तिसंगत है।

पूर्व मध्यकाल में विभिन्न राजपूत राजवंशों का उदय

प्रारंभिक राजपूत कुलों में, जिन्होंने राजस्थान में अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए थे, उनमें मेवाड़ के गुहिल, मारवाड़ के गुर्जर-प्रतिहार और राठौड़, सांभर के चौहान, आबू के परमार, आम्बेर के कछवाहा, तथा जैसलमेर के भाटी अत्यंत प्रमुख थे।

rajput history in hindiमेवाड़ के गुहिल: इस वंश के संस्थापक आदिपुरुष गुहिल थे। इसी कारण इस वंश के राजपूतों ने जहाँ भी अपने राज्य स्थापित किए, वे गुहिलवंशीय कहलाए। गौरीशंकर हीराचंद ओझा गुहिलों को विशुद्ध सूर्यवंशीय क्षत्रिय मानते हैं, जबकि डी. आर. भंडारकर के अनुसार मेवाड़ के शासक मूलतः ब्राह्मण थे।

मारवाड़ के गुर्जर-प्रतिहार: ऐसा अनुमान है कि प्रतिहारों द्वारा अपने राज्य की स्थापना सर्वप्रथम राजस्थान के भू-भाग पर ही की गई थी। जोधपुर से प्राप्त शिलालेख यह प्रमाणित करते हैं कि प्रतिहारों का निवास मारवाड़ क्षेत्र में लगभग छठी शताब्दी के द्वितीय चरण में स्थापित हो चुका था। चूँकि उस काल में राजस्थान का यह क्षेत्र ‘गुर्जरत्रा’ कहलाता था, इसी कारण चीनी यात्री ह्वेनसांग (युवानच्वांग) ने गुर्जर राज्य की राजधानी का नाम ‘पी-लो-मो-लो’ (भीनमाल) अथवा बाड़मेर के निकट का क्षेत्र बताया है। मुहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का वर्णन किया है, जिनमें मंडौर के प्रतिहार सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे।

READ ALSO  राजस्थान में 1857 की क्रांति

मारवाड़ के राठौड़: राठौड़ वंश ने 13वीं शताब्दी में मारवाड़ में अपनी सत्ता स्थापित की। वे स्वयं को कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद का वंशज मानते हैं। राव सीहा को मारवाड़ के राठौड़ वंश का संस्थापक माना जाता है। इस वंश के उल्लेखनीय शासकों में राव जोधा, जिन्होंने जोधपुर की स्थापना की, और मालदेव तथा महाराजा जसवंत सिंह शामिल थे।

आबू के परमार: ‘परमार’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘शत्रु का नाश करने वाला’ होता है। आरंभ में परमार आबू के समीपवर्ती क्षेत्रों में निवास करते थे। किंतु, प्रतिहारों की शक्ति के पतन के साथ ही परमारों का राजनीतिक प्रभुत्व बढ़ने लगा। क्रमशः इन्होंने मारवाड़, सिंध, गुजरात, वागड़, और मालवा जैसे क्षेत्रों में अपने राज्य स्थापित कर लिए। आबू के परमारों के कुल पुरुष धूमराज थे, परंतु इस वंश की सुव्यवस्थित वंशावली उत्पलराज से आरंभ होती है।

सांभर के चौहान: चौहानों के मूल स्थान के संबंध में यह मान्यता है कि वे सपादलक्ष (सांभर) और जांगल प्रदेश (बीकानेर के निकट) के आसपास निवास करते थे। उनकी प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (आधुनिक नागौर) थी। सपादलक्ष के चौहान वंश के आदि पुरुष वासुदेव थे, जिनका समय लगभग 551 ई. अनुमानित किया गया है। बिजौलिया प्रशस्ति में वासुदेव को सांभर झील का निर्माता माना गया है। इसी प्रशस्ति में चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण भी बताया गया है।

आम्बेर के कछवाहा: यह राजवंश स्वयं को भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज मानता है। 12वीं शताब्दी में दुल्हेराय ने दौसा के आस-पास के क्षेत्र में कछवाहा वंश की नींव रखी। बाद में, काकिल देव ने आम्बेर (आमेर) को अपनी राजधानी बनाया, जो इस वंश का प्रमुख केंद्र बना।

जैसलमेर के भाटी: भाटी राजपूत स्वयं को चंद्रवंशीय मानते हैं और भगवान कृष्ण से अपना संबंध जोड़ते हैं। इस वंश की स्थापना 12वीं शताब्दी में जैसल भाटी ने की थी, जिन्होंने जैसलमेर दुर्ग का निर्माण करवाया और इसे अपनी राजधानी बनाया।

Picture of StudyHub Content Team

StudyHub Content Team

At StudyHub, our team includes subject experts and exam-qualified educators with hands-on experience across SSC, Railways, State PSCs, and other major competitive exams. With their deep understanding of varied exam patterns and syllabi, they create content that is clear, to the point, reliable, and genuinely helpful for aspirants.
Their aim is to make even the toughest topics easy to understand and directly useful for your exam preparation—whether it's Current Affairs, General Studies, Reasoning, Quantitative Aptitude, or any subject-specific area. Every note, article, and test is designed to save your time and boost your performance, no matter which competitive exam you're preparing for.

Leave a Reply

Scroll to Top