प्राचीन सभ्यताएँ

Table of Contents

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ

  • कालखंड का वर्गीकरण: मानव इतिहास को समझने के लिए प्रागैतिहासिक, आद्यऐतिहासिक, और ऐतिहासिक तीन प्रमुख कालों में विभाजित किया गया है।
  • उत्पत्ति का केंद्र: राजस्थान में मानव सभ्यता के प्राचीनतम साक्ष्य मुख्य रूप से नदी घाटियों (घग्घर, बनास, लूनी, कांतली) के किनारे पाए गए हैं।
  • ताम्रयुगीन जननी: गणेश्वर सभ्यता (2800 ईसा पूर्व) को उसकी असाधारण प्राचीनता और प्रचुर तांबे के कारण ‘भारत में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ माना जाता है।
  • कृषि क्रांति: भीलवाड़ा की बागौर सभ्यता से कृषि और पशुपालन के भारत में सबसे प्राचीनतम् साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • सिंधु घाटी की तीसरी राजधानी: कालीबंगा को पुरातत्वविद् दशरथ शर्मा द्वारा सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी की उपाधि दी गई है, जहां विश्व का सबसे पहला जुता हुआ खेत और भूकंप के साक्ष्य मिले हैं।
  • मौर्य और बौद्ध धर्म: बैराठ (विराटनगर) मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों और गोल बौद्ध मंदिर (भारत के प्राचीनतम्) के अवशेषों का केंद्र रहा है।
  • प्राचीन टाटानगर: रैढ़ (टोंक) पुरास्थल को ‘प्राचीन राजस्थान का टाटानगर’ कहा जाता है, जहां एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार (3075 पंचमार्क सिक्के) मिला है।
राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ
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इतिहास का मौलिक वर्गीकरण

ऐतिहासिक अभिलेखों के गहन अध्ययन के लिए, मानव इतिहास को तीन सुस्पष्ट और मूलभूत कालों में वर्गीकृत किया जाता है: प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period), आद्यऐतिहासिक काल (Proto-historic Period), और ऐतिहासिक काल (Historic Period)।

प्रागैतिहासिक काल:

प्रागैतिहासिक काल, जो कि मानवता के उद्भव का आरंभिक चरण है, से यह तात्पर्य है कि उस युग के मनुष्यों के जीवन, संस्कृति, और विकास के विषय में कोई भी पठनीय लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है। इसके बजाय, इस कालखंड के इतिहास और सभ्यता का पुनर्निर्माण पूर्णतया पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त साक्ष्यों (जैसे कि औजार, आवास स्थल, और कलाकृतियों) के गहन विश्लेषण के आधार पर ही संभव हो पाया है।

आद्यऐतिहासिक काल:

जिन प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों का आकलन केवल भौतिक पुरावशेषों पर निर्भर करता है, उन्हें ही प्रागैतिहासिक काल के अंतर्गत रखा जाता है। इसके विपरीत, आद्यऐतिहासिक काल वह संक्रमणकारी चरण है, जब मानव समाज लेखन कला से तो परिचित हो चुका था और उसने अभिलेख भी छोड़े, किंतु विद्वानों द्वारा उन लिपियों को अभी तक सफलतापूर्वक पढ़ा नहीं जा सका हैसिन्धु घाटी सभ्यता, अपनी जटिल लेखन प्रणाली के बावजूद, इसी कालखंड का एक प्रमुख उदाहरण है।

ऐतिहासिक काल:

अंतिम चरण, ऐतिहासिक काल, तब आरंभ होता है जब मानव के जीवन, शासन, और समाज के विषय में पठन योग्य लिखित सामग्री का व्यवस्थित रूप से मिलना प्रारंभ हो जाता है, जिसका सबसे प्राचीन और प्रामाणिक उदाहरण वैदिक काल की साहित्यिक परंपराएँ हैं।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ की उत्पत्ति और उनके प्राचीनतम साक्ष्य ऐतिहासिक रूप से नदी घाटियों और उनके उपजाऊ तटों के निकट ही प्रचुरता से पाए गए हैं, क्योंकि जल स्रोत ही आदिम मानव बस्तियों के पोषण और स्थायित्व का मुख्य आधार थे।

राजस्थान का पाषाणकाल:

इस भूखंड पर आदिम मानव द्वारा निर्मित और प्रयुक्त किए गए जो प्राचीनतम् पाषाण उपकरण उपलब्ध हुए हैं, पुरातात्विक आकलन के अनुसार उनकी प्राचीनता लगभग डेढ़ लाख वर्ष पूर्व तक की निर्धारित की गई है। यद्यपि, यह भी एक अकाट्य पुरातात्विक संभावना है कि इस प्राचीन भूखण्ड पर मानव सभ्यता का प्रादुर्भाव इस अवधि से भी अधिक पूर्व में हो सकता है। ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार, राजस्थान में मानव सभ्यता अनिवार्य रूप से पुरापाषाण काल (Palaeolithic), मध्य पाषाण काल (Mesolithic), और उत्तर पाषाण काल (Neolithic) के तीन क्रमिक चरणों से होकर गुजरी है।

पुरापाषाण काल:

पुरापाषाण काल का विस्तृत ऐतिहासिक दायरा दस लाख वर्ष पूर्व से आरंभ होकर लगभग दस हजार वर्ष पूर्व तक के विशाल कालखंड को समाहित करता है।

  • प्रारंभिक खोज: इस काल के महत्वपूर्ण पुरातात्विक अनुसंधान में, सन् 1870 में, सी.ए. हैकट महोदय ने जयपुर और इन्दरगढ़ जैसे क्षेत्रों से पुरापाषाणकालीन हस्तनिर्मित उपकरण, जिनमें ‘हैण्डएक्स’, ‘एश्यूलियन’ (एक विशिष्ट उपकरण परंपरा), और ‘क्लीवर’ (विदारक) शामिल थे, को सफलतापूर्वक खोज निकाला। ये महत्वपूर्ण कलाकृतियाँ आज भी भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता में सावधानीपूर्वक संरक्षित हैं।
  • सर्वेक्षण का आरंभ: राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण की आधारशिला सर्वप्रथम 1871 ईस्वी में रखी गई, और इसका संपूर्ण श्रेय ए.सी.एल. कार्लाइल जैसे अग्रणी पुरातत्वविद् को दिया जाता है। कार्लाइल ने दौसा क्षेत्र के उत्खनन के माध्यम से कठोर पाषाण उपकरणों के साथ-साथ प्राचीन मानव अस्थियों की प्राप्ति की महत्वपूर्ण सूचना भी प्रदान की। इसके कुछ ही समय पश्चात, एक अन्य शोधकर्ता, श्री सेटनकार को झालावाड़ जिले के भूभाग से भी उसी पुरापाषाण कालखंड से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण उपकरण प्राप्त हुए।
  • आधुनिक योगदान: आधुनिक पुरातात्विक अनुसंधान के तहत, पिछले दो दशकों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली, और डेक्कन कॉलेज, पूना (विशेषकर श्री वीरेन्द्रनाथ मिश्र), साथ ही पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान (जिसमें श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल, विजयकुमार, और हरिश्चन्द्र मिश्रा जैसे विद्वान शामिल थे) ने इस विशिष्ट प्रागैतिहासिक संस्कृति को व्यवस्थित रूप से उद्घाटित करने में एक असाधारण और महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। विशिष्ट रूप से, सन् 1971 से 1976 के मध्य डॉ. आल्चिन, ए.एस. गाउडी, और के.टी.एम. हेगड़े ने अजमेर के बूढ़ा पुष्कर और जैसलमेर जैसे शुष्क क्षेत्रों में मध्य पाषाणकाल के उपकरणों की व्यापक खोज की। इसी अनुक्रम में, पश्चिमी राजस्थान के विस्तृत भूभाग में, विशेषकर लूनी नदी के किनारों पर, और श्रीमती बी. ऑलचिन ने जालौर जिले के बालू के टीलों के नीचे से भी पाषाणयुगीन आदिम उपकरण सफलतापूर्वक खोज निकाले हैं।
  • शैल आश्रय: पुरातात्विक महत्व के स्थल विराट नगर में कुछ महत्वपूर्ण प्राकृतिक गुफाएँ और शैलाश्रय (पत्थर के आश्रय स्थल) खोजे गए हैं, जो प्रारंभिक पाषाण काल से लेकर उत्तर पाषाण काल तक की एक निरंतर सांस्कृतिक श्रृंखला की सामग्री प्रदान करते हैं। हालाँकि, इन विराटनगर के आश्रयों में शैल चित्रों का अभाव पाया जाता है, जबकि इसके विपरीत, भरतपुर जिले में स्थित ‘दर’ नामक ऐतिहासिक स्थान से कुछ असाधारण चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं। इन शैलाश्रयों में प्रमुख रूप से मानवाकृति, व्याघ्र (बाघ), बारहसिंगा, और सूर्य जैसे मौलिक विषयों का कलात्मक अंकन किया गया है।
  • जीवनशैली: पुरापाषाणकालीन मानव की आजीविका पूर्णतया शिकार पर आधारित थी, और उसके आहार में वन्य पशुओं का मांस, प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कन्द-मूल, फल, पक्षी, और मछली जैसे खाद्य पदार्थ सम्मिलित थे। यह एक महत्वपूर्ण प्रगति थी कि इस कालखंड के मानव ने आग जलाना और उसका नियंत्रित उपयोग करना सीख लिया था, किंतु वह अभी भी पहिये के आविष्कार और उसके उपयोग की अवधारणा से पूर्णतः अपरिचित था।
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प्राचीन सभ्यताएँ
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मध्यपाषाण काल:

मध्यपाषाण काल, जो कि लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व के काल से आरंभ हुआ, एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल को दर्शाता है।

  • उपकरण: इस युग के पाषाण उपकरणों में ‘स्क्रेपर’ (खुरचनी) और ‘पाइंट’ (नुकीले औजार) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, क्योंकि वे पहले के भारी औजारों की तुलना में आकार में सूक्ष्म और अधिक परिष्कृत थे।
  • स्थल: इन सूक्ष्म औजारों के पुरातात्विक प्रमाण लूनी नदी और उसकी सहायक नदियों की घाटियों में, चित्तौड़गढ़ जिले की बेड़च नदी की घाटी में, और विराटनगर से भी प्राप्त हुए हैं।
  • प्रगति: इस चरण तक आदिम मानव ने पशुपालन की प्रारंभिक कला को आत्मसात कर लिया था, जिससे उसकी जीवनशैली में स्थायित्व आया, परंतु वह अभी भी कृषि के ज्ञान और उसकी तकनीक से अनभिज्ञ था।

उत्तर/नवपाषाण काल: पाषाणकालीन क्रान्ति का सूत्रपात

उत्तरपाषाण काल का सूत्रपात लगभग 5 हजार ईसा पूर्व से माना जाता है और यह मानव इतिहास में एक क्रांतिकारी युग सिद्ध हुआ।

  • पहिये का आविष्कार: इस अवधि के दौरान, मिट्टी के बर्तनों का निर्माण पहले हाथ से और फिर चाक के माध्यम से किया जाने लगा, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मानव अब पहिये के उपयोग की तकनीक से पूरी तरह परिचित हो गया था।
  • महत्वपूर्ण स्थल: इस युग के विशिष्ट औजार और पुरावशेष चित्तौड़गढ़ जिले में बेड़च व गंभीरी नदियों के तटों पर, चम्बल और बामनी नदी के तट पर स्थित भैंसरोड़गढ़ व नवाघाट, बनास नदी के तट पर हमीरगढ़, जहाजपुर, देवली व गिलूंड, लूनी नदी के तट पर पाली और समदडी, और टोंक जिले के भरनी जैसे कई महत्वपूर्ण स्थानों से प्राप्त हुए हैं।
  • सामाजिक बदलाव: इसी कालखंड में, कपास की खेती का प्रचलन भी आरंभ हो गया था। इसके समानांतर ही, सामाजिक वर्गीकरण की प्रक्रिया भी शुरू हुई और विभिन्न व्यवसायों के आधार पर जाति व्यवस्था का सूत्रपात होने लगा।
  • बागौर और तिलवाड़ा: इस उत्तरपाषाण युगीन संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण उदयपुर के बागोर तथा मारवाड़ के तिलवाड़ा नामक पुरास्थलों पर मिले हैं।
  • क्रांति की संज्ञा: इसी तीव्र और बहुआयामी प्रगति के कारण, प्रसिंद्ध पुराविद् ‘गार्डन चाइल्ड’ ने इस युग को ‘वास्तविक’ ‘पाषाणकालीन क्रान्ति’ की संज्ञा दी है।

बागौर सभ्यता, भीलवाड़ा:

भीलवाड़ा कस्बे से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर, कोठारी नदी के सुरम्य किनारे पर स्थित, बागौर नामक स्थल के पुरातात्विक उत्खनन का कार्य वर्ष 1967-68 में डॉ. वीरेंद्रनाथ मिश्र और राजस्थान पुरातत्व विभाग के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। इस उत्खनन के माध्यम से 3000 ईसा पूर्व से लेकर 500 ईसा पूर्व तक के एक सुदीर्घ कालखंड को समाहित करने वाली बागौर सभ्यता की उपस्थिति का पता चला।

प्रमुख पुरातात्विक विशेषताएँ

  • उपकरण और समाधि: यहां से लघुपाषाणोपकरण (माइक्रोलिथ्स), विभिन्न आकार के हथौड़े, शिकार में प्रयुक्त होने वाली गोफन की गोलियां, चपटी और गोल शिलाएं, और छेद युक्त पत्थर प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं। एक महत्वपूर्ण खोज के रूप में, एक मानव कंकाल के ऊपर ईंटों की दीवार से निर्मित एक संरचना मिली है, जो समाधि या कब्र के प्राचीन अनुष्ठान का स्पष्ट संकेतक है।
  • आर्थिक आधार: बागौर सभ्यता के निवासी एक मिश्रित अर्थव्यवस्था का पालन करते थे, जिसके अंतर्गत वे कृषि कार्य, पशुपालन (पशुपालन), और आखेट (शिकार) जैसी गतिविधियों में संलग्न रहते थे।
  • प्राचीनतम साक्ष्य: यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित हो चुका है कि बागौर ही वह स्थल है जहां से कृषि एवं पशुपालन के भारत में प्राचीनतम् साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • धातु कर्म: इस स्थान से तांबे के पाँच उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक 10.5 सेंटीमीटर लंबी और छिद्रयुक्त तांबे की सुई भी शामिल है, जो उस युग के धातु कर्म की उन्नत स्थिति को दर्शाती है।
  • आवासीय संरचनाएँ: आवासीय संरचनाओं के निर्माण में स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थरों का प्रयोग किया गया था।
  • गौरव: इन सभी विशेषताओं के कारण, बागौर को भारत का सबसे संपन्न पाषाण स्थल होने का गौरव प्राप्त है।

धातुओं का ऐतिहासिक अनुक्रम और ताम्रयुगीन संस्कृति

मानव सभ्यता के धातु-युग के इतिहास में, सर्वप्रथम मानव ने ताँबे (Copper) का प्रयोग करना प्रारम्भ किया, क्योंकि यह धातु आसानी से उपलब्ध थी। इसके उपरांत, तांबे में टिन या अन्य धातुओं को मिलाकर एक मिश्रित धातु काँसा (Bronze) का वृहद स्तर पर प्रयोग आरंभ हुआ, और सबसे बाद में अत्यंत कठोर लोहे (Iron) का उपयोग शुरू हुआ। इन धातुओं के वृहद् स्तर पर प्रयोग की क्रमिक प्रक्रिया के आधार पर ही तत्कालीन मानव सभ्यताओं का नामकरण क्रमशः ताम्रयुगीन, कांस्ययुगीन, और लौह युगीन संस्कृतियों के रूप में किया गया।

प्राचीन सभ्यताएँ
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राजस्थान में पुरातात्विक स्थलों का वर्गीकरण (तालिका)

राजस्थान के महत्वपूर्ण प्राचीन पुरास्थलों को उनके प्रमुख धातु उपयोग के आधार पर वर्गीकृत किया गया है:

कालखंड (Era)प्रमुख स्थल (Key Sites)जिला (District)
ताम्रयुगीन (Chalcolithic)आहड़, झाड़ौल, ईसवाल, बालाथलउदयपुर
गणेश्वरनीम का थाना
गिलूण्डराजसमंद
ओझियानाभीलवाड़ा
कुराड़ा, एलाना, बूढ़ा पुष्कर, मलाह, चीथवाड़ीनागौर, जालौर, अजमेर, भरतपुर, जयपुर
कांस्ययुगीन (Bronze Age)कालीबंगाहनुमानगढ़
लौहयुगीन (Iron Age)नोह, सुनारी, जोधपुरा, रैढ़भरतपुर, नीम का थाना, जयपुर, टोंक
बैराठ, नगरी, भीनमाल, नलियासरकोटपूतली बहरोड, चित्तौड़गढ़, जालौर, जयपुर

आहड़ सभ्यता, उदयपुर: ताम्रवती नगरी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

उदयपुर नगर से मात्र तीन किलोमीटर की अल्प दूरी पर, लगभग 500 मीटर के वृहद क्षेत्र में विस्तृत धूलकोट नामक टीले के नीचे आहड़ का प्राचीन और समृद्ध कस्बा दबा हुआ पाया गया है, जो एक विशिष्ट ताम्रयुगीन सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है।

  • नामकरण: प्राचीन शिलालेखों में इस ऐतिहासिक स्थल का मूल नाम ‘ताम्रवती’ अंकित है, जो इसके तांबे की प्रचुरता को प्रमाणित करता है। दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी के अभिलेखों में इसे ‘आघाटपुर’ अथवा ‘आघट दुर्ग’ जैसे सामरिक और वाणिज्यिक नामों से भी जाना जाता था। स्थानीय रूप से इसे ‘धूलकोट’ भी कहा जाता है।
  • उत्खनन: इस पुरास्थल के उत्खनन का कार्य सर्वप्रथम वर्ष 1953 में अक्षय कीर्ति व्यास के नेतृत्व में आरंभ किया गया। इस प्रारंभिक कार्य के पश्चात, 1956 ईस्वी में श्री रत्नचंद्र अग्रवाल की विशेषज्ञ देखरेख में खनन कार्य को आगे बढ़ाया गया। उत्खनन की यह प्रक्रिया एक अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त अभियान के रूप में अपने चरम पर पहुँची, जिसमें डॉ. एच.डी. सांकलिया (डेकन कॉलेज, पूना), पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान, और मेलबोर्न विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया ने सहयोग किया, जो वर्ष 1961-62 के दौरान संपन्न हुआ।
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आहड़ की सांस्कृतिक समृद्धि

  • अनाज संग्रहण: बड़े आकार के मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं जिनका उपयोग अनाज को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था, और जिन्हें स्थानीय बोली में ‘गोरे’ एवं ‘कोठ’ (Gore and Koth) नाम से पुकारा जाता है।
  • उद्योग और शिल्प: उत्खनन स्थलों से अनाज पिसने की प्राचीन चक्की के अवशेष, कपड़ों में छपाई के लिए उपयोग किए जाने वाले छापों के स्पष्ट साक्ष्य, और तांबा गलाने की प्राचीन भट्टी के अवशेष मिले हैं।
  • धातु ज्ञान: यह महत्वपूर्ण रूप से ज्ञात हुआ है कि आहड़ के निवासी चांदी धातु के उपयोग से अपरिचित थे।
  • अंतिम संस्कार: शवों को दफनाने की प्रक्रिया में, शव का सिर हमेशा उत्तर दिशा में रखा जाता था, जो एक विशिष्ट अनुष्ठानिक अभ्यास को दर्शाता है।
  • सामुदायिक जीवन: एक ही भवन के भीतर छः मिट्टी के चुल्हे प्राप्त हुए हैं, जो संयुक्त परिवार प्रणाली या सामुदायिक भोजन तैयार करने की व्यवस्था का संकेत देते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय संपर्क: यहां से तृतीय ईसा पूर्व से प्रथम ईसा पूर्व के कालखंड की छः यूनानी तांबे की मुद्रायें और तीन मुहरें प्राप्त हुई हैं। सिक्कों पर अपोलो देवता और त्रिशूल का चित्रांकन है, तथा उन पर यूनानी भाषा में लेख अंकित है। यह अकाट्य रूप से प्रमाणित करता है कि उस युग में राजस्थान का व्यापार विदेशों से था
  • पशु कला: यहां से प्राप्त टेराकोटा वृषभ आकृतियां कलात्मक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जिन्हें विशिष्ट रूप से ‘बनासियन बुल’ (Banasian Bull) के नाम से जाना गया है।

गणेश्वर सभ्यता, नीम का थाना:

गणेश्वर सभ्यता का ऐतिहासिक टीला, नीम का थाना जिले में कांतली नदी के उद्गम स्थल के अत्यंत निकट अवस्थित है।

  • खोज और उत्खनन: सर्वप्रथम, श्री रत्नचंद्र अग्रवाल ने 1977 में इस पुरास्थल की खुदाई कर महत्व पर प्रकाश डाला। इसके पश्चात, 1978 से 1989 के मध्य विजय कुमार द्वारा इस क्षेत्र का अधिक विस्तृत उत्खनन कार्य संपन्न किया गया।
  • काल निर्धारण: प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डी.पी. अग्रवाल ने रेडियो कार्बन विधि और तुलनात्मक अध्ययन के वैज्ञानिक आधार पर इस स्थल की तिथि 2800 ईसा पूर्व निर्धारित की है। इसका तात्पर्य यह है कि गणेश्वर सभ्यता अनिवार्य रूप से एक पूर्व-हड़प्पा कालीन सभ्यता है।
  • जननी की उपाधि: ताम्रयुगीन सांस्कृतिक केन्द्रों में से प्राप्त सभी तिथियों में यह स्थल सर्वाधिक प्राचीनतम् सिद्ध होता है। इस अकाट्य प्रमाण के आधार पर, गणेश्वर संस्कृति को निर्विवाद रूप से ‘भारत में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ के रूप में स्वीकार किया जाता है।

गणेश्वर के विशिष्ट ताम्र उपकरण

  • उपकरण: यहां से मछली पकड़ने का कांटा, ताम्र निर्मित कुल्हाड़ी, और शुद्ध तांबे से निर्मित तीर, भाले, तलवार, बर्तन, आभूषण, और सुईयां जैसे विविध प्रकार के उपकरण प्राप्त हुए हैं, जो उच्च गुणवत्ता वाले धातु कर्म को सिद्ध करते हैं।
  • वाणिज्यिक केंद्र: यह पुरास्थल एक महत्वपूर्ण तांबा निर्यात केंद्र था। यह ऐतिहासिक रूप से सिद्ध होता है कि सिंधु घाटी के लोगों को तांबे की आपूर्ति मुख्यतः इसी स्थल से की जाती थी।

कांस्ययुगीन सभ्यता:

कालीबंगा पुरास्थल प्राचीन सरस्वती नदी के बाएं तट पर, हनुमानगढ़ से लगभग 25 किलोमीटर दक्षिण दिशा में स्थित है। वर्तमान में इस प्राचीन नदी मार्ग पर घग्घर नदी प्रवाहित होती है।

  • कालखंड: कालीबंगा के उत्खनन से पूर्व हड़प्पाकालीन, ‘हड़प्पाकालीन’, और ‘उत्तर हड़प्पाकालीन’—तीनों क्रमिक चरणों की सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • नामकरण: इस स्थल के नामकरण का आधार यहां खुदाई के दौरान मिले काली चूड़ियों के टुकड़े हैं, क्योंकि पंजाबी भाषा में ‘बंगा’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘चूड़ी’ होता है।
  • खोज: इस महत्वपूर्ण पुरास्थल की खोज सन् 1952 में पुरातत्व विभाग के निदेशक ए. एन. घोष ने की थी।
  • उत्खनन: इसका विस्तृत उत्खनन कार्य सन् 1961 से 1969 के मध्य श्री बी. बी. लाल और श्री बी. के. थापर जैसे विद्वानों के निर्देशन में सफलतापूर्वक संपादित हुआ।
  • राष्ट्रीय महत्व: ऐतिहासिक रूप से, कालीबंगा स्वतंत्र भारत का वह पहला पुरातात्विक स्थल है जिसका स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत पहली बार व्यवस्थित उत्खनन किया गया था।

कालीबंगा की वास्तुकला और नवाचार

  • विशालता: राखीगढ़ी और धौलावीरा के पश्चात, राजस्थान में कालीबंगा देश का तीसरा सबसे बड़ा पुरातात्विक स्थल है।
  • नगर नियोजन: यह नगर दो भागों में विभाजित था, और सुरक्षा की दृष्टि से दोनों भाग सुरक्षा दिवार (परकोटा) से सुदृढ़ता से घिरे हुए थे।
  • वास्तुकला की विशिष्टता: कालीबंगा का एक फर्श पूरे हड़प्पा काल का एकमात्र उदाहरण है जहां सौंदर्यवर्धक अलंकृत ईंटों का उपयोग किया गया है।
  • कृषि का नवाचार: घग्घर नदी के बाएं किनारे पर स्थित खेत तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व जितने प्राचीन हैं, और यह उत्खनन से प्राप्त खेतों में संसार भर में पहला है। इस खेत में एक साथ दो तरह की फसलों को उगाया जाता था (चना और सरसों)। खेत में ‘ग्रिड पैटर्न’ की गर्तधारियों के निशान हैं जो एक-दूसरे के समकोण पर बने हुए हैं।
  • कला कौशल: माटी की वृषभाकृति (बैल की आकृति) कलाकौशल की दृष्टि से असाधारण है, क्योंकि इसके सिर को धड़ से अलग किया जा सकता है और पुनः जोड़ा जा सकता है।
  • अंतर-क्षेत्रीय व्यापार: कालीबंगा से प्राप्त बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया की मुहरों के साथ आश्चर्यजनक समानता प्रदर्शित करती हैं।
  • अन्य साक्ष्य: यहां लकड़ी से बनी नाली, ईंटों से निर्मित चबूतरे पर सात अग्नि कुण्ड, ऊंट की हड्डियां (पालतू पशु), सूती वस्त्र में लिपटा हुआ ‘उस्तरा’, कपास की खेती के साक्ष्य, युगल समाधि, और मिट्टी से निर्मित स्केल (फुटा) प्राप्त हुए हैं।
  • प्राचीनतम चिकित्सा: एक बच्चे का कंकाल मिला है जिसमें शल्य चिकित्सा के प्रमाण मिले हैं।
  • प्राकृतिक आपदा: इस स्थल से भूकम्प के प्राचीनतम साक्ष्य भी मिले हैं। यह माना जाता है कि घग्घर नदी के सूखने की जलीय आपदा ही संभवतः कालीबंगा के विनाश का प्रमुख कारण बनी।
  • राजधानी की उपाधि: दशरथ शर्मा के ऐतिहासिक मतानुसार, कालीबंगा को सैंधव सभ्यता की तीसरी राजधानी के रूप में स्थान दिया जाना चाहिए।
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लौहयुगीन संस्कृति का उदय

नोह, भरतपुर: लौह युग का प्रारंभिक प्रमाण

भरतपुर जिले में स्थित नोह पुरास्थल के काले एवं लाल मृद्पात्रों के सांस्कृतिक स्तर के उत्खनन से लोहे की उपस्थिति के कुछ शुरुआती और निर्णायक प्रमाण मिले हैं।

  • कालखंड: वैज्ञानिक रेडियो कार्बन तिथि निर्धारण के अनुसार, इस सभ्यता का कालखंड 1100 ईसा पूर्व से 900 ईसा पूर्व के बीच का निर्धारित किया गया है।
  • ऐतिहासिक महत्व: इस उत्खनन के माध्यम से हमें सबसे महत्वपूर्ण जानकारी यह प्राप्त हुई है कि भारतवर्ष में ईसा पूर्व 12वीं शताब्दी जितने प्राचीन काल में ही लोहे का प्रयोग व्यवस्थित रूप से ज्ञात हो चुका था।
  • कला: यहां से प्रस्तर की विशालकाय यक्ष प्रतिमा और चुनार के चिकने पत्थर के कुछ टुकड़े प्राप्त हुए हैं, जिन पर मौर्यकालीन पॉलिस की विशिष्ट चमक मौजूद है।

बैराठ (विराटनगर), कोटपूतली बहरोड:

बैराठ सभ्यता पुरास्थल की प्रांरंभिक और सर्वप्रथम खोज का ऐतिहासिक कार्य 1837 ईस्वी में कैप्टन बर्ट द्वारा किया गया।

  • अशोक के शिलालेख: कैप्टन बर्ट ने प्राचीन विराटनगर से मौर्य सम्राट अशोक का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रथम भाब्रू शिलालेख खोज निकाला। यह शिलालेख 1840 ईस्वी से कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है और इसे ‘बैराठ-कलकत्ता शिलालेख’ के नाम से जाना जाता है। इसकी भाषा प्राकृत भाषा और लिपि ब्राह्मणी है। बाद में, 1871-72 ईस्वी में डॉ. कार्लाइल ने भीमसेन की पहाड़ी में अशोक का दूसरा शिलालेख खोज निकाला।
  • उत्खनन: प्रमुख पुरातात्विक स्थल, जिनमें ‘बीजक की पहाड़ी’, ‘भीमजी की डूँगरी’, मोती डूंगरी और ‘महादेवजी की डूँगरी’ शामिल हैं, पर उत्खनन कार्य सर्वप्रथम 1936-37 में दयाराम साहनी द्वारा किया गया।

बैराठ की बहु-सांस्कृतिक विरासत

  • महाजनपद संस्कृति: यह स्थल प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी (विराटनगर) था, जिसका विस्तार आधुनिक जयपुर, अलवर और भरतपुर क्षेत्रों को समाहित करता था।
  • महाभारत संस्कृति: पाण्डवों ने अपने एक वर्ष का अज्ञातवास विराटनगर के राजा विराट के यहां ही व्यतीत किया था।
  • बौद्ध धर्म के साक्ष्य: बीजक की पहाड़ी से अशोककालीन संरचनाओं के अवशेष मिले हैं, जिनमें ‘गोल बौद्ध मंदिर’, ‘स्तूप’, और ‘बौद्ध मठ’ के भग्नावशेष शामिल हैं। यहां पर स्वर्ण मंजूषा (कलश) भी प्राप्त हुई है, जिसमें भगवान बुद्ध की अस्थियों के अवशेष संरक्षित पाए गए थे।
  • हिन्द-यूनानी संस्कृति: उत्खनन से कुल 36 चांदी के सिक्के प्राप्त हुए हैं। इनमें से 28 सिक्के हिन्द-यूनानी राजाओं के हैं, जिनमें 16 सिक्के प्रसिद्ध हिन्द-यूनानी शासक राजा मिनेण्डर के हैं।
  • विनाश: ऐतिहासिक मान्यता है कि हूण आक्रांता मिहिरकुल ने बैराठ का विध्वंस कर दिया था।
  • चीनी यात्री का उल्लेख: प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने भी अपने यात्रा वृत्तान्त में बैराठ का विशिष्ट उल्लेख किया है।

रैढ़, टोंक: प्राचीन राजस्थान का टाटानगर

ढील नदी के तट पर स्थित रैढ़ पुरास्थल पर उत्खनन कार्य सर्वप्रथम 1938 से 1940 तक बहादुर दयाराम साहनी द्वारा किया गया।

रैढ़ की ऐतिहासिक समृद्धि

  • नगर की संपन्नता: पुरातात्विक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि रैढ़ एक अत्यंत समृद्ध नगर रहा है, और उत्खनन स्थल पर आलीशान इमारतों के महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • पाषाण कला: यहां से प्राप्त यक्षणी की एक प्रतिमा मृतिका (मिट्टी) से ढली हुई मूर्तियों में सर्वोत्कृष्ट उदाहरण का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे संभवतः शुंग काल का माना गया है।
  • लौह उद्योग: उत्खनन में बड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार के लौह उपकरण और औजार (तलवार, ब्लेड, भाला, कुल्हाड़ी आदि) प्राप्त हुए हैं। इसी असाधारण लौह उत्पादन के कारण, इस ऐतिहासिक स्थल को ‘प्राचीन राजस्थान का टाटानगर’ भी कहा गया है।
  • सिक्कों का भंडार: रैढ़ के उत्खनन में कुल 3075 आहत मुद्रा या पंचमार्क सिक्के भी पाये गये हैं, जो इसे एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार सिद्ध करता है।
  • मुद्राओं की विविधता: आहत मुद्रा के अतिरिक्त, रैढ़ से मालव जनपद के सिक्के, मित्र सिक्के, सेनापति सिक्के, और यूनानी शासक अपोलोडोट्स का एक खण्डित सिक्का भी प्रमुखता से प्राप्त हुआ है।

अन्य महत्वपूर्ण पुरास्थल और तथ्य

  • सोंथी, बीकानेर: अमला नंद घोष द्वारा उत्खनित। इसे ‘कालीबंगा प्रथम’ के नाम से विख्यात किया गया है।
  • सुनारी, नीम का थाना: यहां अयस्क से लोहा बनाने की भारत की प्राचीनतम भट्टियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह बस्ती वैदिक आर्यों द्वारा बसाई गई मानी जाती है।
  • ईसवाल, उदयपुर: यह एक प्राचीन और महत्वपूर्ण औद्योगिक बस्ती थी, जहां दो हजार वर्ष से भी अधिक लंबी अवधि तक निरंतर लोहा गलाने के अकाट्य प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
  • नगरी, चित्तौड़गढ़: इसका प्राचीन नाम ‘माध्यमिका’ था। यह शिवि जनपद की राजधानी रही है। उत्खनन से चार चक्राकार कुएँ और गुप्तयुगीन अवशेष मिले हैं।
  • भीनमाल, जालौर: यहां के मृद्पात्रों पर विदेशी प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, जिसमें एक यूनानी दुहत्थी सुराही की प्राप्ति भी शामिल है।
  • गरदड़ा, बूंदी (छाजा नदी): यहां से ‘प्रथम बर्ड राइडर रॉक पेंटिंग’ (Bird Rider Rock Painting) के शैल चित्र प्राप्त हुए हैं, जिन्हें देश में प्रथम पुरातत्व महत्व की पेंटिंग माना जाता है।

FAQ:

गणेश्वर सभ्यता को ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’ क्यों कहा जाता है?

गणेश्वर को यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि रेडियो कार्बन तिथि के अनुसार इसका कालखंड 2800 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है, जो इसे अन्य सभी ताम्रयुगीन सांस्कृतिक केन्द्रों में सर्वाधिक प्राचीनतम् सिद्ध करता है। इसकी उच्च गुणवत्ता वाले शुद्ध तांबे के उपकरणों की प्रचुरता और सिंधु घाटी सभ्यता को तांबे की आपूर्ति करने वाले मुख्य केंद्र के रूप में इसकी ऐतिहासिक भूमिका भी इस तथ्य को पुष्ट करती है।

कालीबंगा की सबसे महत्वपूर्ण और अद्वितीय खोजें क्या हैं?

कालीबंगा सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में विश्व का पहला जुता हुआ खेत (जिसमें ग्रिड पैटर्न पर दो फसलें एक साथ उगाई जाती थीं) और भूकंप के प्राचीनतम साक्ष्य शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, यहां अलंकृत ईंटों का फर्श, सात अग्नि कुण्ड (यज्ञ-वेदी), और शल्य चिकित्सा के साथ मिला बच्चे का कंकाल भी पुरातात्विक दृष्टि से अद्वितीय हैं।

बैराठ सभ्यता किस संस्कृति का संगम स्थल थी?

बैराठ (विराटनगर) कई संस्कृतियों का एक महत्वपूर्ण संगम स्थल था। यहां से महाजनपद संस्कृति (मत्स्य जनपद की राजधानी), महाभारत संस्कृति (पाण्डवों का अज्ञातवास), मौर्य संस्कृति (सम्राट अशोक के भाब्रू शिलालेख), बौद्ध धर्म (गोल बौद्ध मंदिर और बुद्ध की अस्थियों के अवशेष), और हिन्द-यूनानी संस्कृति (मिनेण्डर के सिक्के) के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

राजस्थान का कौन सा पुरास्थल एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार कहलाता है?

टोंक जिले में स्थित रैढ़ पुरास्थल को ‘प्राचीन राजस्थान का टाटानगर’ भी कहा जाता है। यहां उत्खनन में कुल 3075 आहत मुद्रा या पंचमार्क सिक्के मिले हैं, जो इसे एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार सिद्ध करता है।

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