राजस्थान की पावन धरा शूरवीरों, संतों और लोकदेवताओं की कर्मभूमि रही है। इन लोकदेवताओं में ‘श्री देवनारायण जी’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्हें न केवल गुर्जर समाज के आराध्य देव के रूप में पूजा जाता है, बल्कि सम्पूर्ण राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के लोक-मानस में उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। वे एक महान योद्धा, गौ-रक्षक, आयुर्वेद के प्रकांड विद्वान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाले जननायक थे।
मेवाड़ के इतिहास में भी इनका गहरा प्रभाव रहा है। इतिहास के पन्नों में यह उल्लेख मिलता है कि मेवाड़ के प्रतापी शासक महाराणा सांगा देवनारायण जी के अनन्य भक्त थे। इसी आस्था के फलस्वरूप, राणा सांगा ने चित्तौड़गढ़ के निकट ‘देवडूंगरी’ नामक स्थान पर देवनारायण जी का एक भव्य मंदिर बनवाया था, जो आज भी उनकी भक्ति का प्रमाण है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं वंशावली
देवनारायण जी का सम्बन्ध नागवंशीय गुर्जर समुदाय के ‘बगड़ावत’ कुल से है। उनका जीवन संघर्ष और त्याग की एक गाथा है।
- पिता: सवाई भोज (बगड़ावत कुल के प्रमुख योद्धा)
- माता: साडू माता (सेंदु गूजरी)
- जन्म: ऐतिहासिक गणनाओं और जनश्रुतियों के अनुसार, देवनारायण जी का जन्म विक्रम संवत 1300 (लगभग 1243 ईस्वी) में माघ शुक्ल सप्तमी को हुआ था।
- जन्म स्थान: मालासेरी डूंगरी (वर्तमान में आसींद, भीलवाड़ा जिले में स्थित)।
- बचपन का नाम: उदयसिंह।
बगड़ावत-भिणाय संघर्ष: देवनारायण जी के जन्म से पूर्व ही उनके पिता सवाई भोज और उनके 23 अन्य भाई (जो 24 बगड़ावत भाई कहलाते थे) भिणाय के शासक दुर्जनसाल के साथ हुए भीषण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह संघर्ष स्वाभिमान और क्षेत्र की रक्षा के लिए हुआ था।
बाल्यकाल एवं शिक्षा-दीक्षा
पिता की मृत्यु के समय देवनारायण जी गर्भ में थे (या अत्यंत शिशु अवस्था में थे)। शत्रुओं से बालक की रक्षा करने के उद्देश्य से, उनकी माता साडू माता उन्हें लेकर अपने पीहर (मायके) मालवा (वर्तमान मध्य प्रदेश) चली गईं। देवनारायण जी का बाल्यकाल मालवा के देवास क्षेत्र में व्यतीत हुआ।
वहीं पर उन्होंने शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा ग्रहण की। लोक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने शिप्रा नदी के तट पर सिद्ध वट के नीचे तपस्या की और सिद्धियां प्राप्त कीं। उन्हें घुड़सवारी और युद्ध कला में निपुणता प्राप्त थी। उनका प्रिय घोड़ा ‘लीलागर’ था, जिसे लोकगीतों में हरे रंग के घोड़े के रूप में भी वर्णित किया जाता है।
शौर्य गाथा और मातृभूमि पुनरागमन
लगभग 10 वर्ष की अल्पायु में ही देवनारायण जी के भीतर अपने पूर्वजों की मृत्यु का प्रतिशोध लेने और अपनी मातृभूमि को मुक्त कराने की भावना जागृत हुई।
- धारा नगरी और विवाह: मालवा से राजस्थान लौटते समय, मार्ग में धारा नगरी (धार, म.प्र.) के परमार शासक जयसिंह देव की पुत्री पीपलदे से उनका विवाह संपन्न हुआ। यह विवाह केवल एक सामाजिक रस्म नहीं, बल्कि दो क्षत्रिय कुलों का गठबंधन भी था।
- भिणाय पर विजय: राजस्थान पहुँचकर उन्होंने अपने पैतृक स्थान को मुक्त कराने के लिए भिणाय के तत्कालीन शासक (दुर्जनसाल या उनके वंशज) से युद्ध किया। इस धर्मयुद्ध में देवनारायण जी ने शत्रु को पराजित कर उसे मौत के घाट उतारा और अपने पिता व चाचाओं की मृत्यु का प्रतिशोध लिया।
- गौ-रक्षा: देवनारायण जी को ‘गौ-रक्षक’ देवता के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त है। भिणाय के शासक ने जब गायों का अपहरण किया, तो देवनारायण जी ने अपनी जान की बाजी लगाकर गायों को मुक्त कराया। उनका यह कृत्य उन्हें ‘ग्वाला’ और ‘पालनहार’ के रूप में स्थापित करता है।
आयुर्वेद और औषधीय ज्ञान
देवनारायण जी केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक सिद्ध आयुर्वेदाचार्य भी थे।
- नीम का महत्व: उन्होंने नीम के औषधीय गुणों को पहचाना और जन-जन तक पहुँचाया। आज भी उनके मंदिरों में मूर्ति के स्थान पर प्रायः बड़ी ईंटों की पूजा की जाती है और प्रसाद के रूप में नीम की पत्तियां चढ़ाई जाती हैं।
- यह इस बात का प्रतीक है कि वे प्रकृति प्रेमी थे और उन्होंने अंधविश्वासों के स्थान पर प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा दिया। उन्होंने गोबर और नीम के मिश्रण से कई असाध्य रोगों का उपचार किया।
सांस्कृतिक योगदान: ‘देवजी की फड़’/ देवनारायण की फड़
राजस्थानी लोककला में देवनारायण जी की ‘फड़’ (Phad Painting) का अद्वितीय स्थान है। यह कपड़े पर बनाई जाने वाली एक विस्तृत चित्रकथा है।
- सबसे लम्बी फड़: राजस्थान की सभी फड़ चित्रकारियों में देवनारायण जी की फड़ सबसे लम्बी, सबसे पुरानी और सर्वाधिक चित्रांकन वाली है।
- वाद्य यंत्र: इस फड़ का वाचन गुर्जर भोपाओं (पुजारियों) द्वारा किया जाता है। वाचन के समय ‘जंतर’ (Jantar) नामक वाद्य यंत्र का प्रयोग अनिवार्य रूप से किया जाता है, जो वीणा जैसा एक प्राचीन वाद्य है।
- गायन शैली: फड़ का वाचन करना अत्यंत कठिन कार्य है। ऐसी किंवदंती है कि यदि हर रात तीन पहर तक इसका गायन किया जाए, तब जाकर यह छह माह में पूर्ण होती है। इसमें ‘बगड़ावत’ महाकाव्य की कथाओं का वर्णन होता है।
- डाक टिकट: भारतीय डाक विभाग ने देवनारायण जी की फड़ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को स्वीकार करते हुए 2 सितम्बर 1992 को 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया था। (नोट: स्वयं देवनारायण जी पर भी 2011 में डाक टिकट जारी किया गया है)।
निर्वाण और धार्मिक मान्यताएँ
देवनारायण जी ने अपना नश्वर शरीर देवमाली (ब्यावर) नामक स्थान पर त्यागा था। बैसाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) के दिन उन्होंने अपनी देह का त्याग किया, हालाँकि मेले और उत्सवों की तिथियां भिन्न हैं।
प्रमुख तथ्य एवं स्मरणीय बिंदु:
| विषय | विवरण |
|---|---|
| अन्य नाम | उदल जी, विष्णु के अवतार, आयुर्वेद के ज्ञाता, गौ-रक्षक |
| जन्म तिथि | माघ शुक्ल सप्तमी (वि.सं. 1300 / 1243 ई. लगभग) |
| पिता | सवाई भोज (बगड़ावत प्रमुख) |
| माता | साडू माता (खटाणी गोत्र) |
| पत्नी | पीपलदे (धारा नगरी के परमार शासक की पुत्री) |
| कुल/जाति | नागवंशीय गुर्जर (बगड़ावत) |
| वाहन (घोड़ा) | लीलागर |
| पूजा प्रतीक | बड़ी ईंटें (प्रतीकात्मक रूप), नीम की पत्तियां |
| मुख्य प्रसाद | छाछ, राबड़ी और दूध (खीर) |
प्रमुख धार्मिक स्थल (मंदिर एवं देवरे)
देवनारायण जी के पवित्र स्थलों को ‘देवरे’ या ‘धाम’ कहा जाता है।
- सवाई भोज मंदिर, आसींद (भीलवाड़ा): यह देवनारायण जी का सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल है। यह खारी नदी के तट पर स्थित है। इसे देवनारायण जी का जन्म स्थान (मालासेरी डूंगरी) भी माना जाता है। यहाँ भाद्रपद शुक्ल छठ और सप्तमी को विशाल मेला लगता है। हाल ही में (जनवरी 2023) भारत के प्रधानमन्त्री ने यहाँ आयोजित 1111वें अवतरण महोत्सव में शिरकत की थी, जिससे इस स्थल का राष्ट्रीय महत्व और बढ़ गया है।
- देवधाम, जोधपुरिया (निवाई, टोंक): यह स्थल माशी, बांडी और मानसी नदियों के संगम पर स्थित है। यहाँ भी प्रतिवर्ष विशाल लक्खी मेला आयोजित होता है।
- देवमाली (ब्यावर, अजमेर): यह वह स्थान है जहाँ देवनारायण जी ने देह त्यागी थी। यहाँ के लोगों की श्रद्धा इतनी गहरी है कि वे आज भी इस गाँव में पक्के मकान नहीं बनाते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि पक्का मकान केवल देवजी का ही हो सकता है।
- देवडूंगरी (चित्तौड़गढ़): इसका निर्माण राणा सांगा द्वारा करवाया गया था।
सामाजिक सुधार एवं वर्तमान प्रासंगिकता
देवनारायण जी का जीवन केवल चमत्कारों तक सीमित नहीं था। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाने का कार्य किया। उनका ‘बगड़ावत’ काव्य भाईचारे और वीरता की शिक्षा देता है।
दूध न बेचने की परंपरा: देवनारायण जी के सम्मान में आज भी भाद्रपद शुक्ल सप्तमी के दिन कई क्षेत्रों में गुर्जर समाज के लोग दूध नहीं बेचते हैं और न ही दूध को जमाकर दही जमाते हैं। उस दिन दूध का निःशुल्क वितरण या खीर बनाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
निष्कर्ष
देवनारायण जी भारतीय संस्कृति के एक ऐसे महानायक हैं जिन्होंने धर्म की रक्षा, गौ-सेवा और सामाजिक न्याय के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनका जीवन दर्शन, आयुर्वेद ज्ञान और वीरता की गाथाएँ आज भी राजस्थान के कण-कण में गूँजती हैं। सरकारी दस्तावेजों, एनसीइआरटी (NCERT) और राजस्थान अध्ययन की पुस्तकों में उन्हें एक लोकदेवता के साथ-साथ एक समाज सुधारक के रूप में भी चित्रित किया गया है, जो उन्हें प्रासंगिक और पूजनीय बनाता है।
