राजस्थान की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरा पर लोकदेवताओं का स्थान सदैव सर्वोपरि रहा है। इनमें ‘पीरों के पीर’ कहे जाने वाले बाबा रामदेवजी न केवल एक अवतारी पुरुष माने जाते हैं, बल्कि वे मध्यकालीन भारत के एक महान समाज सुधारक, क्रांतिकारी विचारक और सांप्रदायिक सौहार्द के सशक्त हस्ताक्षर भी हैं। ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने तत्कालीन सामंती समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता, छुआछूत और बाह्य आडंबरों के विरुद्ध एक मूक किंतु सशक्त वैचारिक आंदोलन चलाया।

1. दार्शनिक चिंतन एवं समाज सुधार
रामदेवजी को मात्र एक चमत्कारिक लोकदेवता या ‘परचा’ देने वाले देव के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। एक प्रखर समाज सुधारक के रूप में रामदेवजी ने मूर्ति पूजा, अनावश्यक कर्मकांडों और तीर्थ यात्राओं के नाम पर होने वाले दिखावे का तार्किक और घोर विरोध किया। उनका दर्शन “कर्म की शुद्धता” पर आधारित था।
गुरु की महत्ता (गुरू महिमा) को सर्वोच्च स्थान देते हुए उन्होंने शिक्षा दी कि मनुष्य का भाग्य उसके कुल या जाति से नहीं, बल्कि उसके ‘कर्म’ से निर्धारित होता है। वे सांप्रदायिक सद्भाव के अग्रदूत थे, जिन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि राजस्थान के असंख्य लोकदेवताओं में वे एकमात्र ऐसे व्यक्तित्व हैं जो शस्त्र और शास्त्र दोनों के धनी थे; अर्थात् वे एक महान रक्षक होने के साथ-साथ एक उच्च कोटि के कवि भी थे। उनकी रचित ‘चौबीस वाणियाँ’ आज भी उनके दर्शन का प्रमाण हैं।
2. जीवन वृत्त एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जन्म और वंशावली
तंवर (तोमर) वंशीय राजपूत कुल में जन्मे रामदेवजी का अवतरण विक्रम संवत 1462 (1405 ईस्वी) में माना जाता है। प्रामाणिक स्रोतों के अनुसार, इनका जन्म बाड़मेर जिले की शिव तहसील के ‘ऊँडू-काश्मीर’ (Undu-Kashmir) नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता अजमालजी तंवर पोकरण क्षेत्र के सामंत थे और माता का नाम मैणादे था, जो धार्मिक वृत्ति की महिला थीं।
बाल्यकाल और शौर्य गाथा
रामदेवजी को मारवाड़ के प्रसिद्ध लोकदेवता राव मल्लीनाथजी का समकालीन माना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मल्लीनाथजी ने ही उन्हें पोकरण की जागीर प्रदान की थी। अपनी बाल्यावस्था और किशोरावस्था में ही उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया। उस समय ‘सातलमेर’ (वर्तमान पोकरण) क्षेत्र में भैरव नामक एक क्रूर आततायी (जिसे लोककथाओं में राक्षस की संज्ञा दी गई है) का आतंक व्याप्त था, जो तंत्र विद्या का दुरुपयोग कर जनसामान्य को पीड़ित करता था। रामदेवजी ने भैरव का अंत कर उस क्षेत्र को अराजकता से मुक्त कराया और वहां शांति स्थापित की।
विशेष: बाद में उन्होंने अपनी भतीजी (वीरमदेव की पुत्री) के विवाह में पोकरण को दहेज में दे दिया और स्वयं रूणेचा (रामदेवरा) नामक नया गाँव बसाया, जो आज उनकी आस्था का मुख्य केंद्र है।
3. सांप्रदायिक सौहार्द और कामड़िया पंथ
रामदेवजी वीर होने के साथ-साथ एक युग-दृष्टा समाज-सुधारक भी थे। उन्होंने दलितों और पिछड़ों के उत्थान के लिए ‘कामड़िया पंथ’ की स्थापना की। इस पंथ का मुख्य उद्देश्य जाति-पाति के भेद को मिटाना था।
- उपासना पद्धति: इस पंथ के अनुयायियों (विशेषकर महिलाओं) द्वारा रामदेवजी के मेले में ‘तेरहताली नृत्य’ प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य भक्ति और कला का अद्भुत संगम है, जिसमें शरीर पर बंधे 13 मंजीरों की सहायता से विभिन्न भाव-भंगिमाएं प्रदर्शित की जाती हैं।
- उपनाम और स्वीकार्यता: रामदेवजी की सर्वव्यापकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदू उन्हें ‘विष्णु का अवतार’ (कृष्ण अवतार) मानकर पूजते हैं, तो मुस्लिम समुदाय उन्हें ‘रामसापीर’ के रूप में आदर देता है।
- रिखिया: इनके मेघवाल जाति के अनन्य भक्तों को स्थानीय भाषा में ‘रिखिया’ (Rikhija) कहा जाता है, जो ‘ऋषि’ शब्द का ही अपभ्रंश माना जाता है। राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब में भी रामदेवजी की विशेष रूप से पूजा की जाती है।
4. रामदेवजी से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा उपयोगी)
अकादमिक और प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से बाबा रामदेवजी से जुड़े प्रामाणिक तथ्य निम्नलिखित हैं:
| विवरण | तथ्य/जानकारी |
|---|---|
| अन्य लोकप्रिय नाम | रामसापीर (मुस्लिम समाज द्वारा), रूणेचा का धणी, पीरों के पीर। |
| जन्म तिथि | विक्रम संवत 1462 (1405 ई.)। (भाद्रपद शुक्ला द्वितीया – जिसे ‘बाबे री बीज’ कहा जाता है) |
| जन्म स्थान | ऊँडू-काश्मीर, तहसील- शिव, जिला- बाड़मेर। |
| माता-पिता | पिता: अजमाल जी तंवर |
| जीवन संगिनी | नेतल-दे (अमरकोट के सोढा दलेल सिंह की पुत्री)। |
| सहज संबंध | भाई: वीरमदेव |
| आध्यात्मिक गुरु | बालिनाथ जी (इनकी गुफा मसूरिया पहाड़ी, जोधपुर में स्थित है)। |
| अश्व (सवारी) | नीला घोड़ा (जिसे गीतों में ‘लीला’ कहा गया है)। |
| जीवित समाधि | भाद्रपद शुक्ला एकादशी, विक्रम संवत 1515 (1458 ई.)। |
| प्रमुख मंदिर/समाधि | राम सरोवर की पाल, रूणेचा (रामदेवरा), जिला- जैसलमेर। |
5. स्थापत्य कला एवं मेला संस्कृति
भव्य मंदिर निर्माण
रामदेवजी का वर्तमान भव्य मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि स्थापत्य का भी नमूना है। सन 1931 ई. में बीकानेर के आधुनिक निर्माता महाराजा गंगासिंह जी ने उनकी समाधि पर पक्के मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर सांप्रदायिक एकता का जीवंत स्मारक है।
रामदेवरा मेला
रामदेवजी का मेला प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक रामदेवरा (रूणेचा) में भरता है।
- लक्खी मेला: लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति के कारण इसे ‘लक्खी मेला’ कहा जाता है।
- मारवाड़ का कुंभ: इस मेले को ‘मारवाड़ का कुंभ’ भी कहा जाता है, जहाँ जाति, धर्म और भाषा की दीवारें टूट जाती हैं।
- मुख्य आकर्षण: मेले का मुख्य आकर्षण कामड़िया पंथ की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला तेरहताली नृत्य है, जो बैठकर किया जाने वाला एकमात्र प्रमुख लोक नृत्य है।
6. पूजा पद्धति एवं प्रतीक चिन्ह
रामदेवजी की उपासना निराकार और साकार दोनों रूपों में देखी जा सकती है:
- पगलिये (Padchinh): रामदेवजी की मूर्ति पूजा की अपेक्षा उनके पद-चिह्नों की पूजा का अधिक विधान है। सामान्यतः गाँवों में किसी खेजड़ी वृक्ष या अन्य पवित्र वृक्ष के नीचे ऊँचे चबूतरे (थान) पर रामदेवजी के प्रतीक चिह्न ‘पगलिये’ स्थापित किये जाते हैं।
- नेजा (Neja): रामदेवजी की ध्वजा को ‘नेजा’ कहा जाता है। यह पांच रंगों की (पंचरंगी) होती है, जो पंचतत्वों या विविधता में एकता का प्रतीक मानी जाती है। कभी-कभी यह सफेद रंग की भी होती है।
- फड़ (Phad): राजस्थान की ‘फड़ चित्रकारी’ परंपरा में रामदेवजी की फड़ अत्यंत लोकप्रिय है। इसका वाचन कामड़ जाति के भोपों द्वारा ‘रावणहत्था’ (Ravanhatha) वाद्ययंत्र के साथ किया जाता है।
- ब्यावले: रामदेवजी के यशगान में गाए जाने वाले लोकगीतों को ‘ब्यावले’ कहा जाता है, जो संभवतः सबसे लंबे लोकगीत माने जाते हैं।
- जातरू: रामदेवजी के दर्शन हेतु पैदल जाने वाले श्रद्धालुओं को ‘जातरू’ कहा जाता है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः, बाबा रामदेवजी मध्यकालीन भारत के एक ऐसे प्रकाश-पुंज हैं जिन्होंने धर्म को कर्मकांडों से मुक्त कर उसे मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। उनका जीवन दर्शन आज भी प्रासंगिक है, जो हमें सिखाता है कि सच्ची ईश्वर भक्ति मानव सेवा और सामाजिक समरसता में ही निहित है।